नई दिल्ली/बोगुरा: पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले बेहद संवेदनशील 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के पास एक बार फिर भू-राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बांग्लादेश के बोगुरा जिले में तुर्की और चीन की तकनीकी सहायता से एक अत्याधुनिक 'लड़ाकू ड्रोन' फैक्ट्री के निर्माण की खबरों ने नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। 'द फ्रीलान्स' की विशेष पड़ताल बताती है कि यह परियोजना केवल एक साधारण विनिर्माण इकाई नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया में बदलते सामरिक समीकरणों का एक खतरनाक संकेत है।
चिकन नेक के बेहद करीब रणनीतिक खतरा
सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी 'चिकन नेक' भारत का वह सबसे संवेदनशील गलिआरा है जो मात्र 20-22 किलोमीटर चौड़ा है और पूर्वोत्तर के सात राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। इस भौगोलिक सुई के ठीक मुहाने पर बांग्लादेश के बोगुरा में लड़ाकू ड्रोनों का उत्पादन शुरू होना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए लाल बत्ती जलने जैसा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में शत्रुतापूर्ण ताकतों की पैठ बढ़ती है, तो युद्ध की स्थिति में भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर का संपर्क बाधित करने की साजिशें आसानी से रची जा सकती हैं।
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तुर्की-चीन धुरी और बांग्लादेश का बदलता रुख
पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश की राजनीतिक जमीन पर हुए बदलावों के बाद ढाका और बीजिंग के बीच की नजदीकियां जगजाहिर हो चुकी हैं। इसके साथ ही, रक्षा क्षेत्र में तुर्की के बढ़ते दखल ने इस त्रिकोणीय समीकरण को और खतरनाक बना दिया है। तुर्की के अत्याधुनिक ड्रोन (जैसे बेराकटार तकनीक) ने दुनिया भर के युद्धक्षेत्रों में अपनी मारक क्षमता साबित की है। अब इस तकनीक का बांग्लादेश की जमीन पर, चीन के वित्तीय व कूटनीतिक समर्थन से उतरना, भारत के सामरिक हितों के सीधे खिलाफ जाता है।
घरेलू राजनीतिक हलचल और कूटनीतिक प्राथमिकताएं
एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ये बड़े खतरे मंडरा रहे हैं, वहीं देश के भीतर राजनीतिक गलियारों में भी उथल-पुथल का दौर जारी है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में, विपक्षी दलों द्वारा मुंबई एयरपोर्ट पर उड़ानों के स्थानांतरण जैसे प्रशासनिक फैसलों पर तीखा विरोध दर्ज कराया जा रहा है, तो वहीं क्षेत्रीय राजनीति और दलबदल (जैसे आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरों का कांग्रेस में शामिल होना) की घटनाएं भी सु्र्खियों में हैं। हालांकि, इन घरेलू बहसों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक मोर्चे पर सतर्कता बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए।
सामाजिक सुरक्षा और अपराध के आंकड़े: एक समानांतर बहस
जब देश बाहरी सुरक्षा के मोर्चों पर उलझा है, तब आंतरिक मोर्चे पर भी कई सामाजिक और विधिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। हाल ही में जारी विभिन्न अपराध सूचकांकों और सामाजिक सर्वे—जैसे कि घरेलू हिंसा या पारिवारिक विवादों से जुड़े आंकड़े (जिनमें पतियों पर हमलों के मामले भी शामिल हैं)—यह दर्शाते हैं कि समाज के भीतर कानून-व्यवस्था और मनोवैज्ञानिक दबाव के अपने अलग आयाम हैं। लेकिन बोगुरा का ड्रोन प्रोजेक्ट इन तमाम आंतरिक मुद्दों से कहीं अधिक बड़ा और तात्कालिक रणनीतिक खतरा बनकर उभरा है।
निष्कर्ष और आगे की राह
बोगुरा की यह लड़ाकू ड्रोन फैक्ट्री भारत के लिए वेक-अप कॉल है। केवल कूटनीतिक बयानों से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूर्वी मोर्चे पर सर्विलांस ग्रिड को और अधिक मजबूत करना होगा। 'चिकन नेक' की सुरक्षा के लिए भारतीय रक्षा बलों को अपनी मारक क्षमता और खुफिया तंत्र को अभेद बनाने की जरूरत है, ताकि पड़ोसी मुल्कों की किसी भी सामरिक दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।








