पश्चिम बंगाल में इस साल दुर्गा पूजा का माहौल सिर्फ भक्ति और उत्सव तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह बड़े राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बन गया है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से पूजा समितियों के संचालन और नियंत्रण को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों की खबरें सामने आई हैं। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए प्रशासन ने कई संवेदनशील इलाकों में रैपिड एक्शन फोर्स यानी आरएएफ की भारी तैनाती कर दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूजा पंडालों पर वर्चस्व और चंदा वसूली को लेकर दोनों दलों के स्थानीय नेता आमने-सामने आ गए हैं, जिससे आम जनता और श्रद्धालुओं में डर का माहौल बना हुआ है।
इस बीच, देवी दुर्गा की मूर्तियों के स्वरूप को लेकर भी नया विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में देवी दुर्गा के 'एकादश भुजा' यानी ग्यारह हाथों वाले स्वरूप को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। राजनीतिक नेताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि पूजा समितियों और कलाकारों को सनातन परंपराओं के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। उनका तर्क है कि शास्त्रों में मां दुर्गा के पारंपरिक रूपों का जो वर्णन है, उसी का पालन किया जाना चाहिए। इस बयान के बाद से बंगाल की राजनीति में धार्मिक भावनाओं और परंपराओं की रक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है, और विरोधी दल एक-दूसरे पर तुष्टिकरण व संस्कृति से खिलवाड़ का आरोप लगा रहे हैं।
700 साल पुरानी अनोखी परंपरा और भात का भोग
एक तरफ जहां राजनीतिक दलों में टकराव जारी है, वहीं दूसरी तरफ बंगाल और देश के कुछ हिस्सों में सदियों पुरानी परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं। एक ऐतिहासिक दुर्गा पूजा की परंपरा करीब 700 साल पुरानी है, जहां मुख्य उत्सव से पूरे 15 दिन पहले ही पूजा की शुरुआत हो जाती है। इस लंबी अवधि के दौरान हर दिन मां को विशेष रूप से 'भात का भोग' यानी पके हुए चावल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस अनूठी परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और इसमें स्थानीय समाज का हर वर्ग बिना किसी भेदभाव के हिस्सा लेता है।
इसी कड़ी में नरसिंहगढ़ की सार्वजनिन बासंती दुर्गा पूजा कमेटी ने भी पारंपरिक विधि-विधान के साथ मां बासंती की पूजा का आयोजन किया है। चैत्र नवरात्रि के दौरान होने वाली इन पूजाओं का अपना अलग ही आध्यात्मिक महत्व होता है। ग्रामीण इलाकों में इस दौरान घरों और पूजा पंडालों में जौ यानी 'जयंती' बोने की प्राचीन प्रथा आज भी कायम है। जानकारों के अनुसार, जयंती बोना और उसकी हरियाली देखना सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कृषि और प्रकृति से जुड़ी इन मान्यताओं के कारण ग्रामीण इलाकों में नवरात्रि का पर्व किसी बड़े लोक उत्सव की तरह मनाया जाता है, जहां हर कोई फसल की अच्छी पैदावार और परिवार की खुशहाली की कामना करता है।
प्रशासन की कड़ी चौकसी और शांति बनाए रखने की अपील
त्योहारों के इस सीजन में कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पुलिस और खुफिया विभाग उन सभी पूजा समितियों पर पैनी नजर रख रहे हैं जहां पहले भी राजनीतिक तनाव देखा गया था। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि पूजा पंडालों का इस्तेमाल राजनीतिक मंच के रूप में करने या माहौल बिगाड़ने की कोशिश करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने दोनों पक्षों के स्थानीय नेताओं के साथ शांति बैठकें भी की हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्व का माहौल शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण बना रहे।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने पाया कि आम जनता और असली पूजा आयोजक इन राजनीतिक विवादों से बेहद आहत हैं। उनका मानना है कि राजनीति के चक्कर में सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की पवित्रता भंग हो रही है। लोग चाहते हैं कि नेता अपने राजनीतिक फायदे के लिए धर्म और त्योहारों का इस्तेमाल बंद करें, ताकि हर साल की तरह इस बार भी दुर्गा पूजा भाईचारे और उल्लास के साथ मनाई जा सके। फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है और सुरक्षाबलों की गश्त लगातार जारी है।







