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बंजर जमीन पर लहराई हरियाली: सरकारी योजना से कैसे बदली किसानों की किस्मत, लहलहा उठी फसलें

जल संकट के कारण वर्षों से वीरान पड़ी बंजर जमीन अब किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। सरकारी सहायता और सिंचाई के पुख्ता इंतजाम होने से इलाके में कृषि का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है।
The Freelance ब्यूरो
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23 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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बंजर जमीन पर लहराई हरियाली: सरकारी योजना से कैसे बदली किसानों की किस्मत, लहलहा उठी फसलें
📷 बंजर जमीन पर लहराई हरियाली: सरकारी योजना से कैसे बदली किसानों की किस्मत, लहलहा उठी फसलें — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • सिंचाई के स्थायी साधन मिलने से बंजर और वीरान पड़ी जमीन अब लहलहाती फसलों से आबाद हो गई है।
  • मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रहने वाले किसानों को अब समय पर पानी मिलने लगा है।
  • विविध फसलों की खेती से किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
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सिंचाई के अभाव में वीरान पड़ी थी उपजाऊ जमीन

ग्रामीण इलाकों में कृषि की सफलता पूरी तरह से जल स्रोतों और सिंचाई की उपलब्धता पर निर्भर करती है। यदि खेतों तक पानी समय पर न पहुंचे, तो उपजाऊ से उपजाऊ जमीन भी कुछ ही समय में बंजर और अनुपयोगी हो जाती है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी अनगिनत जमीनें हैं जो केवल इसलिए वीरान पड़ी रहती हैं क्योंकि वहां सिंचाई के बुनियादी साधन मौजूद नहीं हैं। ऐसा ही हाल कुछ समय पहले तक एक ग्रामीण आंचल का था, जहां विशाल रकबा केवल इसलिए बेकार पड़ा था क्योंकि किसानों के पास खेतों तक पानी पहुंचाने का कोई जरिया नहीं था। मौसम की मार और बारिश की बेरुखी के कारण यहां के किसानों के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी किसी संघर्ष से कम नहीं था।

इस ग्रामीण इलाके में लगभग पचास एकड़ का एक ऐसा बड़ा भूभाग था जहां पानी की कमी के चलते साल के अधिकांश समय खेती करना असंभव सा था। स्थानीय किसान जमीन पर मेहनत करने के लिए पूरी तरह तैयार थे, उनके पास हुनर भी था और खेती के प्रति अगाध लगन भी, लेकिन कुदरत की बेरुखी और प्रशासनिक तंत्र की अनदेखी के चलते उनकी यह मेहनत बेकार साबित हो रही थी। खेतों में फसल बोने के बाद भी यह डर हमेशा बना रहता था कि यदि बारिश समय पर नहीं हुई, तो पूरी की पूरी फसल सूख जाएगी। इस अनिश्चितता ने किसानों को पारंपरिक और जोखिम भरी खेती से दूर कर दिया था, जिसके चलते बड़े पैमाने पर जमीन बिना उपयोग के पड़ी रहती थी।

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अम्बिका जैसे किसानों का संघर्ष और बेबस आंसू

क्षेत्र के एक स्थानीय किसान अम्बिका के पास खेती योग्य चार से पांच एकड़ की जमीन थी, लेकिन पानी की कमी के कारण वह कभी भी इस जमीन का पूरा लाभ नहीं उठा पाए। उनके जैसे तमाम किसानों का दर्द यह था कि जमीन होते हुए भी वे अपनी आजीविका चलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अम्बिका बताते हैं कि कुछ साल पहले तक उनके खेतों में पानी का कोई साधन नहीं था। वे पूरी तरह से मानसून की बारिश पर निर्भर थे, जो अक्सर धोखा दे जाती थी। जब आसमान में बादल छाते थे, तभी उनके चेहरों पर थोड़ी उम्मीद की किरण जगती थी, अन्यथा पूरा साल सूखा ही बीत जाता था।

सिंचाई के साधन न होने के कारण इन किसानों के सामने यह मजबूरी थी कि वे ऐसी फसलें ही न उगाएं जिनमें पानी की अधिक आवश्यकता होती है। सब्जियों या नकदी फसलों की कल्पना करना तो इन किसानों के लिए एक सपने जैसा था। जमीन की उर्वरता होने के बावजूद वे केवल मामूली और कम पानी वाली फसलों तक ही सीमित थे। इससे न केवल उनकी आमदनी बेहद कम थी, बल्कि उनका पूरा परिवार आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा था। किसान हर साल मौसम के आगे बेबस नजर आते थे और उनकी इस लाचारी को दूर करने वाला कोई ठोस प्रयास शुरुआती दौर में नजर नहीं आ रहा था।

