नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों दो अलग-अलग वजहों से लगातार चर्चा में बने हुए हैं। एक तरफ उन्हें साल 2026 के लिए अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन सहायता संस्थान यानी इंटरनेशनल आइडिया का अध्यक्ष चुना गया है, जो देश के लिए एक बड़ा वैश्विक सम्मान माना जा रहा है। दूसरी तरफ देश के भीतर राजनीतिक दलों की तरफ से उन पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने इस पूरे मामले की जमीनी पड़ताल की है ताकि यह समझा जा सके कि आखिर इस समय चुनावी मामलों को लेकर देश और दुनिया में क्या कुछ चल रहा है।
बीबीसी न्यूज़ और आकाशवाणी की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका को लेकर भी हाल के दिनों में कई तरह की बातें सामने आई हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की चुनाव व्यवस्था का जिक्र किए जाने के बाद से यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों की नजरों में आ गया है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दुनिया भर के देश बारीकी से नजर रख रहे हैं, ऐसे समय में ज्ञानेश कुमार को इंटरनेशनल आइडिया जैसी बड़ी वैश्विक संस्था की कमान मिलना भारत के प्रशासनिक और लोकतांत्रिक ढांचे के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी जिम्मेदारी
स्टॉकहोम स्थित इंटरनेशनल आइडिया यानी इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस दुनिया भर में चुनावी प्रक्रियाओं को मजबूत करने का काम करती है। साल 2026 के लिए इस प्रतिष्ठित संस्था के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलने से वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति मजबूत होगी। दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के बीच चुनावी सुधारों और निष्पक्ष मतदान पर चर्चा करने में भारत की भूमिका अब और ज्यादा अहम हो जाएगी। डीडी न्यूज़ और आकाशवाणी की खबरों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि इस पद पर भारतीय मुख्य निर्वाचन आयुक्त का होना देश के लिए गर्व की बात है।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि घरेलू मोर्चे पर चुनाव आयोग की राह आसान नहीं दिख रही है। हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे शहर में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव आयोग अपने कामकाज को लेकर निष्पक्षता नहीं बरत रहा है और उन्होंने खुलकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई है। स्थानीय पुलिस और प्रशासन को इन प्रदर्शनों को संभालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी है, क्योंकि राजनीतिक दलों के बीच चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।
घरेलू राजनीति और कांग्रेस का तीखा हमला
पुणे में हुए इस 'हल्लाबोल' प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने साफ कहा कि लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाओं को पूरी तरह से निष्पक्ष होना चाहिए। विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ समय से चुनावों के दौरान जिस तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं, उन पर आयोग को सख्त और पारदर्शी कदम उठाने चाहिए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश में जब भी चुनाव नजदीक आते हैं या राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती है, तब-तब चुनाव आयोग सीधे तौर पर चर्चा के केंद्र में आ जाता है। इस बार भी विरोध का यह सिलसिला उसी राजनीतिक खींचतान का एक हिस्सा नजर आता है।
जमीनी स्तर पर आम जनता भी इस बात को लेकर अपनी अलग-अलग राय रखती है। देश के एक बड़े वर्ग का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर उंगली उठाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष का यह भी तर्क है कि जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए सवाल पूछना जरूरी है। चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों पर एक तरफ वैश्विक मंच की जिम्मेदारियां हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर राजनीतिक दलों के तीखे तेवरों का सामना करने की चुनौती भी बनी हुई है।
आगे की चुनौतियां और प्रशासनिक स्थिति
आने वाले दिनों में चुनाव आयोग के सामने कई राज्यों के चुनाव और प्रशासनिक सुधारों को लागू करने की बड़ी जिम्मेदारी है। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को मजबूत करने का मौका है, वहीं देश के अंदर राजनीतिक दलों का भरोसा जीतना भी उतना ही जरूरी है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट से यह साफ होता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल इस समय देश और दुनिया दोनों ही मोर्चों पर बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जिस पर हर किसी की पैनी नजर बनी हुई है।




