जब भी भारत में इंटरनेट पर सर्च की बात आती है, तो 'एकादशी कब है' (Ekadashi kab hai) एक ऐसा सवाल है जो सालभर किसी न किसी रूप में शीर्ष पर बना रहता है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब इस डिजिटल ट्रेंड के पीछे के कारणों को टटोला, तो सामने आया कि यह सिर्फ एक साधारण सवाल नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा, खगोलीय गणनाओं और विभिन्न पंचांगों के बीच चल रहे सूक्ष्म अंतर का परिणाम है। हाल ही में इंदिरा एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी जैसी तिथियों को लेकर राष्ट्रीय मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर दिखी तारीखों की गफलत ने आम श्रद्धालुओं को असमंजस में डाल दिया है।
तारीखों का यह फेरबदल और मीडिया रिपोर्टों की हकीकत
अक्टूबर की शुरुआत में जहां 'इंदिरा एकादशी' की तारीख को लेकर 6 या 7 अक्टूबर के बीच असमंजस की स्थिति बनी, वहीं सितंबर के मध्य में 'परिवर्तिनी एकादशी 2026' के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही हाल दिखा। कहीं इसे 21 सितंबर तो कहीं 22 या 23 सितंबर को होने का दावा किया गया। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे इंडिया टीवी, जनसत्ता, हिंदुस्तान, एनडीटीवी और आज तक) पर नजर डालें तो हर मंच अपने स्रोतों और स्थानीय पंचांगीय गणनाओं के आधार पर सही तिथि और शुभ मुहूर्त का दावा कर रहा था। लेकिन सवाल यह है कि एक ही व्रत के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों और पंचांगों में इतनी भिन्नता क्यों आ जाती है?
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सूर्य उदय, तिथि का क्षय और पंचांगीय गणित
इस ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान जब हमने वाराणसी और उज्जैन के कुछ प्रतिष्ठित ज्योतिषियों और पंचांगकारों से बात की, तो उन्होंने इसके पीछे के खगोलीय कारणों को समझाया। सनातन कैलेंडर मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। एकादशी तिथि का घटना या बढ़ना, सूर्योदय के समय उसकी स्थिति और 'विद्धा एकादशी' (ऐसी एकादशी जो दशमी से युक्त हो) के नियमों के कारण तिथियों में फेरबदल होता है।
"ज्योतिषीय गणनाएं सटीक होती हैं, लेकिन जब इन्हें अलग-अलग अंचलों के सूर्योदय समय और दृक पंचांग या सूर्य सिद्धांत के साथ लागू किया जाता है, तो तिथियों के चयन में एक दिन का अंतर आ जाता है। यही अंतर आम जनता में असमंजस पैदा करता है," एक वरिष्ठ पंचांगकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।
श्रद्धालुओं की दुविधा और इंटरनेट पर खोज
फील्ड में आम लोगों से मिलने पर यह साफ हुआ कि आज की डिजिटल पीढ़ी व्रत रखने से पहले किसी भी तरह की गलती से बचना चाहती है। वे पंडितों से पूछने के बजाय तुरंत गूगल का रुख करते हैं। लेकिन इंटरनेट पर मौजूद परस्पर विरोधी खबरें उनके संशय को और बढ़ा देती हैं। कोई लेख 21 सितंबर को सही बताता है तो दूसरा 22 सितंबर को पारण का समय घोषित कर देता है। इस डिजिटल युग में सूचनाओं की अति (Information Overload) ने लोगों को और भ्रमित कर दिया है।
निष्कर्ष और भविष्य का परिदृश्य
'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि 'एकादशी कब है' जैसे ट्रेंड्स महज़ एक कीवर्ड नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं और पारंपरिक विज्ञान के बीच के जीवंत संवाद का हिस्सा हैं। जब तक देश में क्षेत्रीय पंचांगों की विविधता बनी रहेगी, तब तक तिथियों को लेकर यह बहस भी इंटरनेट और समाज दोनों जगह प्रासंगिक बनी रहेगी। जरूरत इस बात की है कि भ्रामक जानकारियों से बचकर प्रमाणित और स्थापित स्थानीय पंचांगों पर ही भरोसा किया जाए।








