विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक पर संसद में तेज हुई सुगबुगाहट
देश की राजधानी नई दिल्ली में विदेशी अंशदान (नियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर राजनीतिक पारा एक बार फिर चढ़ गया है। इस बहुचर्चित और संवेदनशील कानून की गहराई से जांच करने के लिए बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी बैठकों का दौर तेज कर दिया है। संसद एनेक्सी भवन में आयोजित हुई इस अहम बैठक में विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं पर खुलकर चर्चा की गई, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के तेवर आमने-सामने नजर आए।
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय इस विशेष समिति का मुख्य दायित्व इस नए विधेयक के हर एक प्रावधान का बारीकी से अध्ययन करना है। समिति यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश की सुरक्षा, संप्रभुता और विदेशी धन के प्रवाह के बीच एक पारदर्शी और मजबूत संतुलन स्थापित हो सके। इसी उद्देश्य के तहत मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों को तलब किया गया और उनसे बिंदुवार स्पष्टीकरण मांगे गए।
लोकसभा सचिवालय से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस दूसरी बैठक का समय सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक निर्धारित किया गया था। इस दौरान गृह मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने समिति के माननीय सदस्यों को नए संशोधन विधेयक के हर एक अनुच्छेद और उसके कानूनी निहितार्थों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
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मंत्रालयों के अधिकारियों ने दिए साक्ष्य और नीतिगत कारण
बैठक की शुरुआत में दोनों प्रमुख मंत्रालयों के नुमाइंदों ने वर्ष 2010 के मूल विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में बदलाव की आवश्यकता पर एक व्यापक प्रस्तुतीकरण दिया। अधिकारियों ने समिति को समझाया कि आखिर क्यों मौजूदा समय में इन संशोधनों को लाना देश के सामरिक और आंतरिक हितों के लिए आवश्यक हो गया है। उन्होंने विदेशी अनुदानों के नियमन में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों और उनके संभावित खतरों का भी ब्योरा रखा।
याद रहे कि इस जेपीसी की पहली बैठक गत 18 सितंबर को आयोजित की गई थी, जिसमें केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने समिति के सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत होकर नीतिगत ढांचे की रूपरेखा समझाई थी। इस दूसरी बैठक में उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए कानून के तकनीकी पहलुओं पर और अधिक गहराई से मंथन किया गया ताकि किसी भी विसंगति को समय रहते दूर किया जा सके।
मंत्रालयों का पक्ष सुनने के बाद समिति ने दोपहर के सत्र में देश के जाने-माने विषय विशेषज्ञों, वित्त क्षेत्र के दिग्गजों और शीर्ष कानूनी सलाहकारों को आमंत्रित किया। इनसे यह समझने का प्रयास किया गया कि जमीनी स्तर पर इन संशोधनों का बैंकिंग प्रणाली और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के कामकाज पर क्या असर पड़ेगा।
एसबीआई चेयरमैन और कानूनी विशेषज्ञों से हुई अहम मंत्रणा
इस उच्च स्तरीय बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह सत्र रहा जिसमें देश के सबसे बड़े बैंक यानी भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के चेयरमैन चल्ला श्रीनिवासुलु शेट्टी और दिल्ली उच्च न्यायालय के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा जैसे दिग्गज विशेषज्ञ शामिल हुए। इन दिग्गजों ने समिति के समक्ष अपने पेशेवर अनुभव और विधिक ज्ञान के आधार पर मूल्यवान सुझाव साझा किए।
एसबीआई प्रमुख की उपस्थिति इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि विदेशी चंदे या अंशदान प्राप्त करने वाले सभी संगठनों को अनिवार्य रूप से भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं के माध्यम से ही अपने खाते संचालित करने होते हैं। बैंक अधिकारियों से यह राय ली गई कि फंड के प्रबंधन और निगरानी को तकनीकी रूप से और अधिक चुस्त-दुरुस्त कैसे बनाया जा सकता है।
"विदेशी अंशदान नियमन कानून में किए जा रहे ये संशोधन देश की आंतरिक सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में एक जरूरी कदम हैं। समिति सभी पक्षों की चिंताओं को सुनकर एक संतुलित और निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार करेगी।" — संसदीय समिति के सूत्र
दूसरी ओर, सरकार के शीर्ष विधि अधिकारियों और वरिष्ठ वकीलों ने समिति को यह आश्वस्त किया कि प्रस्तावित संशोधन पूरी तरह से संवैधानिक दायरे के भीतर हैं और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुकूल हैं। उन्होंने अदालती मामलों और पिछले कानूनी अनुभवों के आधार पर अपनी दलीलें पेश कीं।
विपक्ष की कड़ी आपत्तियां और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
जैसे ही इस विधेयक के प्रावधान सार्वजनिक हुए हैं, देश की सियासत मेंवान तान खड़ा हो गया है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) की नेता सुप्रिया सुले, द्रमुक प्रमुख एम.के. स्टालिन के साथ-साथ पूर्वोत्तर के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस पर गहरी चिंता जताई है। विपक्षी दलों का कड़ा आरोप है कि यह कानून विशेष रूप से अल्पसंख्यकों, धार्मिक संस्थाओं और ईसाई संगठनों के वित्तपोषण को निशाना बनाने के लिए लाया जा रहा है।
विपक्षी सांसदों का यह भी तर्क है कि इसके कड़े नियमों के कारण सामाजिक सेवा और राहत कार्यों में जुटे कई ईमानदार संगठनों का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि इसका किसी भी धर्म या समुदाय विशेष से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि इसका एकमात्र उद्देश्य देश की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखना और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए आने वाले गुप्त फंडों पर लगाम कसना है।
आगे की राह और जेपीसी की आगामी कार्ययोजना
विदेशी अंशदान (नियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को इसी साल 25 मार्च को लोकसभा के पटल पर रखा गया था। भारी हंगामे और विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बाद 12 अगस्त को इस विधेयक को गहन जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द कर दिया गया था। तब से लेकर अब तक समिति लगातार अलग-अलग हितधारकों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और धार्मिक संगठनों के नुमाइंदों से लगातार संवाद स्थापित कर रही है।
संसदीय प्रक्रिया के नियमों के तहत जेपीसी को अपनी विस्तृत रिपोर्ट आगामी संसद सत्र में पेश करनी है। वर्तमान में जिस प्रकार मंत्रालयों और विशेषज्ञों से मैराथन बैठकें हो रही हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर एक बार फिर बड़े सियासी तूफान का रूप ले सकता है। सरकार हरसंभव यह प्रयास कर रही है कि सभी आपत्तियों का कानूनी और तार्किक समाधान निकालते हुए एक पुख्ता कानून देश को सौंपा जाए।








