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अल नीनो का साया: केंद्र सरकार ने घटाया खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य, जानिए किसानों की जेब और फसलों पर कितना होगा असर

मौसम के बदले मिजाज और अल नीनो की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य में कटौती की है। इस फैसले का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि सेक्टर पर पड़ने की संभावना है, जिस पर सरकार ने अभी से खास रणनीतिक तैयारियां शुरू कर दी हैं।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•30 सितंबर 2026 • अपडेटेड•28
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अल नीनो का साया: केंद्र सरकार ने घटाया खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य, जानिए किसानों की जेब और फसलों पर कितना होगा असर
📷 अल नीनो का साया: केंद्र सरकार ने घटाया खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य, जानिए किसानों की जेब और फसलों पर कितना होगा असर — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • वर्ष 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन तय किया गया है।
  • यह नया लक्ष्य पिछले फसल वर्ष के वास्तविक उत्पादन से 2.63 मिलियन टन कम है, हालांकि पिछले साल के शुरुआती लक्ष्य से ज्यादा है।
  • अल नीनो के प्रभाव और कुछ राज्यों में कम बारिश के चलते रबी सीजन की बुवाई और उर्वरक मांग पर विशेष नजर रखी जा रही है।
  • कम पानी वाले क्षेत्रों में धान की जगह दलहन और तिलहन की खेती को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है।

अल नीनो की आहट से कृषि सेक्टर में बढ़ी चिंता

देश के कृषि और ग्रामीण बाजारों में एक बार फिर मौसमी हलचल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। मौसम विज्ञान के मोर्चे पर मिल रहे संकेतों और अल नीनो के संभावित प्रभावों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने आगामी फसल वर्ष 2026-27 के लिए देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य को संशोधित करते हुए नीचे ला दिया है। सरकार का यह रणनीतिक कदम इस बात का प्रमाण है कि बदलते मौसम के मिजाज को हल्के में नहीं लिया जा रहा है, और देश की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए समय रहते एहतियाती उपाय किए जा रहे हैं।

आमतौर पर जब भी मानसून के चक्र में बदलाव या प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने जैसी स्थितियां बनती हैं, तो भारतीय कृषि पर उसका सीधा असर देखने को मिलता है। इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने लंबी बैठकों के बाद नए आंकड़ों पर मुहर लगाई है। देश के विभिन्न राज्यों में पिछले कुछ महीनों के दौरान कभी सूखे जैसे हालात तो कभी अचानक भारी बारिश ने किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, जिसके चलते उत्पादन के अनुमानों में फेरबदल करना अनिवार्य हो गया था।

सरकार द्वारा तय किए गए नए आंकड़ों के मुताबिक, आगामी फसल वर्ष (जुलाई से जून) के दौरान कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 373.93 मिलियन टन निर्धारित किया गया है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वर्ष यानी 2025-26 के शुरुआती अनुमानित लक्ष्य से तो बेहतर है, लेकिन बीते वर्ष हासिल किए गए वास्तविक उत्पादन के मुकाबले थोड़ा कम है। कृषि जानकारों का मानना है कि यथार्थवादी लक्ष्यों को तय करना लंबे समय में खाद्य आपूर्ति और महंगाई को नियंत्रित रखने में मददगार साबित होता है।

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घटाया गया उत्पादन लक्ष्य और पिछले आंकड़ों से तुलना

नवीनतम आधिकारिक घोषणा के अनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 373.93 मिलियन टन तय किया गया है। यदि इसकी तुलना पिछले फसल वर्ष 2025-26 के वास्तविक उत्पादन से की जाए, तो यह लगभग 2.63 मिलियन टन कम बैठता है, क्योंकि उस दौरान कुल 376.56 मिलियन टन का बंपर उत्पादन दर्ज किया गया था। हालांकि, यदि इसकी तुलना 2025-26 के शुरुआती तय लक्ष्य (362 मिलियन टन) से की जाए, तो नया लक्ष्य उससे अभी भी ऊंचा है।

इस पूरे लक्ष्य को दो प्रमुख कृषि सत्रों में बांटा गया है। साल 2026 के खरीफ सीजन के लिए अनाज उत्पादन का लक्ष्य 196.21 मिलियन टन रखा गया है, जबकि आने वाले रबी फसल सीजन के लिए यह लक्ष्य 177.72 मिलियन टन आंका गया है। कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य निर्धारण में मौसम की अनिश्चितताओं के साथ-साथ राज्यों से मिले मैदानी फीडबैक को पूरी प्राथमिकता दी गई है।

