नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों में आज का दिन बेहद अहम है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर यानी मतदाता सूची से नाम हटाने के विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में एक साथ कई याचिकाओं पर सुनवाई होने जा रही है। अदालत के इस रुख पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया और पारदार्शिता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल खड़े कर रहा है। आज होने वाली इस सुनवाई में कुल बाईस याचिकाओं पर एक साथ विचार किया जाएगा। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से चुनावी सुधार, मतदान सूची में गड़बड़ी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं।
इस पूरे विवाद की जड़ में वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाते हैं या उनमें संशोधन किया जाता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि एसआईआर यानी मतदाता सूची संशोधन के नाम पर कई वैध मतदाताओं के नाम चुपचाप सूचियों से गायब कर दिए गए हैं। इसे लेकर राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाओं में यह मांग की गई है कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें तुरंत प्रभाव से वापस जोड़ा जाए। साथ ही, चुनाव आयोग की कार्यशैली पर रोक लगाने की भी गुहार लगाई गई है ताकि आगामी चुनावों निष्पक्षता से कराए जा सकें।
विपक्ष की मुख्य मांगें और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई इन बाईस याचिकाओं में सिर्फ मतदाता सूची का मुद्दा ही नहीं है, बल्कि ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी नेताओं और याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग यह है कि चुनाव प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरती जाए। उनका कहना है कि वीवीपैट पर्ची और ईवीएम मिलान की प्रक्रिया को और अधिक पुख्ता किया जाना चाहिए। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा दाखिल याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग को स्वायत्त रूप से काम करना चाहिए और किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से दूर रहना चाहिए। अदालत में आज इन सभी बिंदुओं पर तीखी बहस होने के पूरे आसार हैं।
न्यायालय के पिछले फैसलों और इतिहास पर नजर डालें तो चुनाव आयोग के खिलाफ इस तरह की कानूनी लड़ाइयां नई नहीं हैं। इससे पहले भी मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के फैसलों को लेकर कई बार सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। बाम्बे हाई कोर्ट में भी इसी तरह का एक मामला चल रहा है, जहां एसआईआर के जरिए हटाए गए मतदाताओं को फिर से सूची में शामिल करने की मांग की गई है। कानूनी जानकारों का मानना है कि आज सुप्रीम कोर्ट जो भी आदेश देगा, वह देश की चुनावी व्यवस्था के भविष्य के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।
कानूनी पहलू और चुनाव आयोग की जिम्मेदारियां
संविधान के जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग देश में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र निकाय है। हालांकि, यदि चुनाव प्रक्रिया या मतदाता सूची तैयार करने में किसी तरह की मनमानी या लापरवाही के आरोप लगते हैं, तो न्यायपालिका का दखल देना स्वाभाविक हो जाता है। आज की सुनवाई के दौरान कोर्ट यह देखेगा कि क्या वाकई एसआईआर प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। यदि अदालत को ऐसा लगता है, तो वह चुनाव आयोग से जवाब तलब कर सकती है या कुछ मामलों में सख्त दिशा-निर्देश भी जारी कर सकती है।
आम जनता और राजनीति से जुड़े जानकारों के बीच इस बात की खासी चर्चा है कि क्या कोर्ट इस मामले में कोई अंतरिम राहत देता है या नहीं। विपक्ष की कोशिश है कि चुनाव से जुड़े हर एक संदिग्ध पहलू की न्यायिक जांच हो, ताकि जनता का लोकतंत्र पर भरोसा अडिग रहे। अब यह देखने वाली बात होगी कि मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश इस पर क्या रुख अपनाते हैं। हमारी टीम सुप्रीम कोर्ट के बाहर मौजूद है और पल-पल की अपडेट आप तक पहुंचती रहेगी, ताकि कोई भी जरूरी तथ्य छूट न पाए।
अदालती कार्यवाही और आगे की दिशा
आज सुबह जैसे ही अदालत की कार्यवाही शुरू होगी, इन बाईस याचिकाओं पर एक-एक करके सुनवाई की जाएगी। सरकारी वकील और चुनाव आयोग की ओर से भी अपना पक्ष मजबूती से रखने की पूरी तैयारी कर ली गई है। आयोग यह दलील दे सकता है कि मतदाता सूची में संशोधन एक सामान्य और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे कानून के दायरे में ही पूरा किया जाता है। बहरहाल, अदालत का जो भी फैसला आएगा, वह देश के सियासी तापमान को बढ़ाने या घटाने में अहम भूमिका निभाएगा। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी खबर पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और हर बड़े अपडेट से आपको रूबरू कराता रहेगा।






