नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना के असली वारिस को लेकर चल रहा घमासान अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दाखिल किया है। इस हलफनामे में शिंदे खेमे ने चुनाव आयोग के उस फैसले का खुलकर बचाव किया है, जिसमें आयोग ने उन्हें असली शिवसेना मानते हुए पार्टी का नाम और 'तीर-कमान' चुनाव चिन्ह सौंप दिया था। अदालत में शिंदे गुट के वकीलों ने साफ शब्दों में दलील दी है कि पार्टी के नाम और निशान पर उनका पूरी तरह से स्वाभाविक अधिकार बनता है।
बीते कुछ महीनों से उद्धव ठाकरे गुट लगातार चुनाव आयोग के इस फैसले को चुनौती दे रहा है। ठाकरे खेमे का आरोप है कि चुनाव आयोग का फैसला पक्षपातपूर्ण था और उसने बहुमत के गलत आंकड़ों के आधार पर यह फैसला लिया। इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह अहम सवाल उठा है कि क्या विधायक दल में बहुमत के आधार पर पार्टी के नाम और निशान का फैसला किया जा सकता है। इसी कानूनी पेचीदगी को सुलझाने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट के जजों की बेंच दोनों पक्षों की दलीलें एक-एक करके बहुत बारीकी से सुन रही है।
चुनाव आयोग के फैसले के समर्थन में शिंदे गुट की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट के वकीलों ने अदालत को बताया कि निर्वाचन आयोग ने सभी नियमों और सबूतों को देखने के बाद ही अपना फैसला सुनाया था। शिंदे खेमे का तर्क है कि पार्टी के अधिकांश चुने हुए विधायक और सांसद उनके साथ हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की संख्या ही पार्टी संगठन में असली ताकत तय करती है। इसलिए चुनाव आयोग ने जो फैसला लिया, वह पूरी तरह से संवैधानिक और लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल है। शिंदे गुट ने यह भी कहा कि उन्होंने पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बचाने के लिए ही बगावत का बड़ा कदम उठाया था।
दूसरी तरफ, इस कानूनी लड़ाई में यह बात भी बार-बार उठ रही है कि यदि विधानसभा स्पीकर द्वारा विधायकों की अयोग्यता पर लिया गया फैसला बदलता है, तो इसका असर चुनाव आयोग के इस फैसले पर भी पड़ सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि स्पीकर के फैसले और चुनाव आयोग के फैसले के बीच सीधा संबंध है। अगर अदालत स्पीकर के फैसले को गलत मानती है, तो चुनाव आयोग के फैसले की वैधता पर भी फिर से विचार करने की नौबत आ सकती है। यही वजह है कि दोनों पक्षों के वकील इस मामले में एक-एक शब्द और कानूनी धारा पर बहुत सावधानी से बहस कर रहे हैं।
विधायक दल का बहुमत बनाम पार्टी संगठन की ताकत
इस पूरे मामले की जड़ में यह बड़ा सवाल है कि किसी राजनीतिक दल पर असल हक किसका होना चाहिए - क्या उस संगठन का जो कागजों पर दर्ज है, या फिर उन चुने हुए जनप्रतिनिधियों का जिन्हें जनता ने वोट देकर विधानसभा और संसद भेजा है। शिंदे गुट लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि उनके पास पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों का भारी समर्थन है। अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों में उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया है कि पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं ने हलफनामा देकर शिंदे गुट के पक्ष में अपना समर्थन जताया है।
आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें भी अब सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हुई हैं। यह मामला केवल एक राजनीतिक दल के नाम और निशान का नहीं है, बल्कि देश की दलीय राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। जैसे-जैसे अदालत में सुनवाई आगे बढ़ रही है, दोनों पक्षों के वकीलों के बीच तीखी बहस देखने को मिल रही है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और कोर्ट के अगले हर बड़े अपडेट को आप तक सबसे पहले पहुंचाती रहेगी।



