राजनीति के भारतीयकरण की नींव और वैचारिक संघर्ष
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में भारतीय राजनीतिक पटल पर कई तरह की वैचारिक धाराएं सक्रिय थीं। उस समय कांग्रेस के अलावा कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियों का बोलबाला हुआ करता था। हालांकि, इन दलों के विचार पूरी तरह विदेशी जमीन पर उपजे थे, जिनका भारतीय समाज की मूल आत्मा से सीधा जुड़ाव नहीं था। इन आयातित दर्शनों ने समाज को हमेशा 'हैव और हैव नॉट' यानी धनी और शोषित वर्गों के बीच बंटा हुआ देखा। इसके विपरीत, देश की अपनी मिट्टी में रचे-बसे विचारकों ने एक ऐसी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की जो भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी हो।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भारतीय जनसंघ का उदय हुआ, जिसने पाश्चात्य अनुकरण की बजाय देश की मौलिक पहचान को प्राथमिकता दी। जनसंघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ऐसी राजनीतिक व्यवस्था तैयार करना था जो विदेशी चश्मे से देश को देखने के बजाय अपनी सांस्कृतिक विरासत और सनातन मूल्यों के आधार पर राष्ट्र निर्माण करे। शुरुआती दौर में इस वैचारिक धारा को तमाम राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके मूल सिद्धांत समय के साथ प्रासंगिक साबित हुए।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस स्वदेशी विचारधारा के सबसे बड़े प्रणेता और मार्गदर्शक माने जाते हैं। उन्होंने लगभग डेढ़ दशकों तक जनसंघ के महामंत्री के रूप में संगठन को गढ़ा और इसे वैचारिक मजबूती दी। उनका 'एकात्म मानववाद' का सिद्धांत केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह मानव जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों को संतुलित करने का एक संपूर्ण दर्शन था।
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एकात्म मानववाद और सनातन चिंतन का मूल आधार
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत एकात्म मानववाद का दर्शन पूरी तरह से भारत के प्राचीन सनातन विचारों पर आधारित था। 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की भावना के साथ यह दर्शन मनुष्य को प्रकृति और समाज का विरोधी नहीं बल्कि उसका एक अभिन्न हिस्सा मानता है। इसमें समाज के हर वर्ग के कल्याण को सर्वोपरि रखा गया, जहां संघर्ष के स्थान पर सहयोग, पूरकता और सह-अस्तित्व को महत्व दिया जाता है।
इस वैचारिक प्रारूप को अंतिम रूप देने के लिए साठ के दशक में ग्वालियर में एक विशेष समिति का गठन किया गया था। इस समिति में दीनदयाल उपाध्याय के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी, दत्तोपंत ठेंगड़ी, बलराज मधोक और सुंदर सिंह भंडारी जैसे दिग्गज विचारक शामिल थे। इन्होंने जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के अनुभवों और विचारों को समाहित कर एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जो भारतीय समाज की वास्तविक जरूरतों और आकांक्षाओं का आईना था।
इस चिंतन में साफ किया गया कि आधुनिकीकरण का मतलब पश्चिमीकरण कतई नहीं है। देश का विकास अपनी परंपराओं की कीमत पर नहीं होना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था—हर क्षेत्र में भारतीय मूल्यों का समावेश होना चाहिए ताकि समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुंच सके।
"भारत अपने स्वाभाविक स्वरूप एवं प्रतिष्ठा को प्राप्त कर ही अपना निर्माण कर सकेगा। इसी से रूढ़ियां समाप्त होंगी और स्वस्थ, चैतन्यमयी संस्थाएं जन्म लेंगी।" — पंडित दीनदयाल उपाध्याय, एकात्म मानववाद के प्रणेता
अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय का स्वदेशी स्वरूप
भारतीय चिंतन पर आधारित इस राजनीति में अर्थव्यवस्था को लेकर भी एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखा गया था। इसके तहत उत्पादन, विनिमय और उपभोग के लिए ऐसे अर्थायाम की वकालत की गई जो मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखे। इसमें पूंजी के संचय के साथ-साथ श्रम का उचित सम्मान सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। किसानों को उनकी जमीन का मालिकाना हक देने, समान कार्य के लिए समान वेतन देने और बेरोजगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था करने जैसी बातें इस विचारधारा के केंद्र में थीं।
स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी स्वदेशी पद्धतियों को बढ़ावा देने की बात कही गई। आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धति को राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जीवित करने और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने का प्रावधान इसी सोच का हिस्सा था। राज्य का यह दायित्व माना गया कि वह प्रत्येक परिवार को रहने के लिए आवास और बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए, जिससे समाज में आर्थिक असमानता की खाई को पाटा जा सके।
इस दर्शन का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु समाज का वो शोषित और वंचित वर्ग था, जिसे विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिया गया था। गरीबों और जरूरतमंदों के उत्थान को ही सच्चा राष्ट्रधर्म माना गया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि देश का कोई भी नागरिक भूखा न सोए और उसे बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हों।
राजनीतिक पटल पर बदलाव और वैचारिक विजय
समय के चक्र ने करवट ली और जो दल कभी आजादी के तुरंत बाद राजनीतिक क्षितिज पर अपनी मजबूत पकड़ रखते थे, वे वैचारिक भटकाव के कारण धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट गए। इसके विपरीत, जनसंघ की कोख से निकली हुई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज देश की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र बन चुकी है। यह इस बात का प्रमाण है कि देश की जनता ने उस राजनीति को स्वीकार किया जो विदेशी मॉडलों की नकल करने के बजाय भारतीयता के धरातल पर खड़ी है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सबका साथ, सबका विकास का यह मॉडल आज देश को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। जिन विचारों को कभी हाशिए पर धकेलने की कोशिश की गई थी, वे आज नीति निर्माण के केंद्र में हैं। अनुच्छेद 370 की समाप्ति और सांस्कृतिक धरोहरों का पुनरुद्धार इसी भारतीयकरण की राजनीति के मील के पत्थर साबित हुए हैं।
निष्कर्ष तौर पर यह कहा जा सकता है कि राजनीति का भारतीयकरण कोई तात्कालिक चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक और वैचारिक यात्रा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा बोया गया यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जो देश के भविष्य की दिशा और दशा दोनों तय कर रहा है।



