नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के चुनावी तंत्र में इस्तेमाल होने वाले नए सॉफ्टवेयर 'ईसीआईनेट' को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस प्रणाली की सुरक्षा और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में एसआईआर विवाद के बीच चुनाव आयोग से ईसीआईनेट और ईरोंनेट के सभी एक्सेस लॉग्स का पूरा ब्योरा मांगा है। इस मांग के बाद राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर बहस छिड़ गई है।
शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग ने हाल ही में घर-घर जाकर डेटा जुटाने और समीक्षा करने के लिए ईसीआईनेट सिस्टम में कुछ बदलाव किए हैं। हंगामे के बाद आयोग ने कई विवादित घोषणाओं को हटा दिया है और फॉर्म 7 के तहत नामों को हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया में कुछ सीमाएं तय कर दी हैं। हालांकि, इन बदलावों के बावजूद सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामियों को लेकर विपक्षी दलों और जानकारों की चिंताएं कम नहीं हुई हैं।
सॉफ्टवेयर की सुरक्षा पर उठे सवाल और डेटा सिंडिकेट के दावे
राष्ट्रीय और स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया है कि चुनावी डेटा और तकनीकी सिंडिकेट का यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में अंतरराष्ट्रीय तकनीकी नेटवर्क और कंपनियों के साथ इस सॉफ्टवेयर के जुड़ाव पर भी सवाल उठाए गए हैं। जानकारों का कहना है कि चुनाव जैसा संवेदनशील डेटा एक निजी या बाहरी तकनीकी ढांचे के पास होना देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग ने सॉफ्टवेयर में तकनीकी कमियां और गड़बड़ियां सामने आने के बावजूद इस पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक चुनाव आयोग इन सभी तकनीकी आपत्तियों पर खुलकर सफाई नहीं देता, तब तक मतदाताओं और राजनीतिक दलों के मन में संदेह बना रहेगा। पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए यह जरूरी है कि हर एक डिजिटल कदम का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखा जाए।
मैदान पर मतदाता जागरूकता और जमीनी हकीकत
एक तरफ जहां सॉफ्टवेयर को लेकर राजनीतिक घमासान मचा है, वहीं दूसरी तरफ मैदानी इलाकों में स्थानीय प्रशासनिक अमला मतदाता जागरूकता अभियान चलाने में जुटा हुआ है। कई जिलों में अधिकारियों ने ईसीआईनेट ऐप के जरिए नए पंजीकरण की जानकारी आम जनता को देनी शुरू कर दी है। प्रशासन का दावा है कि इस ऐप के आ जाने से मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और सुधार करने का काम पहले से काफी आसान हो गया है।
लेकिन जमीनी स्तर पर काम कर रहे बूथ लेवल अफसरों का कहना है कि तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण उन्हें इस नए ऐप को चलाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर सर्वर डाउन रहने और ओटीपी न आने जैसी समस्याएं आम बात हो गई हैं। ग्रामीण इलाकों के लोगों को डिजिटल पंजीकरण की प्रक्रिया समझ नहीं आ रही है, जिससे उन्हें बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और आगे की राह
द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की, तो यह बात सामने आई कि तकनीकी आधुनिकता के नाम पर जल्दबाजी में लागू किए गए इस सिस्टम की अभी पूरी तरह टेस्टिंग नहीं हुई है। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह विपक्ष द्वारा मांगे गए एक्सेस लॉग्स को सार्वजनिक करे ताकि पारदर्शिता बनी रहे। जब तक चुनाव प्रक्रिया पर देश के हर नागरिक का अटूट भरोसा नहीं बनता, तब तक किसी भी नए सॉफ्टवेयर की सफलता पर सवाल बने रहेंगे।


