दिव्यांगता और समाज: क्या केवल स्वास्थ्य ही एकमात्र पहलू है?
किसी भी समाज की संवेदनशीलता और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था का वास्तविक पैमाना यह होता है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद नागरिकों के लिए जीवन को कितना आसान बनाता है। जब हम दिव्यांगजनों के जीवन संघर्ष पर नजर डालते हैं, तो आमतौर पर पूरी चर्चा केवल उनके स्वास्थ्य, शारीरिक स्थिति या चिकित्सीय उपचार तक सिमट कर रह जाती है। लेकिन यह दृष्टिकोण सच्चाई का केवल एक छोटा सा हिस्सा बयां करता है। किसी व्यक्ति की शारीरिक चुनौती तब एक विकट समस्या में तब्दील हो जाती है, जब उसके आसपास का परिवेश, बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक तंत्र उसे समर्थन देने के बजाय उसके रास्ते में बाधाएं खड़ी करने लगता है। कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति को चलने-फिरने में कठिनाई है, लेकिन जिस शहर या गांव में वह रहता है, वहां की सड़कें समतल हैं, सार्वजनिक परिवहन उसकी सुगमता के अनुकूल है, अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों में रैंप बने हैं तथा रोजगार के स्थानीय अवसर उपलब्ध हैं। ऐसे माहौल में उसकी रोजमर्रा की तमाम मुश्किलें स्वतः कम हो जाएंगी।
इसके विपरीत, जब इन बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है, तो शरीर की एक छोटी सी चुनौती कई अन्य बड़ी विसंगतियों को जन्म दे देती है। ऐसे में असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसी व्यक्ति विशेष को शारीरिक अक्षमता है या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि हमारा पूरा सामाजिक ताना-बाना और शासन व्यवस्था उसे कितनी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का अहसास कराती है। जब तक हमारे सार्वजनिक स्थल, शिक्षण संस्थान और कार्यस्थल दिव्यांग-अनुकूल नहीं बनेंगे, तब तक इस वर्ग के लिए समानता के अधिकार केवल कागजी दावे बनकर रह जाएंगे। व्यवस्था की यह कमी न केवल उनके व्यक्तिगत विकास को बाधित करती है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से भी दूर धकेल देती है, जिससे उनका पूरा जीवन संघर्ष की एक लंबी दास्तान बनकर रह जाता है।
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शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी ढांचे की अनदेखी
गांधी तर्ज पर चलने वाले हमारे ग्रामीण इलाकों या अर्ध-शहरी क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति पर गौर करें। अमूमन हर गांव या पंचायत में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, और कागजों पर अस्पताल या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद भी होते हैं। परंतु जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश भवनों तक पहुंचने के लिए लंबी और ऊंची सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। वहां न तो रैंप की कोई व्यवस्था होती है और न ही व्हीलचेयर के अनुकूल शौचालय होते हैं। ऐसे में यदि कोई जरूरतमंद मरीज इलाज के लिए वहां पहुंच भी जाए, तो वह सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाता है। भवन की यह बनावट ही अपने आप में एक ऐसा हताश करने वाला अवरोध बन जाती है, जो मरीज को डॉक्टर तक पहुंचने ही नहीं देती। ठीक यही स्थिति शिक्षा के क्षेत्र में भी देखने को मिलती है। गांवों के सरकारी स्कूलों में बच्चों के दाखिले तो हो जाते हैं, लेकिन कक्षाओं तक पहुंचने के रास्ते इस तरह के होते हैं कि दिव्यांग बच्चा चाहकर भी नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाता।
शिक्षा के अधिकार की बात हर मंच से जोर-शोर से की जाती है, लेकिन जब तक स्कूल के बुनियादी ढांचे में बदलाव नहीं लाया जाएगा, तब तक यह अधिकार केवल सांकेतिक ही रहेगा। बच्चे के लिए स्कूल का रास्ता अगर दुर्गम है, तो उसकी पढ़ाई की निरंतरता बीच में ही टूट जाती है। शिक्षा के बिना भविष्य के रास्ते अपने आप बंद हो जाते हैं, और यहीं से असमानता का एक ऐसा चक्र शुरू होता है जो जीवन भर उसका पीछा नहीं छोड़ता। एक बच्चा जो स्कूल जाने से वंचित रह गया, वह कल को एक आत्मनिर्भर और कुशल नागरिक कैसे बन पाएगा? यह सवाल हमारे पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है, जिसका समाधान ढूँढना अब बेहद आवश्यक हो गया है।
रोजगार के सीमित अवसर और परिवहन की दुश्वारियां
शिक्षा के बाद जब बात रोजगार की आती है, तो मुश्किलें और अधिक विकराल रूप धारण कर लेती हैं। ग्रामीण भारत में वैसे ही आजीविका के साधन सीमित होते हैं। ऐसे में जो युवा अपनी आजीविका चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यदि उन्हें चलने-फिरने में कठिनाई हो और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था उनके अनुकूल न हो, तो उनकी समस्याएं कई गुना बढ़ जाती हैं। शहर या बड़े बाजारों तक जाकर काम की तलाश करना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। परिवहन के साधनों में लिफ्ट, लो-फ्लोर बसें या अन्य सहायक इंतजामों का न होना उन्हें अपने ही गांव तक सीमित रहने के लिए मजबूर कर देता है। कई लोग मजबूरी में छोटे-मोटे स्थानीय काम करने लगते हैं, जो न तो उनकी योग्यता के अनुरूप होते हैं और न ही उनकी आर्थिकी को मजबूत कर पाते हैं। सहीराम जैसे हुनरमंद लोग, जो जूते बनाने और मरम्मत करने जैसे कामों में अपनी मेहनत झोंकते हैं, उनके सामने भी यह बड़ा सवाल रहता है कि क्या यह काम उनकी स्वेच्छा से चुना गया विकल्प है या फिर विवशता?
