छत्तीसगढ़ के सरकारी कॉलेजों में प्रोफेसर नियुक्ति के नियमों में ऐतिहासिक बदलाव
देशभर में उच्च शिक्षा क्षेत्र में लगातार नए बदलाव देखने को मिल रहे हैं, और इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के शासकीय महाविद्यालयों में प्रोफेसर बनने के नियमों में बड़ा संशोधन किया है। राज्य शासन द्वारा छत्तीसगढ़ शैक्षणिक सेवा (महाविद्यालयीन शाखा, राजपत्रित) भर्ती नियम-2019 में संशोधन किए जाने के बाद अब प्रोफेसर के पदों पर चयन प्रक्रिया का पूरा गणित बदल चुका है। नए नियमों के प्रभावी होने के बाद अब असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफेसर बनने की राह देख रहे इन-सर्विस शिक्षकों के लिए पदोन्नति के रास्ते काफी हद तक आसान हो गए हैं, वहीं बाहरी उम्मीदवारों के लिए सीधी भर्ती के दरवाजे सीमित हो गए हैं।
पूर्व में व्यवस्था यह थी कि प्रोफेसर के शत-प्रतिशत यानी 100% पद सीधी भर्ती के माध्यम से ही भरे जाते थे, जिसमें छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग यानी सीजीपीएससी की भूमिका मुख्य होती थी। लेकिन इस ताज़ा संशोधन के बाद अब समीकरण पूरी तरह पलट गए हैं। उच्च शिक्षा विभाग के प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेशभर में कुल 343 शासकीय कॉलेज संचालित हो रहे हैं, जिनमें प्रोफेसर के कुल 781 पद स्वीकृत हैं। अब इन स्वीकृत पदों पर नियुक्ति और प्रमोशन का नया फार्मूला लागू किया जा चुका है, जिसका असर आने वाले वर्षों में उच्च शिक्षा व्यवस्था पर साफ तौर पर दिखाई देगा।
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75% पदों पर प्रमोशन और 25% पर सीधी भर्ती का नया गणित
संशोधित नियमों की बारीकी पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि अब सरकारी कॉलेजों में प्रोफेसर के कुल पदों में से तीन-चौथाई यानी 75 फीसदी हिस्सेदारी पदोन्नति के कोटे में चली गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकारी कालेजों में पहले से सेवारत और पात्रता पूरी करने वाले योग्य शिक्षकों को प्रोफेसर बनने का सीधा और बड़ा अवसर मिलेगा। विभागीय पदोन्नति समिति यानी डीपीसी की बैठकों के जरिए इन पदों को भरा जाएगा, जिससे वर्षों से एक ही पद पर अटके शिक्षकों की करियर ग्रोथ को नई गति मिलेगी।
दूसरी ओर, सीधी भर्ती के लिए सिर्फ 25 फीसदी पद ही छोड़े गए हैं। इन सीमित पदों पर चयन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के कंधों पर होगी, जो निर्धारित चयन प्रक्रिया के तहत लिखित परीक्षा या इंटरव्यू के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों का चयन करेगा। प्रोफेसर का यह पद प्रथम श्रेणी (क्लास-वन गजेटेड) का होता है, जिसके लिए न्यूनतम आयु सीमा 31 वर्ष और अधिकतम आयु सीमा 56 वर्ष तय की गई है। हालांकि, आरक्षित श्रेणियों और अन्य प्रावधानों के तहत मिलने वाली छूट के बाद भी सीधी भर्ती में अधिकतम आयु सीमा किसी भी स्थिति में 61 वर्ष से अधिक नहीं हो पाएगी।
साल 2021 की पहली सीधी भर्ती अब भी फाइलों में कैद
राज्य के गठन के बाद यह ऐतिहासिक मौका था जब छत्तीसगढ़ के सरकारी कॉलेजों में वर्ष 2021 में प्रोफेसर के 595 पदों के लिए पहली बार सीधी भर्ती का विज्ञापन निकाला गया था। हालांकि, विडंबना यह है कि यह बहुप्रतीक्षित भर्ती प्रक्रिया पांच साल बीत जाने के बाद भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है। पिछले साल सीजीपीएससी द्वारा उम्मीदवारों के दस्तावेजों का सत्यापन जरूर किया गया था, लेकिन इसके बावजूद अब तक पात्र और अपात्र अभ्यर्थियों की अंतिम सूची का प्रकाशन नहीं किया गया है।
