राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हिमालय की सबसे ऊंची चोटियों के बीच से गुजरने वाली रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अटल टनल का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने इस बुनियादी ढांचे की सराहना करते हुए इसे भारत की तकनीकी ताकत, अटूट मेहनत और अडिग इरादों की पहचान बताया। राष्ट्रपति ने कहा कि यह सुरंग केवल कंक्रीट और लोहे का एक ढांचा भर नहीं है, बल्कि देश के संकल्प का जीता-जागता सबूत है।
इंजीनियरिंग का चमत्कार और रणनीतिक महत्व
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, अटल टनल वैश्विक मानकों के अनुरूप इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ चमत्कार है। सीमा सड़क संगठन (BRO) के जवानों ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में इसे तैयार किया है। यह आइकॉनिक इंफ्रास्ट्रक्चर इस बात का सबूत है कि भारत सबसे मुश्किल भौगोलिक इलाकों में भी बिना किसी रुकावट के कनेक्टिविटी देने की क्षमता रखता है।
अटल टनल के निर्माण से पहले रोहतांग दर्रा सर्दियों के मौसम में करीब 6 महीने तक बर्फबारी के कारण बंद रहता था। इससे लाहौल-स्पीति के स्थानीय लोगों और भारतीय सेना दोनों के सामने गंभीर संकट पैदा हो जाता था। अब 9.02 किलोमीटर लंबी यह सुरंग मनाली और लेह के बीच के सफर को साल भर खुला रखती है, जिससे सेना के मूवमेंट और आम नागरिकों की आवाजाही दोनों आसान हो गए हैं।
अत्यंत कठिन परिस्थितियों में हुआ निर्माण
समुद्र तल से 10 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर बनी यह दुनिया की सबसे लंबी हाईवे टनल है। इसके भीतर आधुनिक सुरक्षा तंत्र, पर्याप्त ऑक्सीजन सप्लाई और लाइटिंग के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। बर्फीले तूफानों, भयंकर भूस्खलन और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच BRO के इंजीनियरों और श्रमिकों ने दिन-रात मेहनत कर इस चुनौती को पार किया।
बता दें कि इस सामरिक रूप से अहम टनल का शिलान्यास साल 2002 में हुआ था और इसे पूरा होने में करीब 18 साल का लंबा समय लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 अक्टूबर 2020 को इसे राष्ट्र को समर्पित किया था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखी गई यह परियोजना आज नए भारत की कार्यशैली की मिसाल बन चुकी है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आधिकारिक बयानों के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह दौरा देश के सामरिक और ढांचागत विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है। साभार: राष्ट्रपति सचिवालय / पीआईबी।