जब समाज में रोजगार के दरवाजे ऐसे लोगों के लिए बंद या आधे खुले रहते हैं, तो वे आर्थिक रूप से कभी भी स्वतंत्र नहीं हो पाते। गरीबी और दिव्यांगता का यह दुष्चक्र एक साथ मिलकर व्यक्ति की कमर तोड़ देता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार महंगे सहायक उपकरणों, निजी वाहनों या बार-बार इलाज के लिए शहर आने-जाने का खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं। जब परिवार की माली हालत पहले से ही खराब हो, तो दिव्यांग सदस्य की देखभाल और उसकी चिकित्सीय जरूरतों को पूरा करना पूरे घर के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट बन जाता है। इस स्थिति का असर परिवार के अन्य सदस्यों पर भी पड़ता है, जिन्हें अपनी आजीविका छोड़कर देखभाल की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
आंकड़े क्या कहते हैं और सामाजिक जिम्मेदारी का दायरा
यदि हम सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति की भयावहता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। राजस्थान जैसे विशाल राज्य के वर्ष 2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार, वहां 15,63,694 दिव्यांगजन दर्ज किए गए थे, जिनमें 8,48,287 पुरुष और 7,15,407 महिलाएं शामिल थीं। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इस आबादी में एक बहुत बड़ी संख्या महिलाओं की भी है, जिन्हें दोहरे स्तर पर भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, केवल कुल आबादी का आंकड़ा जान लेना ही काफी नहीं है, बल्कि यह देखना भी अति आवश्यक है कि इनमें से कितने बच्चे आज भी नियमित रूप से स्कूल की दहलीज लांघ पा रहे हैं, कितने युवाओं के पास स्थाई रोजगार है, और कितने लोग बिना किसी बाहरी मदद के अपने गांव या शहर में स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकते हैं। जब तक एक भी व्यक्ति रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर पूरी तरह निर्भर रहने को विवश है, तब तक हमारी विकास यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी।
असली विकास का पैमाना यह होना चाहिए कि क्या हमारे गांव और शहर इतने सक्षम हैं कि वे समाज के हर वर्ग को समान अवसर दे सकें। एक आदर्श व्यवस्था वही है जहां सहायता प्राप्त करना व्यक्ति का नागरिक अधिकार हो, लेकिन हर पग पर किसी दूसरे की बैसाखी का सहारा लेना उसकी मजबूरी न बने।
"दिव्यांगजनों को समाज में दया की भीख नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने और आगे बढ़ने के समान अवसरों की आवश्यकता है। एक समावेशी समाज वही है जहां व्यवस्था हर नागरिक के लिए सुगम हो।" — सामाजिक विशेषज्ञ एवं नीति विश्लेषक
निष्कर्ष: संवेदनशीलता से परे ठोस बदलाव की जरूरत
दिव्यांगजनों के जीवन को सुगम बनाने के लिए केवल सहानुभूति जताने से काम नहीं चलने वाला है। इसके लिए नीतिगत स्तर पर ठोस बदलाव लाने की दरकार है। जब तक सरकारी भवनों, स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक बसों में उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्माण कार्य नहीं होंगे, तब तक यह खाई भर नहीं सकती। स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य स्तर तक के योजनाकारों को यह समझना होगा कि सुगम्य भारत अभियान जैसे प्रोजेक्ट्स को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर पूरी कड़ाई से लागू किया जाए। रोजगार सृजन के ऐसे विशेष कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जो इन लोगों की कार्यकुशलता के अनुकूल हों। इसके अलावा, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त या बेहद कम कीमत पर अत्याधुनिक सहायक उपकरण उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। जब समाज का हर एक नागरिक बिना किसी भेदभाव और बाधा के अपनी मंजिल तक पहुंचने में सक्षम होगा, तभी देश वास्तव में आत्मनिर्भर और प्रगतिशील कहलाएगा।








