सिनेमा के सुनहरे दौर के चमकते सितारे बिस्वजीत चटर्जी
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे अभिनेता आए जिन्होंने अपनी कला, अंदाज और अभिनय से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। इसी फेरिहरत में एक बड़ा नाम बिस्वजीत चटर्जी का भी आता है। पचास और साठ के दशक में जब रोमांस को पर्दे पर एक अलग ही अंदाज में पेश किया जाता था, तब बिस्वजीत अपनी रूमानी छवि के लिए जाने जाते थे। उनकी नीली आंखें और सादगी भरा अंदाज उस दौर की अभिनेत्रियों और दर्शकों को खूब भाता था। उन्होंने न केवल बंगाली सिनेमा में अपनी बेहतरीन अदाकारी से तहलका मचाया, बल्कि बॉलीवुड में भी अपनी एक अलग जगह बनाई। उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे अनसुने किस्से हैं जो आज भी फिल्मी गलियारों में बड़े चाव से सुने जाते हैं।
एक अभिनेता के तौर पर उनका सफर आसान नहीं था। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के बल पर मनोरंजन जगत में अपने पैर जमाए। उनके समकालीन कलाकारों में शम्मी कपूर, राज कपूर और देव आनंद जैसे दिग्गज शामिल थे, लेकिन बिस्वजीत ने अपनी एक स्वतंत्र शैली विकसित की। उनके निभाए गए किरदारों में एक अलग ही ठहराव और शालीनता देखने को मिलती थी, जो आज के समय में सिनेमा प्रेमियों को पुराने दौर की याद दिलाती है।
संबंधित खबरें
रेखा के साथ वह चर्चित और विवादित किसिंग सीन
बिस्वजीत चटर्जी के करियर का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा विवादों में रहने वाला वाकया अभिनेत्री रेखा के साथ जुड़ा हुआ है। बात उस समय की है जब रेखा ने इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने शुरू ही किए थे और वह काफी युवा थीं। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक ने एक किसिंग सीन की डिमांड की थी। इस दृश्य को लेकर सेट पर काफी चर्चा हुई थी। जब यह सीन पर्दे पर आया, तो उस दौर की सामाजिक मान्यताओं के हिसाब से इसने भारी हंगामा खड़ा कर दिया था।
यह दृश्य इतना लंबा और विवादास्पद था कि इसकी चर्चा देश भर के पत्र-पत्रिकाओं में होने लगी। कई लोगों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई, तो कुछ ने इसे कलात्मक स्वतंत्रता का हिस्सा बताया। उस दौर के हिसाब से इस तरह के दृश्य पर्दे पर दिखाना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। इस एक घटना ने रातों-रातों कोहराम मचा दिया था और बिस्वजीत तथा रेखा दोनों ही काफी लंबे समय तक मीडिया की सुर्खियों में बने रहे थे। आज भी जब पुराने दौर के बोल्ड दृश्यों की बात होती है, तो इस घटना को सबसे पहले याद किया जाता है।
संजय दत्त के डेब्यू का अनसुना और दिलचस्प किस्सा
बिस्वजीत चटर्जी का जुड़ाव सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया था। उन्होंने संजय दत्त की पहली फिल्म 'रॉकी' से जुड़ा एक ऐसा राज खोला है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। जब सुनील दत्त अपने बेटे संजय दत्त को हिंदी सिनेमा में लॉन्च करने के लिए एक दमदार कहानी और फिल्म की तलाश कर रहे थे, तब बिस्वजीत ने भी इस दिशा में अपनी एक खास भूमिका निभाई थी।
फिल्म 'रॉकी' से संजय दत्त रातों-रात स्टार बन गए थे, लेकिन इस फिल्म के बनने के पीछे के संघर्ष और कास्टिंग के तमाम किस्से आज भी फिल्मी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। बिस्वजीत ने एक निर्देशक के रूप में इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकारों के साथ काम किया था और उनके अनुभव ने नई पीढ़ी के कलाकारों को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया। सुनील दत्त के परिवार के साथ उनके संबंध बेहद प्रगाढ़ थे, जिसका असर संजय दत्त के शुरुआती फिल्मी सफर पर भी साफ देखने को मिलता है।
रोमांटिक हीरो की छवि से बाहर निकलने का संघर्ष
हर अभिनेता की तरह बिस्वजीत चटर्जी के सामने भी यह चुनौती थी कि वह खुद को एक ही खांचे में बंधा हुआ महसूस न होने दें। शुरुआती दौर में उन्हें लगातार रोमांटिक और प्रेमी जोड़ों वाले किरदार ही मिल रहे थे। दर्शक उन्हें केवल एक लवर बॉय के रूप में देखना पसंद करते थे। हालांकि, एक मंझे हुए कलाकार होने के नाते वे लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते थे। उन्होंने कई थ्रिलर और गंभीर किस्म की फिल्मों में भी काम किया, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा।
उनके अभिनय की रेंज का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कॉमेडी से लेकर गंभीर ड्रामे तक, हर तरह के रोल में खुद को साबित किया। निर्देशकों के साथ उनकी ट्यूनिंग हमेशा शानदार रही, जिसकी वजह से उन्हें सेट पर कभी किसी बड़ी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। उनके सह-कलाकार हमेशा उनकी समय की पाबंदी और काम के प्रति समर्पण की मिसाल देते थे।
रोमांस के बादशाह की व्यक्तिगत जिंदगी और सादगी
पर्दे पर हमेशा चकाचौंध और ग्लैमर के बीच रहने वाले बिस्वजीत चटर्जी असल जिंदगी में बेहद साधारण और जमीन से जुड़े हुए इंसान रहे हैं। उन्होंने कभी भी अपनी लोकप्रियता को अपने सिर पर हावी नहीं होने दिया। उनके परिवार में भी कला के प्रति एक खास लगाव रहा है, जिसे उनके बच्चों ने भी आगे बढ़ाया। उनकी बेटी प्रसेनजीत चटर्जी बंगाली सिनेमा के बहुत बड़े सुपरस्टार हैं, जिन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए अभिनय की दुनिया में परचम लहराया।
आज के दौर में जब पुरानी पीढ़ियों के कलाकार धीरे-धीरे दुनिया से विदा हो रहे हैं, तब बिस्वजीत जैसे दिग्गजों के संस्मरण ही हमारे पास सिनेमा का असली इतिहास बचा कर रखते हैं। उनके बताए गए किस्से हमें उस सुनहरे दौर की सैर कराते हैं जब तकनीक से ज्यादा भावनाओं और संवादों को महत्व दिया जाता था।
निष्कर्ष: भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर है योगदान
बिस्वजीत चटर्जी का सफर इस बात का प्रमाण है कि लगन, अनुशासन और प्रतिभा के दम पर कोई भी कलाकार लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज कर सकता है। उनके जीवन के विवाद, उनकी सफलताएं और उनके द्वारा दिए गए बेहतरीन सिनेमाई तोहफे आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्त्रोत बने रहेंगे।
"सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, यह समाज का आईना है। हमने अपने दौर में जिस ईमानदारी से काम किया, वही हमारी असली पूंजी है।" — बिस्वजीत चटर्जी, दिग्गज अभिनेता





