देशभर में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार उठ रहे गंभीर सवाल
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और निर्वाचन प्रणाली की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर तीखा विवाद खड़ा हो गया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों की ओर से चुनाव आयोग के कामकाज के तौर-तरीकों पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में संविधान बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों का साफ तौर पर कहना है कि देश की चुनावी संस्थाओं की स्वायत्तता पर मंडराते खतरे को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई और उनके पुतले का दहन किया गया। आयोजन स्थल पर मौजूद वक्ताओं ने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है। उनका कहना था कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव आम जनता के विश्वास को ठेس पहुंचा रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के जन-आंदोलन आने वाले समय में चुनावी सुधारों की मांग को और अधिक तेज कर सकते हैं। जब देश का नागरिक अपनी बुनियादी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को खतरे में देखता है, तो उसका यह आक्रोश सड़क पर उतरकर सामने आता है। समिति के नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो इस आंदोलन का दायरा और अधिक व्यापक किया जाएगा।
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एसआईआर प्रक्रिया और मताधिकार छिनने के गंभीर आरोप
प्रदर्शन के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा एसआईआर प्रक्रिया और उससे जुड़ी प्रशासनिक गड़बड़ियों को बनाया गया। वक्ताओं ने मंच से संबोधित करते हुए कहा कि इस विशेष प्रक्रिया के नाम पर देश के वंचित, पिछड़े और हाशिए पर खड़े समुदायों को उनके मताधिकार से बेदखल करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि नियमों की पेचीदगियों का हवाला देकर आम आदमी की नागरिक पहचान और वोट डालने के अधिकार को सुनियोजित ढंग से सीमित किया जा रहा है।
संघर्ष समिति से जुड़े प्रतिनिधियों ने विस्तार से बताया कि कैसे जमीनी स्तर पर मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर आम जनता को परेशान किया जा रहा है। जिन नागरिकों के पास दशकों से पहचान पत्र मौजूद हैं, उन्हें भी अनचाही तकनीकी बाधाओं में उलझाया जा रहा है। आलोचकों का तर्क है कि यदि मताधिकार जैसी बुनियादी संवैधानिक शक्ति पर इस प्रकार के प्रशासनिक प्रहार होते रहेंगे, तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद ही हिल जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी कार्यप्रणाली में पूरी तरह पारदर्शिता रखनी चाहिए ताकि किसी भी वर्ग के मन में पक्षपात या भेदभाव की आशंका न पनपे। लोकतांत्रिक प्रणाली की असली ताकत निष्पक्ष चुनावों में ही निहित होती है, और इस पर उठने वाला हर एक सवाल गंभीर चिंता का विषय है।
सड़क से संसद तक गूंजने लगी चुनावी शुचिता की मांग
रणधीर वर्मा चौक पर आयोजित इस विशाल विरोध सभा में विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और एक स्वर में अपनी बात रखी। सभा को संबोधित करने वाले प्रमुख वक्ताओं में देबू महतो, शशिभूषण कुमार, सुबल दास, दिलीप राम, बबलू दास, और पूर्व पार्षद गणपत महतो सहित दर्जनों नाम शामिल रहे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि देश के संविधान ने नागरिकों को जो अधिकार दिए हैं, उनकी रक्षा के लिए वे किसी भी हद तक संघर्ष करने को तैयार हैं।
"जब देश की जनता के बुनियादी अधिकारों पर ही प्रहार होने लगे, तो खामोश रहना सबसे बड़ा अपराध है। हम मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जांच और एसआईआर प्रक्रिया में मताधिकार से वंचित किए गए हर नागरिक को न्याय मिलने तक अपना संघर्ष जारी रखेंगे।" — संविधान बचाओ संघर्ष समिति के प्रमुख वक्ता
वक्ताओं ने केंद्र सरकार पर भी तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में देश के संघीय ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं को लगातार कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नागरिकता और मतदान के अधिकारों को लेकर जिस प्रकार की नीतियां लाई जा रही हैं, वे देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकती हैं। इन नेताओं ने स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को बचाने के लिए है।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए भविष्य की रूपरेखा और आंदोलन की चेतावनी
पुतला दहन और विरोध सभा के समापन पर संघर्ष समिति के नेताओं ने आगामी आंदोलन की रूपरेखा पर भी चर्चा की। उन्होंने ऐलान किया कि यदि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया में आ रही इन गड़बड़ियों को तुरंत दुरुस्त नहीं किया और प्रभावित नागरिकों को उनका हक वापस नहीं मिला, तो आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाया जाएगा। जिला मुख्यालयों से लेकर राजधानी तक विरोध प्रदर्शनों का दौर तेज करने की तैयारी की जा रही है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर से इस बहस को जन्म दे दिया है कि भारत जैसी विशाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आयोग को कितनी अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता के साथ काम करना चाहिए। देश के विभिन्न हिस्सों से उठ रही ऐसी आवाजें यह दर्शाती हैं कि नागरिक अपने अधिकारों को लेकर अब पहले से कहीं अधिक जागरूक और सतर्क हो चुके हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिसकी नजरें राजनीतिक दलों और प्रशासनिक गलियारों दोनों पर टिकी हुई हैं।



