नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के मामलों में इन दिनों कई बड़े बदलाव और खुलासे सामने आ रहे हैं। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीस हजार रुपये और पच्चीस हजार रुपये की वेतन सीमा को लेकर पीएफ कटौती के नियमों में बड़ा अंतर आ गया है। आम कर्मचारियों के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि उनकी सैलरी से कटने वाला पैसा किस गणित के तहत जमा हो रहा है। इसके साथ ही देश भर के दफ्तरों और कंपनियों के लिए ईपीएफओ ने सख्त निर्देश जारी किए हैं ताकि कर्मचारियों के हक का पैसा समय पर उनके खातों तक पहुंच सके।
दूसरी तरफ फरीदाबाद से एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला फर्जीवाड़ा सामने आया है। यहां एबीआरवाई योजना के तहत दो करोड़ चौबीस लाख रुपये की हेराफेरी पकड़ी गई है। आरोप है कि एक कंपनी ने अपने कर्मचारियों के वेतन से पीएफ का हिस्सा तो काटा, लेकिन उसका गलत इस्तेमाल कर सरकारी योजनाओं का फायदा उठा लिया। इस तरह के मामलों ने साफ कर दिया है कि मैदानी स्तर पर जमीनी निगरानी कितनी कमजोर है और कैसे आम मजदूरों की गाढ़ी कमाई के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे खेल की एक-एक परत खंगालने में जुटी हैं ताकि दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जा सके।
वेतन सीमा और पीएफ कटौती का बदला हुआ पूरा गणित
ईपीएफओ के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार वेतन की तय सीमा में बदलाव होने पर पीएफ कटने के नियम भी बदल जाते हैं। अगर किसी कर्मचारी की शुरुआती सैलरी बीस हजार रुपये है, तो उसका पैसा केवल ईपीएफ यानी प्रोविडेंट फंड के निश्चित नियमों के तहत ही जमा होता है। लेकिन जैसे ही यह सीमा पच्चीस हजार रुपये तक पहुंचती है, नियमों का दायरा पूरी तरह बदल जाता है। जानकारों का कहना है कि वेतन सीमा बढ़ने से कंपनियों और कर्मचारियों दोनों पर वित्तीय असर पड़ता है। बहुत से कर्मचारियों को यह जानकारी नहीं होती कि उनकी सैलरी स्लिप में कटौती किस हिसाब से हो रही है।
कर्मचारियों को सलाह दी जाती है कि वे अपना पीएफ निकालने या ट्रांसफर करने से पहले छह बेहद जरूरी चीजों की जांच जरूर कर लें। इसमें बैंक खाता नंबर, आधार की स्थिति, यूनिवर्सल अकाउंट नंबर की सक्रियता और नियोक्ता द्वारा समय पर पैसा जमा किया जाना शामिल है। अगर इनमें से कोई भी विवरण गलत पाया जाता है, तो कर्मचारी का पैसा महीनों तक अटक सकता है। डिजिटल पोर्टल पर अक्सर तकनीकी खामियों के कारण लोगों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनकी परेशानी और ज्यादा बढ़ जाती है।
सितंबर का ईसीआर और कंपनियों के लिए सख्त निर्देश
ईपीएफओ ने देश भर के सभी नियोक्ताओं और कंपनियों को कड़ी चेतावनी जारी करते हुए सितंबर महीने का ईसीआर यानी इलेक्ट्रॉनिक चालान कम रिटर्न तय तारीख से पहले जमा करने को कहा है। कंपनियों को पंद्रह अक्टूबर से पहले हर हाल में यह प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अगर कोई कंपनी इस तय समय सीमा से चूक जाती है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। इस सख्ती का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समय पर पैसा कर्मचारियों के भविष्य निधि खातों में पहुंचे और किसी भी तरह की देरी न हो।
इसके अलावा ईपीएफओ ने कुछ जरूरी प्रक्रियाओं के लिए डेडलाइन में सोलह दिनों की राहत भी दी है, जिससे उन कंपनियों को थोड़ी राहत मिली है जो तकनीकी समस्याओं से जूझ रही थीं। हालांकि, अधिकारियों का साफ कहना है कि नियमों की अनदेखी करने वाली कंपनियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। द फ्रीलान्स की टीम इस बात पर लगातार नजर बनाए हुए है कि कैसे ये नए बदलाव आम नौकरीपेशा वर्ग की जिंदगी और उनके बचत खातों को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं।
भविष्य की सुरक्षा और जमीनी हकीकत
भारत के असंगठित और संगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ उनका एकमात्र बुढ़ापे का सहारा होता है। ऐसे में जब नियमों में बार-बार बदलाव होते हैं या फर्जीवाड़े की खबरें आती हैं, तो आम आदमी की चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। फरीदाबाद जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि कागजों पर चलने वाली योजनाएं जमीन पर कितनी सुरक्षित हैं। जब तक सख्त प्रशासनिक निगरानी और डिजिटल पारदर्शिता पूरी तरह लागू नहीं होगी, तब तक आम कर्मचारियों का शोषण पूरी तरह बंद नहीं हो सकता। द फ्रीलान्स आगे भी इस मामले से जुड़ी हर जरूरी और सच्ची खबर आप तक पहुंचाता रहेगा।






