नई दिल्ली और अबू धाबी के ऊर्जा गलियारों में इन दिनों एक बेहद गोपनीय और रणनीतिक चर्चा जोर पकड़ रही है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड खोजबीन और कूटनीतिक सूत्रों से मिले संकेतों के मुताबिक, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। चूंकि देश अपनी कुल कच्चा तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत की विदेश और आर्थिक नीति का सबसे केंद्रीय बिंदु बन गया है। मध्य पूर्व में मंडराते युद्ध के बादलों और विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव ने नई दिल्ली के नीति निर्धारकों को बैकअप विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। इसी कड़ी में अरब सागर के नीचे भारत और यूएई के बीच एक विशाल तेल पाइपलाइन बिछाने की योजना पर गंभीरता से विचार चल रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और भारत की रणनीतिक विवशता
फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार की रीढ़ है। दुनिया का एक तिहाई से ज्यादा एलएनजी और कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। लेकिन हालिया अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों, क्षेत्रीय संघर्षों और भू-राजनीतिक टकरावों के चलते इस मार्ग पर हमेशा अवरोध का खतरा बना रहता है। यदि किसी भी कारण से यह मार्ग बाधित होता है, तो भारत जैसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए ईंधन का संकट पैदा होना तय है। यही वजह है कि भारत अब पारंपरिक समुद्री जहाजों (ऑयल टैंकरों) के आवागमन पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए पानी के नीचे पाइपलाइन बिछाने के विकल्प पर विचार कर रहा है, जो सीधे सुरक्षित समुद्री क्षेत्र से भारत तक कच्चा तेल पहुंचा सके।
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समुद्र के भीतर इंजीनियरिंग का चमत्कार: क्या है यूएई पाइपलाइन प्रोजेक्ट?
अरब सागर की अथाह गहराइयों के बीच पाइपलाइन बिछाना किसी तकनीकी चुनौती से कम नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे जटिल और महंगे सबसी (subsea) इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में से एक होगा। इस पाइपलाइन के जरिए यूएई के तेल भंडारों को सीधे भारतीय तटों से जोड़ा जाएगा, जिससे परिवहन लागत में भारी कमी आएगी और टैंकरों के जरिए होने वाले समुद्री जोखिमों से भी मुक्ति मिलेगी। यद्यपि इस मेगा प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत और वित्तीय मॉडल पर अभी उच्च स्तरीय मंथन चल रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच जिस तरह की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई दे रही है, उससे इस पर अमली जामा पहनाने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का साया: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बदलते समीकरण
ऊर्जा सुरक्षा के इन बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच, दक्षिण एशिया के अन्य घटनाक्रम भी कम चिंताजनक नहीं हैं। हाल ही में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान की सीमा के भीतर की गई एयरस्ट्राइक में महिलाओं और बच्चों समेत 9 लोगों के मारे जाने की घटना ने एक बार फिर पश्चिमी सीमा पर अशांति को उजागर कर दिया है। सीमा पार आतंकवाद और अस्थिरता का यह माहौल अप्रत्यक्ष रूप से पूरे उपमहाद्वीप की आर्थिक प्रगति को प्रभावित करता है। इसके अलावा, घरेलू मोर्चे पर राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती भी लगातार बढ़ रही है। हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा अलगाववादी नेता यासीन मलिक समेत सात अन्य आरोपियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से वित्तीय फंडिंग के पुख्ता सबूत कोर्ट में पेश किए गए हैं। इन तमाम अंदरूनी और बाहरी सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत का ऊर्जा मार्ग को सुरक्षित करना देश की सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुका है।
वैश्विक परमाणु संवेदनशीलता और भविष्य का ऊर्जा परिदृश्य
एक तरफ जहां भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सुरक्षित गलियारे तलाश रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर महाशक्तियों की चालें भी बदल रही हैं। हाल ही में अमेरिका द्वारा जमीन के नीचे परमाणु विस्फोटों का पता लगाने के लिए किए गए नियंत्रित धमाकों और कंपन डेटा जुटाने की खबरें इस बात का प्रमाण हैं कि दुनिया शीत युद्ध के बाद के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रही है। चीन और अन्य प्रतिद्वंद्वी देशों की परमाणु गतिविधियों पर बारीक नजर रखी जा रही है। ऐसे माहौल में भारत का ऊर्जा कूटनीति के मोर्चे पर यूएई के साथ यह गठजोड़ केवल तेल आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के रणनीतिक प्रभाव को और अधिक सुदृढ़ करने का एक अचूक हथियार साबित होगा।
निष्कर्ष
आने वाले वर्षों में, जब दुनिया जीवाश्म ईंधन से हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण के दौर से गुजर रही होगी, तब भी कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति भारतीय अर्थव्यवस्था के पहिये को चलाने के लिए अनिवार्य होगी। भारत-यूएई समुद्र के नीचे तेल पाइपलाइन की यह परिकल्पना न केवल होर्मुज संकट के बादल छाने पर एक मजबूत शील्ड का काम करेगी, बल्कि खाड़ी देशों के साथ भारत की रणनीतिक पार्टनरशिप को एक बिल्कुल नए और अमिट मुकाम पर ले जाएगी। 'द फ्रीलान्स' की इस विशेष पड़ताल से यह साफ है कि भारत अब पारंपरिक निर्भरता से निकलकर आत्मनिर्भर और सुरक्षित भविष्य के मार्ग पर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।








