नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश की राजनीति में इस समय एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को मिलने का समय देने से साफ मना कर दिया है। विपक्षी नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मिलने का वक्त मांगा था। लेकिन सीजेआई कार्यालय की ओर से साफ कह दिया गया है कि मौजूदा हालात में यह मुलाकात संभव नहीं हो सकती है।
विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयुक्त यानी सीईसी के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों और अन्य मुद्दों को लेकर मिलने की इच्छा जताई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नियमों और गरिमा को ध्यान में रखते हुए सीजेआई ने इस मुलाकात से दूरी बना ली है। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि अदालत में कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले लंबित हैं। ऐसे समय में राजनीतिक नेताओं से इस तरह की सीधी मुलाकात करना उचित नहीं माना जा सकता है।
सीजेआई का साफ संदेश, सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले
मुलाकात से इनकार करने के साथ ही सीजेआई सूर्यकांत ने एक पत्र के जरिए बहुत बड़ी बात कही है। उन्होंने लिखा है कि भारतीय न्यायपालिका के दरवाजे हर नागरिक के लिए हमेशा खुले हैं। यदि किसी भी पक्ष को कोई गंभीर शिकायत या कानूनी समस्या है, तो वह सीधे अदालत में उचित याचिका दायर कर सकता है। नियमों के मुताबिक ही हर मामले पर सुनवाई की जाएगी और फैसला लिया जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सीजेआई का यह रुख न्यायपालिका की निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है। अदालत किसी भी बाहरी दबाव या राजनीतिक मुलाकातों से दूर रहकर अपना काम करती है। जब मामले पहले से ही अदालत की चौखट पर विचाराधीन हों, तब इस प्रकार की बैठकें न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर सकती हैं। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने बहुत ही सधे हुए अंदाज में अपनी स्थिति साफ कर दी है।
लंबित मामलों के बीच मुलाकात से क्यों बचना चाहती है न्यायपालिका
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह बात बार-बार कही जाती रही है कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामले इस समय देश की राजनीति में बहुत गर्म हैं। विपक्षी दल लगातार सरकार और इन संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में यदि सीजेआई विपक्षी नेताओं से मुलाकात करते, तो इसके गलत राजनीतिक मायने निकाले जा सकते थे।
आम जनता और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस फैसले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता का बड़ा कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि अदालत को राजनीतिक बहसों से दूर ही रहना चाहिए। वहीं दूसरी ओर विपक्षी खेमे में इस बात को लेकर नाराजगी भी देखने को मिल रही है। वे अपनी बात सीधे देश के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंचाना चाहते थे ताकि उनकी चिंताओं पर तुरंत ध्यान दिया जा सके।
कानूनी रास्ता अपनाने की सलाह, आगे क्या होगा
सीजेआई के इस पत्र के बाद अब साफ हो गया है कि विपक्षी दलों को अपनी बात मनवाने के लिए केवल कानूनी रास्तों का ही सहारा लेना होगा। सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों और बयानों से हटकर उन्हें अब अदालत के भीतर मजबूती से अपनी दलीलें रखनी होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कागजी प्रक्रिया और नियमों के दायरे में ही हर सुनवाई संभव है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीति और तेज हो सकती है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार के साथ-साथ अब न्यायिक प्रक्रियाओं पर भी अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं। देखना यह होगा कि विपक्षी नेता अब इस मामले में आगे कौन सा नया कानूनी कदम उठाते हैं और सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या रुख अपनाता है।










