चुनाव आयोग का बड़ा फैसला: फॉर्म-6 से हटाया गया जटिल घोषणा-पत्र
भारतीय निर्वाचन आयोग ने देश के उन तमाम हिस्सों में मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को सुगम बना दिया है जहाँ विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) का काम पूरा हो चुका है। लंबे समय से इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई थी कि नए मतदाताओं को फॉर्म-6 भरते वक्त पुराने दस्तावेजों और पूर्वजों के रिकॉर्ड के नाम पर अत्यधिक पचड़े का सामना करना पड़ रहा था। इस तकनीकी और कागजी उलझन को दूर करते हुए आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल से उस अतिरिक्त घोषणा-पत्र को पूरी तरह से हटा दिया है, जो कई स्तरों पर विवाद और आपत्तियों की वजह बन रहा था। अब आम नागरिकों के लिए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना काफी हद तक आसान हो गया है।
पूर्व में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नए आवेदकों के सामने यह अनिवार्य शर्त रख दी गई थी कि उन्हें वर्ष 2000 के शुरुआती दौर या 2003 की मतदाता सूचियों से अपने माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी के नाम का मिलान करके उसका पूरा विवरण देना होगा। इस नियम के कारण उन परिवारों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही थी जिनके पुराने रिकॉर्ड डिजिटल फॉर्मेट में उपलब्ध नहीं थे या जिनके पूर्वज उस समय किसी अन्य स्थान पर निवास कर रहे थे। विपक्षी दलों और विभिन्न मंचों से इस पर सवाल उठाए जाने के बाद अब निर्वाचन आयोग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए राहत भरा कदम उठाया है।
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क्या अब बिना किसी जाँच के जुड़ जाएंगे नाम? यहाँ समझें नया नियम
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या घोषणा-पत्र हटने का मतलब यह है कि वोटर लिस्ट में नाम बिना किसी सत्यापन के जुड़ जाएगा? निर्वाचन आयोग ने इस पर स्पष्ट किया है कि कागजी घोषणा की अनिवार्यता खत्म होने का मतलब यह कतई नहीं है कि प्रशासनिक जाँच प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया है। आवेदक की पात्रता, उसकी आयु, भारतीय नागरिकता और संबंधित विधानसभा क्षेत्र में उसके निवास से जुड़े तमाम कानूनी मानक पहले की तरह ही पूरी सख्ती के साथ लागू रहेंगे। अंतर केवल इतना आया है कि अब नागरिकों को अपनी पिछली पीढ़ियों के पुराने चुनावी कागजातों की खोजबीन करके अतिरिक्त शपथ-पत्र देने की बाध्यता से मुक्ति मिल गई है।
चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि फॉर्म-6 का मूल कानूनी ढांचा जो 'रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय किया गया था, उसी के अनुरूप प्रक्रिया को दोबारा पटरी पर लाया गया है। जो लोग पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे हैं या जिनका नाम किसी कारणवश पिछली सूचियों से कट गया था, वे अब बिना किसी मानसिक दबाव के सहज तरीके से आवेदन कर सकेंगे। सॉफ्टवेयर और पोर्टल से इस अतिरिक्त शर्त के हटने से तकनीकी पेचीदगियाँ भी कम हुई हैं, जिससे आवेदन प्रक्रिया में होने वाली देरी से भी निजात मिलेगी।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विभिन्न राज्यों में प्रक्रिया की स्थिति
फॉर्म-6 में किए गए इस बदलाव की गूंज राजनीतिक गलियारों में भी साफ सुनाई दी है। विपक्ष के कई नेताओं ने इस अनिवार्यता पर पहले आपत्ति जताई थी और इसे आम जनता के लिए अनावश्यक उत्पीड़न करार दिया था। टीएमसी सांसद सहित कई अन्य नेताओं ने इस बात पर जोर दिया था कि बिना विधिवत कानूनी संशोधन के इस तरह के अतिरिक्त प्रावधान जोड़ना नागरिकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस बात पर संतोष जताया जा रहा है कि आयोग ने समय रहते स्थिति को समझते हुए इसमें व्यावहारिक संशोधन कर दिया है।
दूसरी ओर, देश के विभिन्न राज्यों में एसआईआर और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का काम अपने अंतिम चरणों में है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो चुकी है और अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख भी नजदीक आ चुकी है। इन राज्यों में जहाँ प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहाँ के निवासियों को इस नए फैसले का सीधा लाभ मिलना शुरू हो गया है। प्रशासनिक स्तर पर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि आम जनता को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के दौरान किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ और सॉफ्टवेयर की खामियों पर नजर
प्रशासनिक स्तर पर चल रही इन कवायदों के बीच हाल ही में न्यायपालिका की तरफ से भी कुछ कड़े निर्देश सामने आए हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोवा के सांता क्रूज इलाके का एक ऐसा ही मामला सामने आने पर चुनाव आयोग से तीखे सवाल किए थे, जहाँ विशेष पुनरीक्षण के दौरान एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से अचानक गायब हो गए थे। अदालत ने यह जानना चाहा था कि यदि प्रशासनिक या सॉफ्टवेयर स्तर पर कोई तकनीकी खामी है, तो उसका खामियाजा आम मतदाताओं को क्यों भुगताया जाए।
"यदि तकनीकी गड़बड़ी या सॉफ्टवेयर की किसी कमी के कारण वैध मतदाताओं के नाम सूची से कट जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुधारात्मक प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो।"— बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत की इस तरह की सख्त टिप्पणियों और आम नागरिकों की शिकायतों के बाद निर्वाचन आयोग अब हरसंभव यह प्रयास कर रहा है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण में पूरी पारदर्शिता बरती जाए। सॉफ्टवेयर से जुड़ी तकनीकी त्रुटियों को दूर करने के लिए विशेष टीमें काम कर रही हैं ताकि भविष्य में किसी भी नागरिक को अपने मताधिकार से वंचित न होना पड़े। फॉर्म-6 के नियमों को सरल बनाना इसी दिशा में एक बड़ा और सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
आम नागरिकों और नए मतदाताओं के लिए आगे की राह
जो युवा इस बार पहली बार वोटर बनने जा रहे हैं या जिनका नाम किसी वजह से मतदाता सूची से बाहर हो गया था, उनके लिए अब आगे की राह काफी सुगम हो गई है। उन्हें अब केवल निर्धारित कानूनी फॉर्म भरना होगा और अपनी मूल पहचान तथा निवास से जुड़े सामान्य दस्तावेज जमा करने होंगे। उन्हें अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने चुनावी इतिहास का कोई लंबा-चौड़ा ब्योरा देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी है कि मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया सरल, सुलभ और पारदर्शी हो। जब नियम जटिल होते हैं तो आम आदमी चुनाव प्रक्रिया से दूर होने लगता है। चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए इस कदम से न केवल प्रशासनिक बोझ कम होगा बल्कि आम जनता का निर्वाचन प्रणाली पर भरोसा भी और अधिक मजबूत होगा। आगामी चुनावों को देखते हुए यह बदलाव एक दूरगामी और स्वागत योग्य निर्णय साबित हो सकता है।