दस्तावेज सत्यापन के बाद इंटरव्यू का दौर और अंतिम चयन सूची आना अभी बाकी है। वर्ष 2021 की इस पुरानी भर्ती में यह नियम था कि सभी पद सीधी भर्ती से भरे जाएंगे, लेकिन अब जब नए नियमों के तहत सीधी भर्ती के कोटे को घटाकर मात्र 25 प्रतिशत कर दिया गया है, तो आने वाले समय में नई भर्तियों के विज्ञापनों का इंतजार कर रहे युवाओं को लंबी निराशा का सामना करना पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि जब तक पुरानी अटकी हुई प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक नई सीधी भर्तियों की उम्मीद बेहद कम है।
निजी कालेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की बढ़ी मुश्किलें
सरकार के इस नीतिगत बदलाव का सबसे ज्यादा और सीधा असर उन होनहार और अनुभवी शिक्षाविदों पर पड़ा है जो फिलहाल निजी कॉलेजों, संस्थानों और निजी विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ समेत देश के कई हिस्सों में ऐसे तमाम योग्य शिक्षक हैं जो प्रोफेसर पद के लिए जरूरी शैक्षणिक योग्यता, रिसर्च पेपर और अनुभव के मानदंडों को पूरा करते हैं। पहले जब शत-प्रतिशत पद सीधी भर्ती के लिए खुले थे, तब इन बाहरी शिक्षकों के पास सरकारी सेवा में सीधे प्रोफेसर बनने का एक मजबूत और सुनहरा अवसर हुआ करता था।
लेकिन अब जबकि सीधी भर्ती के लिए केवल 25 प्रतिशत पद ही उपलब्ध रह गए हैं, निजी संस्थानों के अनुभवी शिक्षकों के लिए सरकारी क्षेत्र में जगह बना पाना बेहद कठिन प्रतिस्पर्धा बन गया है। इस सीमित अवसरों के चलते अकादमिक जगत में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है और सीधी भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के बीच भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। उच्च शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से जहां एक तरफ सरकारी सिस्टम के भीतर काम कर रहे शिक्षकों का मनोबल बढ़ेगा और प्रमोशन के लंबे इंतजार से राहत मिलेगी, वहीं बाहर से आने वाली नई प्रतिभाओं के लिए मार्ग बहुत संकरा हो जाएगा।
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह
शिक्षा क्षेत्र के विश्लेषकों का कहना है कि राज्य सरकार का यह फैसला एक तरफ जहां इन-सर्विस टीचर्स के करियर प्रोग्रेस को बढ़ावा देने वाला है, वहीं दूसरी तरफ पारदर्शी और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया की मांग भी उतनी ही जरूरी है। जब तक सरकार पुरानी लंबित भर्तियों को समय पर पूरा नहीं करती, तब तक नियमों में बदलाव का जमीनी असर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाएगा।
"सरकारी कालेजों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए पारदर्शी और नियमित चयन प्रक्रिया का होना सबसे अनिवार्य शर्त है। भले ही प्रमोशन के अवसर बढ़ाए गए हों, लेकिन सीधी भर्ती के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए ताकि अकादमिक प्रतिस्पर्धा बनी रहे।" — शिक्षा विशेषज्ञ, द फ्रीलान्स रिसर्च विंग
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग का यह नया संशोधन आने वाले दिनों में शैक्षणिक गलियारों में बहस का मुख्य केंद्र बना रहेगा। एक तरफ जहां पुराने शिक्षकों के लिए तरक्की के द्वार चौड़े हो गए हैं, वहीं दूसरी तरफ युवा और बाहर के योग्य उम्मीदवारों को सरकारी प्रोफेसर बनने के लिए अब बेहद कड़ी परीक्षा और सीमित सीटों की चुनौती का सामना करना होगा।