सरकारी योजनाओं की पहल और उम्मीद की नई किरण

किसानों के इस लंबे संघर्ष और बदहाली के दिनों में एक बड़ा बदलाव तब आया जब ग्रामीण विकास और कृषि से जुड़ी सरकारी योजनाएं धरातल पर उतरीं। मनरेगा और सिंचाई से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं ने इन किसानों के जीवन में एक नया सवेरा ला दिया। प्रशासन और संबंधित विभागों के सहयोग से इस क्षेत्र में जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर विशेष जोर दिया गया। इसके तहत किसानों के खेतों के पास और उनकी पहुंच के भीतर कुओं के निर्माण का कार्य शुरू किया गया, जिसने देखते ही देखते पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी।

सरकारी सहायता के माध्यम से जब खेतों के करीब कुएं बनकर तैयार हुए, तो किसानों के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान लौट आई। पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने से किसानों का आत्मविश्वास काफी हद तक बढ़ गया। अब उन्हें अपने खेतों की प्यास बुझाने के लिए आसमान की तरफ नहीं देखना पड़ता था। कुओं के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाने की स्थायी व्यवस्था होने से कृषि का पूरा तरीका ही बदल गया। इस एक बड़े बदलाव ने यह साबित कर दिया कि यदि सही समय पर सही दिशा में सरकारी योजनाओं का लाभ मिल जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत होने से कोई नहीं रोक सकता।

"पहले हमारी जमीन पानी के अभाव में सूखी रहती थी और हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे। लेकिन जब से सरकारी योजना के तहत कुओं का लाभ मिला है, हमारे खेतों की किस्मत ही बदल गई है। अब हम अपनी पसंद और मौसम के अनुसार फसलें उगा रहे हैं और अच्छी आमदनी की उम्मीद कर रहे हैं।"— अम्बिका, स्थानीय किसान

विविध फसलों की खेती से बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था

सिंचाई की पक्की सुविधा मिलने के बाद गोपीडीह गांव के किसानों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जिन खेतों में कभी घास-फूस उगती थी, आज वहां लहलहाती फसलें किसानों की मेहनत की गवाही दे रही हैं। अब किसान किसी एक पारंपरिक फसल के भरोसे बैठने के बजाय विविधतापूर्ण खेती की ओर कदम बढ़ा चुके हैं। जरूरत और बाजार की मांग के हिसाब से अब खेतों में गन्ने की लंबी फसलें खड़ी दिखाई देती हैं, तो कहीं पपीते के बगीचे लहलहा रहे हैं। इसके साथ ही हल्दी जैसी उच्च मूल्य वाली मसालों की खेती भी बड़े पैमाने पर की जा रही है।

अलग-अलग प्रकार की फसलों की खेती होने से किसानों की आय के स्रोत भी कई गुना बढ़ गए हैं। अब वे केवल एक फसल के कटने का इंतजार नहीं करते, बल्कि साल भर उनके खेतों से कुछ न कुछ उत्पादन होता रहता है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। बाजार में इन फसलों की अच्छी मांग होने के कारण किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य भी मिल रहा है। सिंचाई की एक छोटी सी सुविधा ने कैसे एक पूरे गांव के आर्थिक हालात बदलकर रख दिए, यह उसका एक बेहतरीन और जीवंत उदाहरण बन गया है।

बंजर पड़ी पचास एकड़ जमीन बनी खुशहाली का जरिया

इस पूरे इलाके में करीब पैंतालीस से पचास एकड़ का जो भूभाग वर्षों से पानी के अभाव में उपेक्षित पड़ा था, आज वह पूरी तरह से कृषि गतिविधियों से आबाद हो चुका है। पहले जहां सन्नाटा पसरा रहता था, आज वहां किसानों की हलचल और हरियाली नजर आती है। कुओं के निर्माण और सिंचाई व्यवस्था के सुदृढ़ होने से किसानों के भीतर एक नया जोश भर गया है। अब कोई भी किसान अपनी जमीन को बेकार या परती छोड़ने के लिए मजबूर नहीं है। हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार जमीन का अधिकतम उपयोग करने में जुटा हुआ है।

यह बदलाव केवल कुछ किसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे समुदाय को आत्मनिर्भरता की राह दिखाई है। ग्रामीण स्तर पर इस तरह की सफलताएं यह सिखाती हैं कि यदि संसाधनों का सही प्रबंधन किया जाए और जरूरतमंद तक सरकारी योजनाओं का लाभ पारदर्शिता के साथ पहुंचे, तो किसी भी क्षेत्र की तस्वीर को बदला जा सकता है। देवघर के इस गांव के किसानों की यह कहानी आज अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है, जहां जल संरक्षण और कृषि योजनाओं के जरिए बंजर धरती को भी सोना उगलाने लायक बनाया जा सकता है।

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