विभिन्न राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि मानसून के दौरान असमान बारिश के कारण कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में फसलों को नुकसान उठाना पड़ा है। विशेष रूप से धान के बुवाई क्षेत्र में पिछले साल की तुलना में कुछ कमी दर्ज की गई है, जिसकी भरपाई अन्य फसलों के जरिए करने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का यह संतुलित दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि खाद्यान्न की कमी बाजार में कृत्रिम महंगाई पैदा न कर सके।

रबी फसलों की बुवाई और उर्वरक मांग पर मंडराता साया

खरीफ सीजन के बाद अब देश की निगाहें रबी सीजन की बुवाई पर टिकी हुई हैं। गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों की बुवाई से पहले खाद और पानी की उपलब्धता को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। कृषि विभाग के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, आगामी रबी सीजन के दौरान लगभग 350 लाख टन उर्वरकों की भारी मांग रहने की उम्मीद है, जो पिछले साल की इसी अवधि की मांग से करीब 2 लाख टन अधिक है।

राज्य सरकारों से मिले सुझावों और प्राथमिक डेटा के आधार पर अक्टूबर से मार्च के बीच सब्सिडी वाले उर्वरकों की जरूरत का खाका तैयार किया गया है। इसके तहत यूरिया, डीएपी, एमओपी और कॉम्प्लेक्स खादों की तय मात्रा का वितरण किया जाना है। हालांकि, देश के कई हिस्सों में सितंबर के महीने में सूखे और कम बारिश के चलते खाद की खुदरा बिक्री में सुस्ती देखने को मिली थी, जिससे सप्लाई चेन से जुड़े लोग भी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

"अल नीनो, सूखे और बाढ़ की तमाम चिंताओं के बावजूद हमारे अन्नदाताओं की मेहनत रंग लाएगी और खरीफ व रबी खाद्यान्न उत्पादन में किसी बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है। सरकार ने किसानों की हरसंभव मदद के लिए अप्रैल से ही व्यापक तैयारी शुरू कर दी थी।" — शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि मंत्री

फसल पैटर्न में बदलाव और वैकल्पिक खेती की रणनीति

चुनौतीपूर्ण मौसमी परिस्थितियों से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने पारंपरिक खेती के पैटर्न में बदलाव लाने का निर्णय लिया है। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी या सूखे का खतरा मंडरा रहा है, वहां प्रशासन ने किसानों को अधिक पानी की खपत वाली फसलों से दूर रहने की सलाह दी है। इसके बजाय उन इलाकों में दलहन और तिलहन जैसी कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें उगाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल देश के कुछ राज्यों जैसे कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में बुवाई के रकबे में मामूली कमी दर्ज की गई है। इसके विपरीत, उड़द, बाजरा, ज्वार, तिल और मूंग जैसी फसलों के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी देखी गई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि किसान और सरकार दोनों ही जलवायु अनुकूल खेती की ओर तेज़ी से कदम बढ़ा रहे हैं।

किसानों को किसी भी तरह की खाद या बीज की किल्लत न हो, इसके लिए सहकारी संस्थाएं भी सक्रिय हो गई हैं। उदाहरण के तौर पर, कृभको जैसी संस्थाओं ने गैर-यूरिया उर्वरकों के आयात की पुख्ता योजना तैयार की है ताकि रबी सीजन के दौरान बाजार में डीएपी और एनपीके की कोई कमी न खटके।

राज्यों का दौरा और केंद्र सरकार की आपदा प्रबंधन तैयारी

मौसम की मार झेलने वाले किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया है। जिन इलाकों में अत्यधिक वर्षा, बाढ़ या सूखे के कारण फसलें बर्बाद हुई हैं, वहां केंद्रीय टीमों द्वारा दौरा कर नुकसान का आकलन किया जा रहा है। कृषि मंत्रालय विभिन्न राज्यों के कृषि वैज्ञानिकों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिलकर लगातार उच्चस्तरीय बैठकें कर रहा है ताकि उन्नत किस्म के बीज और आपदा-रोधी तकनीकों को समय पर किसानों तक पहुंचाया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में वैश्विक मौसमी परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो संशोधित लक्ष्यों को आसानी से हासिल किया जा सकता है। सरकार की यह दूरदर्शी रणनीति न केवल किसानों के आर्थिक हितों की रक्षा करेगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी पूरी तरह मजबूत बनाए रखेगी।

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