पटना: 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड जीरो रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के राजनीतिक गलियारों में विधान परिषद (MLC) की 8 खाली सीटों पर होने वाले चुनावों को लेकर तापमान लगातार बढ़ रहा है। पटना के बीजेपी प्रदेश कार्यालय में एनडीए के शीर्ष नेताओं की मैराथन बैठकें इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि सत्ताधारी गठबंधन इस चुनाव में कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता। जमीन पर उतरी हमारी टीम ने जब अंदरखाने की पड़ताल की, तो कई चौकाने वाले सियासी समीकरण सामने आए।
एनडीए का 'जीत का प्लान' और बीजेपी दफ्तर में हलचल
बीजेपी कार्यालय में पिछले कई घंटों से चल रही बैठकों का मुख्य एजेंडा इन 8 एमएलसी सीटों पर एनडीए की एकजुटता को और मजबूत करना है। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हो रहे इन विधान परिषद चुनावों को एनडीए अपनी ताकत दिखाने के एक और बड़े मौके के रूप में देख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन पर लगभग सहमति बन चुकी है, लेकिन औपचारिक मुहर लगना बाकी है। गठबंधन के सभी प्रमुख घटक दल—जेडीयू, बीजेपी और अन्य सहयोगी—इस बार आपसी समन्वय के साथ मैदान में उतरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं ताकि विपक्ष को किसी भी प्रकार की सेंधमारी का मौका न मिल सके।
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जेडीयू की खास रणनीति: दिग्गजों पर दांव लगाने की तैयारी
इस सियासी उठापटक के बीच जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने भी अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पार्टी ने अपने संभावित उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए हैं। चर्चा है कि दरभंगा सीट से दिलीप चौधरी को पार्टी मैदान में उतार सकती है, वहीं नीरज कुमार समेत चार अन्य नामों पर भी अंदरखाने गहन मंथन चल रहा है। जेडीयू का पूरा जोर जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय प्रभाव को साधते हुए मजबूत चेहरों पर दांव लगाने का है, ताकि सदन के भीतर पार्टी की स्थिति को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके। हालांकि, इन नामों की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो चुकी है।
इंडिया गठबंधन में दरार: आरजेडी के बाद कांग्रेस के तेवर तल्ख
एक तरफ जहां एनडीए अपनी रणनीति को अमली जामा पहनाने में जुटी है, वहीं विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन में ऑल इज वेल नजर नहीं आ रहा है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) द्वारा अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किए जाने के बाद कांग्रेस पार्टी खासी नाराज बताई जा रही है। कांग्रेस खेमे का मानना है कि सीटों के बंटवारे या उम्मीदवारों के चयन से पहले उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया। इस एकतरफा फैसले से बिफरी कांग्रेस अब बगावती तेवर अपनाते हुए बिहार एमएलसी चुनाव की सभी 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो विपक्ष की एकजुटता को एक बड़ा झटका लग सकता है और इसका सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिल सकता है।
पटना मरीन ड्राइव गोलंबर का नया सियासी सिगूफा
इन सब के बीच राजधानी पटना में एक और मांग ने जोर पकड़ लिया है, जो राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। पटना मरीन ड्राइव के एक गोलंबर का नाम दिवंगत कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के नाम पर रखने की मांग उठाई गई है। इसे लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों की ओर से दबाव बनाया जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इस मांग के पीछे भी आगामी चुनावों को देखते हुए दलित वोटबैंक को अपने पाले में खींचने की एक सूक्ष्म सियासत काम कर रही है।
भविष्य का असर और निष्कर्ष
'द फ्रीलान्स' के स्वतंत्र विश्लेषण के मुताबिक, बिहार के ये एमएलसी चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनता के बीच न हो, लेकिन यह आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की ताकत और उनके आंतरिक अनुशासन का एक बड़ा लिटमस टेस्ट साबित होने वाले हैं।
जमीनी हकीकत यह है कि एनडीए जहां अपनी रणनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन कर रहा है, वहीं विपक्षी खेमे में आपसी खींचतान और संवादहीनता एक बार फिर सतह पर आ गई है। जैसे-जैसे नामांकन और चुनाव की तारीखें नजदीक आएंगी, बिहार की राजनीति में और अधिक रोमांचक मोड़ देखने को मिलेंगे। 'द फ्रीलान्स' की इस खबर पर पैनी नजर बनी रहेगी।








