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नरेंद्र मोदी सरकार पर बढ़ रहा है सियासी दबाव, लेकिन विपक्षी दलों की अंदरूनी कलह से राह मुश्किल

भारतीय राजनीति में इस वक्त एक अजीब सी कशमकश चल रही है जहां नरेंद्र मोदी सरकार कई मोर्चों पर घिरी है, वहीं विपक्षी INDIA गठबंधन के भीतर बिखराव और आपसी मतभेद मजबूत राजनीतिक विकल्प उभरने में बड़ी बाधा बन रहे हैं.
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•1 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•46
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नरेंद्र मोदी सरकार पर बढ़ रहा है सियासी दबाव, लेकिन विपक्षी दलों की अंदरूनी कलह से राह मुश्किल
📷 नरेंद्र मोदी सरकार पर बढ़ रहा है सियासी दबाव, लेकिन विपक्षी दलों की अंदरूनी कलह से राह मुश्किल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • नरेंद्र मोदी सरकार को चुनाव आयोग, वोटर-रोल सॉफ्टवेयर और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है.
  • हाल ही में हुई INDIA ब्लॉक की बैठक में आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे दलों ने दूरी बना ली, जिससे विपक्षी एकता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.
  • राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी से मुकाबला करने की बात करने वाले क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानते हैं.
  • अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के अलग-अलग रुख और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के चलते साझा रणनीति तैयार करना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक अत्यंत रोचक और जटिल स्थिति बनती दिखाई दे रही है। एक तरफ जहां केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को कई नीतिगत और प्रशासनिक मुद्दों पर विपक्ष के कड़े हमलों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के खेमे में भी इस राजनीतिक अवसर को भुनाने की वैसी मुकम्मल तैयारी नजर नहीं आ रही है, जैसी एक मजबूत और प्रभावी विकल्प के लिए जरूरी होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि भले ही सरकार के सामने मुश्किलें बढ़ी हों, लेकिन विपक्ष की सियासी राह भी उतनी ही कांटों भरी बनी हुई है।

विपक्ष के निशाने पर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त

बीते कुछ समय से देश की सियासत में कई ऐसे गंभीर मुद्दे उभरे हैं जिनके चलते सरकार को बार-बार सफाई देनी पड़ी है। विशेष रूप से चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दल लगातार हमलावर रहे हैं। इसके अलावा एसआईआर (SIR) से जुड़े मामलों और वोटर-रोल के सॉफ्टवेयर में बदलाव की घोषणा को लेकर भी सियासी पारा काफी चढ़ गया है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं में किए गए संशोधनों पर विपक्षी नेताओं ने गहरी आपत्ति जताई है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के खिलाफ बताया है।

यह पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष को किसी बड़े विवाद के कारण राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले नीट परीक्षा और देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर विवादों पर भी सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरा गया था। इन तमाम प्रकरणों के दौरान कई बड़े राजनीतिक फेरबदल और मंत्रियों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार की किसी कमजोरी या असहज स्थिति का होना और विपक्ष द्वारा उसका सफल राजनीतिक लाभ उठाया जाना, दोनों बिलकुल अलग बातें हैं।

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INDIA गठबंधन में बिखराव और आपसी मतभेदों की दीवार

राजनीतिक सुगबुगाहट के बीच हाल ही में हुई INDIA ब्लॉक की बैठक ने विपक्षी एकता के दावों की पोल खोल दी है। इस महत्वपूर्ण बैठक में विपक्षी एकजुटता की तस्वीर पूरी तरह साफ और मजबूत नहीं दिख सकी। आम आदमी पार्टी और दक्षिण के प्रमुख दल डीएमके ने इस बैठक से पूरी तरह किनारा कर लिया। 'आप' ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि वह अब औपचारिक रूप से INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है, हालांकि उसने चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे कदमों को समर्थन देने की बात जरूर कही है।

दूसरी तरफ, डीएमके ने भी मौजूदा विपक्षी गठबंधन से खुद को अलग करते हुए तमिलनाडु की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस के साथ चल रहे वैचारिक और चुनावी मतभेदों को इसकी मुख्य वजह बताया। गठबंधन के भीतर इस तरह की दूरियां यह साबित करती हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा मंच तैयार करना और उसे जमीन पर उतारना कितना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। क्षेत्रीय दलों की अपनी स्थानीय राजनीतिक प्राथमिकताएं राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर भारी पड़ रही हैं।

सपा और शिवसेना के रुख से उलझी रणनीति की गुत्थी

विपक्षी खेमे में अन्य प्रमुख दलों की स्थिति भी कम पेचीदा नहीं है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की इस अहम बैठक में अनुपस्थिति को लेकर कई तरह के कयास लगाए गए, हालांकि उनकी पार्टी के प्रतिनिधियों ने बैठक में हिस्सा लिया और उनकी गैरमौजूदगी की वजह उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के नामांकन से जुड़ी व्यस्तताएं बताई गईं। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस बैठक में वर्चुअली हिस्सा लिया, लेकिन उनकी पार्टी भी कई मौकों पर कांग्रेस की 'एकला चलो' नीति की तीखी आलोचना कर चुकी है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की अनिवार्यता पर जोर देती रही हैं, लेकिन बंगाल के राजनीतिक समीकरण और अन्य राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रपों के समीकरण जमीन पर एक जैसे बिल्कुल नहीं हैं। ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच राज्य स्तर पर असहजता जगजाहिर है। यही कारण है कि केवल शीर्ष स्तर के नेताओं के बयानों से जमीन पर कोई मजबूत सियासी समीकरण तैयार नहीं हो पा रहा है।

"राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए विपक्ष को पहले अपने घर के भीतर मौजूद अंतविरोधों को खत्म करना होगा। जब तक क्षेत्रीय दल अपने राज्यों में कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानेंगे, तब तक एक साझा और प्रभावी राजनीतिक रणनीति का जमीन पर उतरना बेहद कठिन रहेगा।" — वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

क्या साझा लड़ाई लड़ने को तैयार हैं विपक्षी दल?

इन तमाम घटनाओं और बयानों से राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बहुत जोरशोर से उठ रहा है कि क्या विपक्ष के ये तमाम दल वास्तव में किसी दीर्घकालिक और साझा राजनीतिक लड़ाई को लड़ने के लिए मानसिक और वैचारिक रूप से तैयार हैं? या फिर उनकी यह एकता केवल तात्कालिक और चुनावी जरूरत के मुद्दों तक ही सीमित है? उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच का रिश्ता हो या महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी के भीतर खींचतान, हर जगह सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलती दिखती है।

जब तक विपक्षी दल अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई को दरकिनार कर एक व्यापक राष्ट्रीय एजेंडे पर पूरी ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तब तक वे सरकार की कमजोरियों का मुकम्मल राजनीतिक फायदा उठाने में असफल ही रहेंगे। आने वाले दिनों में चुनावी राज्यों के नतीजे तय करेंगे कि यह बंटा हुआ विपक्ष आखिरकार किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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