नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर भारत निर्वाचन आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। हाल ही में आयोग ने मतदाता सूची से नाम हटाने या आपत्ति दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 के गलत इस्तेमाल को रोकने के वास्ते सख्त नियम तय किए हैं। आयोग का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति या समूह एक साथ थोक में फर्जी आवेदन दाखिल करके आम नागरिकों के मताधिकार में बाधा न डाल सके। इस तकनीकी और प्रशासनिक कदम के बीच राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है।
दिल्ली में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य रूप से निर्वाचन आयोग के फैसलों और विपक्ष की रणनीति पर गंभीर चर्चा हुई। विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग के कुछ कदम सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाने वाले रहे हैं और इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक पूरी मजबूती के साथ उठाएंगे ताकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता हर हाल में सुरक्षित रखी जा सके।
पूर्ण आयोग के फैसलों में मतभेद और आंतरिक खींचतान
इस पूरे विवाद के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर भी सब कुछ ठीक न होने की खबरें सामने आई हैं। आयोग के भीतर आंतरिक मतभेदों और असहमति की रिपोर्टों पर सफाई देते हुए मुख्य निकाय ने स्पष्ट किया है कि आयोग के सभी पूर्णकालिक फैसले पूरी तरह से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने मीडिया में चल रही उन खबरों को खारिज किया है जिनमें आंतरिक कलह या असहमति के नोट का दावा किया जा रहा था। अधिकारियों का कहना है कि चुनाव संचालन से जुड़े सभी बड़े फैसले नियमों के दायरे में रहकर ही किए जाते हैं।
आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के भीतर से भी आवाजें उठने लगी हैं। चिराग पासवान के बाद अब भारतीय जनता पार्टी के कुछ अन्य सहयोगियों ने भी निर्वाचन आयोग के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं और कुछ मामलों में स्पष्टीकरण की मांग की है। सहयोगियों का यह रुख राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह साफ होता है कि चुनावी सुधारों और प्रशासनिक फैसलों पर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के घटक भी बारीक नजर बनाए हुए हैं।
क्षेत्रीय दलों और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं
क्षेत्रीय स्तर पर भी इस विवाद का असर साफ दिखाई दे रहा है। खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों और क्षेत्रीय दलों के मंचों से निर्वाचन आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल दागे जा रहे हैं। सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे डिजिटल माध्यमों पर कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने तीखे बयान जारी कर आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि निष्पक्ष चुनाव कराना आयोग की जिम्मेदारी है और हर तरह के संदेह से परे रहकर काम करना उसकी संवैधानिक नैतिक बाध्यता है।
आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर चर्चा गर्म है कि क्या चुनाव आयोग वाकई राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर रहा है या फिर प्रशासनिक फेरबदल से जमीनी स्तर पर मतदाताओं को परेशानी हो रही है। खासकर फॉर्म-7 के नए नियमों के कारण उन आम लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके नाम गलत तरीके से सूची से काट दिए जाते थे, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच छिड़ी जंग से यह मामला और उलझता जा रहा है।
आगामी चुनावों से पहले प्रशासनिक सुधारों की चुनौती
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में चुनाव आयोग के सामने देश भर में होने वाले स्थानीय और विधानसभा चुनावों को पारदर्शी तरीके से संपन्न कराने की बड़ी चुनौती है। आयोग एक तरफ जहां तकनीक का इस्तेमाल कर फर्जीवाड़े को रोकने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों का बढ़ता अविश्वास उसके लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि आयोग को अपनी विश्वसनीयता और मजबूत करने के लिए सभी दलों को साथ लेकर पारदर्शी संवाद स्थापित करना होगा, तभी चुनावी प्रक्रिया पर जनता का पूरा भरोसा कायम रह सकेगा।





