नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में अदालती आदेशों और कानूनी दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले कुछ घंटों में सामने आए ताजा मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों और न्यायपालिका दोनों को चौंका दिया है। एक तरफ जहां फर्जी आदेश के जरिए शातिर कैदी जेल से बाहर आ जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में अदालती आदेशों पर सियासी घमासान मचा हुआ है। द फ्रीलान्स की टीम ने इन सभी मामलों की जमीनी और कागजी पड़ताल की है, जिससे यह साफ होता है कि व्यवस्था में किस तरह की सेंधमारी की जा रही है।
ताजा घटनाओं की कड़ी में सबसे हैरान करने वाला मामला कर्नाटक से सामने आया है। यहाँ सुप्रीम कोर्ट का एक फर्जी आदेश दिखाकर जेल में बंद एक खतरनाक कैदी को चुपचाप रिहा करा लिया गया। इस गंभीर मामले में जेल विभाग के डीआईजी स्तर के अधिकारी को हिरासत में ले लिया गया है। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि आदेश पूरी तरह जाली था और उस पर किसी असली जज के हस्ताक्षर नहीं थे। इसके बावजूद जेल के भीतर कागजों का सत्यापन किए बिना कैदी को छोड़ दिया गया। इस घटना ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा दाग लगा दिया है।
पंजाब में सीबीआई जांच के आदेश पर सियासी भूचाल
दूसरी तरफ पंजाब की राजनीति में अदालती आदेशों को लेकर भारी गहमागहमी का माहौल है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य में 61 प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है। इस बड़े फैसले के बाद राज्य की नौकरशाही में हड़कंप मच गया है। सरकार के भीतर काम करने वाले बिचौलियों और संदिग्ध लोगों की बेचैनी काफी बढ़ गई है। अदालत के इस फैसले को प्रशासनिक भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ने वाला एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस आदेश के बाद राज्य सरकार पर सीधे हमले बोल दिए हैं और भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त लोगों के चेहरे बेनकाब होने की बात कही है।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। मजीठिया ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हाईकोर्ट के इस आदेश से भ्रष्टाचार का पूरा सच अब जनता के सामने आ जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कई मामलों में गड़बड़ी की गई थी, जिसे छिपाने की पूरी कोशिश की गई थी। अब केंद्रीय एजेंसी की जांच से सारे राज बाहर आ जाएंगे। विपक्षी नेताओं का यह भी कहना है कि जनता का पैसा किन हाथों में गया, इसकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी थी।
मान सरकार का सुप्रीम कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट के इस कड़े आदेश के खिलाफ पंजाब की भगवंत मान सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मान सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें सीएमओ से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की सीबीआई जांच कराने को कहा गया था। राज्य सरकार का तर्क है कि इस तरह की जांच से राज्य के प्रशासनिक कामकाज में अनावश्यक दखलंदाजी होती है। वकीलों के जरिए सरकार ने दलील दी है कि स्थानीय मामलों में केंद्रीय एजेंसियों को शामिल करना संघीय ढांचे के खिलाफ है। इस कानूनी लड़ाई के बाद अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले रुख पर टिकी हैं कि सर्वोच्च अदालत इस मामले में क्या फैसला देती है।
इन तमाम घटनाओं के बीच अलीगढ़ से भी अदालत और प्रशासन के एक्शन की एक तस्वीर सामने आई है। अलीगढ़ के तुलसी रेजिडेंसी इलाके में अवैध निर्माण के खिलाफ एडीए यानी अलीगढ़ विकास प्राधिकरण की टीम ध्वजस्तीकरण की कार्रवाई करने पहुंची थी। हालांकि भारी विरोध और स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद टीम सिर्फ मुख्य चौखट तोड़कर ही वापस लौट आई। इस कार्रवाई को लेकर भी स्थानीय स्तर पर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि नियमों के तहत ही बुलडोजर कार्रवाई की गई थी, लेकिन विरोध के आगे फिलहाल कदम पीछे खींचने पड़े।
कानून और व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां
देश के अलग-अलग कोनों से सामने आए ये मामले बताते हैं कि अदालती आदेशों और कानूनी प्रक्रिया का किस तरह से दुरुपयोग करने की कोशिशें हो रही हैं। एक तरफ जहां डिजिटल और कागजी दस्तावेजों की सुरक्षा में सेंध लगाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ बड़े राजनीतिक मामलों में जांच से बचने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा रहा है। द फ्रीलान्स इन सभी मामलों पर बारीकी से नजर बनाए हुए है और आगे भी पाठकों तक हर सच पहुंचाता रहेगा।







