बिहार विधान परिषद चुनाव में बिखरा विपक्षी कुनबा
बिहार की राजनीति में एक बार फिर से विपक्षी दलों के बीच आपसी कलह खुलकर सामने आ चुकी है। राज्य में विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले आगामी चुनावों को लेकर विपक्षी महागठबंधन का तालमेल पूरी तरह से बिखरता नजर आ रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भले ही विपक्षी दलों ने राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता दिखाने का प्रयास किया हो, लेकिन जमीनी स्तर पर बिहार में इस गठबंधन की पोल खुल चुकी है। चुनाव की घोषणा के साथ ही सहयोगी दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर किसी भी प्रकार की आपसी सहमति बनती नहीं दिखी।
स्थिति यह है कि जिन दलों को मिलकर एनडीए के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा तैयार करना था, वे अब खुद एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा घोषित इन आठ सीटों के लिए सभी दलों ने अपनी रणनीतियां तैयार कर ली हैं, लेकिन विपक्षी खेमे में दिख रही इस आपसी खींचतान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की रणनीतिक असफलता का सीधा फायदा सत्ताधारी गठबंधन को मिल सकता है।
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राजद और कांग्रेस आमने-सामने, कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट का दावा
इस चुनाव में सबसे बड़ा आश्चर्य राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच देखने को मिल रहा है। बिना किसी पूर्व विचार-विमर्श के राजद ने अपने हिस्से की सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित करने शुरू कर दिए थे। इससे प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में गहरी नाराजगी फैल गई। स्थानीय स्तर के नेताओं ने अपनी असंतुष्टि केंद्रीय आलाकमान तक पहुंचाई, जिसके बाद कांग्रेस ने भी कई सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का निर्णय लिया। परिणाम यह हुआ कि कम से कम चार से पांच ऐसी महत्वपूर्ण सीटें हैं, जहां राजद और कांग्रेस के उम्मीदवार सीधे तौर पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं।
सारण शिक्षक सीट, पटना स्नातक सीट, पटना शिक्षक सीट और दरभंगा स्नातक सीट जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में दोनों दलों के अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में हैं। राजद ने जहां इन चुनावों में कुल सात सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं, वहीं कांग्रेस ने भी पांच सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। इसके अलावा वामपंथी दल भी पीछे नहीं हैं। सीपीआई ने दो और सीपीएम ने एक सीट पर अपने प्रत्याशी घोषित किए हैं, जिससे कुल उम्मीदवारों की संख्या पंद्रह तक पहुंच गई है।
पुरानी गलतियों से सबक न लेने का आरोप
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब विपक्षी गठबंधन में इस तरह की अव्यवस्था देखने को मिली है। इससे पहले विधानसभा चुनावों के दौरान भी इसी प्रकार का अंसतोष और बिखराव सामने आया था, जिसे 'फ्रेंडली फाइट' का नाम देकर टालने की कोशिश की गई थी। उस दौरान भी सीटों के तालमेल के बिना ही कई उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया गया था, जिसका खामियाजा गठबंधन को चुनावी परिणामों में भुगतना पड़ा था। अब एक बार फिर से वही पुरानी गलतियां दोहराई जा रही हैं, जिससे आम कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
"गठबंधन का अर्थ होता है आपसी सहमति और समन्वय, लेकिन जब दल अपने व्यक्तिगत विस्तार के लिए बिना सोचे-समझे उम्मीदवार उतारते हैं, तो जनता का विश्वास डगमगा जाता है। इस प्रकार की आपसी जंग से केवल सत्ता पक्ष को राजनीतिक लाभ मिलता है।" — राजनीतिक विश्लेषक
इस बार के विधान परिषद चुनावों में एनडीए ने बहुत ही सधे हुए तरीके से अपनी रणनीति बनाई है। एनडीए खेमे में भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के बीच सीटों का स्पष्ट और शांतिपूर्ण बंटवारा हुआ है। दोनों दलों ने चार-चार सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पूरी तरह से आपसी सहमति और सर्वसम्मति के साथ की है, जिससे उनके खेमे में किसी भी प्रकार की आंतरिक कलह की गुंजाइश नहीं बची है।
जन सुराज पार्टी की एंट्री से बदला राजनीतिक समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य की राजनीति में जन सुराज पार्टी का बढ़ता प्रभाव भी एक नया और बड़ा फैक्टर साबित हो रहा है। हाल के उपचुनावों में मिली सफलता के बाद पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर का हौसला बुलंद है। उन्होंने भी इन सभी आठ सीटों पर अपने समर्थित या पार्टी उम्मीदवारों के उतरने की संभावनाओं को लेकर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। पिछले चुनावों में भी कुछ क्षेत्रों में निर्दलीय और तीसरे मोर्चे के उम्मीदवारों ने मुख्य दलों के समीकरणों को बुरी तरह प्रभावित किया था।
ऐसी स्थिति में जब मुख्य विपक्षी दल ही आपस में बंटे हुए हों और एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे हों, तब चुनाव के नतीजे बेहद चौंकाने वाले हो सकते हैं। मतदाताओं के सामने भी एक मजबूत और स्पष्ट विकल्प चुनने को लेकर असमंजस की स्थिति बन सकती है। आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार जैसे-जैसे तेजी पकड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये दल आपस में कोई समन्वय बिठा पाते हैं या फिर यह आपसी टकराव चुनाव के परिणामों पर भारी पड़ता है।



