गांधीनगर नगर निगम चुनाव में नामांकन को लेकर गरमाई सियासत
गुजरात की राजनीति में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सरगर्मी अचानक तेज हो गई है। हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) ने गांधीनगर नगर निगम चुनाव की प्रक्रिया पर बहुत गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के गुजरात प्रदेश संगठन मंत्री और मुख्य प्रवक्ता डॉ. करन बारोट ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए स्थानीय प्रशासन और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़े आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थान यदि पक्षपात करने लगें, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव ही हिल जाती है।
यह पूरा विवाद उस समय सामने आया जब आम आदमी पार्टी के नेता अपने उम्मीदवारों के साथ दस्तावेजों की जांच यानी स्क्रूटिनी प्रक्रिया के सिलसिले में कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। पार्टी का दावा है कि उनके एक अधिकृत उम्मीदवार का फॉर्म प्रशासनिक स्तर पर सोची-समझी रणनीति के तहत रद्द कर दिया गया है। इस घटना के बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है और विपक्षी दल लगातार सत्ता पक्ष पर निशाना साध रहे हैं।
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वार्ड नंबर 5 के उम्मीदवार का फॉर्म रद्द होने पर फूटा गुस्सा
विवाद के केंद्र में गांधीनगर के वार्ड नंबर 5 से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार जितेंद्रभाई चौहान का नामांकन है। डॉ. करन बारोट ने इस मामले पर विस्तार से बात करते हुए बताया कि जब जितेंद्रभाई ने अपना नामांकन दाखिल किया था, तब उनके सभी दस्तावेज पूरी तरह दुरुस्त थे। औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पार्टी नेताओं ने इसकी रसीद भी प्राप्त की थी। उस वक्त किसी भी तरह की कागजी कमी या त्रुटि की बात अधिकारियों द्वारा नहीं बताई गई थी।
लेकिन जांच के दिन अचानक यह तकनीकी पेंच सामने लाया गया कि नामांकन भरते वक्त मैंडेट जमा नहीं किया गया था। 'आप' नेताओं का सवाल है कि यदि कोई दस्तावेज कम भी था, तो नियम के अनुसार उम्मीदवार को नोटिस दिया जाना चाहिए था या समयसीमा के भीतर सुधार का मौका मिलना चाहिए था। ऐसा न करके सीधे तौर पर फॉर्म खारिज करना सीधे तौर पर मनमानी और पक्षपात की ओर इशारा करता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है।
'आप' नेताओं का बड़ा आरोप- बिना चुनाव जीते ही जीतना चाहती है सत्ता
डॉ. करन बारोट ने अपने संबोधन में बहुत तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यह सब कुछ एक सोची-समझी राजनीतिक सेटिंग का हिस्सा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल नहीं चाहते कि आम आदमी पार्टी के मजबूत और जमीनी उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाएं। जनता के बीच काम करने वाले सामान्य परिवारों के लोगों को रोकने के लिए ऐसे प्रशासनिक हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
आरोपों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि चुनाव सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं और प्रशासन को अपनी मर्जी से ही परिणाम तय करने हैं, तो फिर चुनाव कराने का नाटक करने की कोई जरूरत नहीं है। बेहतर यही होगा कि चुनाव आयोग सीधे तौर पर सत्ताधारी पार्टी के सभी उम्मीदवारों को विजेता घोषित कर दे। इस तरह के आयोजनों से केवल लोकतंत्र का मजाक बनता है और आम जनता का व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है।
संस्थाओं की निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं पर सवाल
देश की प्रमुख संवैधानिक और जांच एजेंसियों के कामकाज पर भी इस दौरान सवालिया निशान लगाए गए। डॉ. करन बारोट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज के समय में ऐसा महसूस होने लगा है कि केंद्रीय एजेंसियों के साथ-साथ चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाएं भी निष्पक्षता के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। यदि छोटे स्तर के चुनावों में भी इस प्रकार का दबाव देखने को मिलेगा, तो आम नागरिकों और निष्पक्ष उम्मीदवारों के लिए न्याय पाना बेहद कठिन हो जाएगा।
उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक ऐसे देश की कल्पना नहीं की थी जहां आम आदमी की आवाज को इस प्रकार दबा दिया जाए। गरीब और मध्यम वर्ग से आने वाले लोग जब जनता की सेवा के लिए आगे आते हैं, तो उनके रास्ते में इस तरह के अवरोध खड़े करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
"अगर भाजपा को इसी तरह चुनाव जीतना है तो हम कह रहे हैं कि चुनाव ही रद्द कर दो और भाजपा के सभी उम्मीदवारों को विजेता घोषित कर दो। इस तरह चुनाव होगा तो यह लोकतंत्र की हत्या है।" — डॉ. करन बारोट, प्रदेश मुख्य प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी
स्वतंत्र उम्मीदवारों के नामांकन पर भी संकट के बादल
सिर्फ आम आदमी पार्टी ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों के फॉर्म भी इसी तरह की तकनीकी आपत्तियों के आधार पर खारिज किए जाने की खबरें सामने आई हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्थानीय चुनावों में इस प्रकार की घटनाएं अक्सर ध्रुवीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर बड़े विवादों को जन्म देती हैं। जब स्थानीय स्तर पर चुनावी मुकाबले को सीमित करने की कोशिश की जाती है, तो इसका असर पूरे प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है।
आम आदमी पार्टी ने चेतावनी दी है कि वे इस मनमानी के खिलाफ चुप नहीं बैठेंगे और कानूनी एवं राजनीतिक दोनों मोर्चों पर इस अन्याय का विरोध किया जाएगा। पार्टी का कहना है कि जनता सब देख रही है और आने वाले समय में मतदाता इस प्रकार के कदमों का जवाब अपने मत के जरिए जरूर देंगे।
निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक सुगबुगाहट
गांधीनगर नगर निगम चुनाव से ठीक पहले उपजा यह विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। एक तरफ जहां प्रशासनिक अधिकारी अपने नियमों और तय प्रक्रियाओं का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इसे सत्ता के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस मामले पर क्या सफाई देता है और क्या प्रभावित उम्मीदवारों को कोई राहत मिल पाती है या नहीं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की प्रणाली पर गंभीर बहस छेड़ दी है।





