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देशपढ़ने में समय: 5 मिनट

दिल्ली प्रदर्शन में इंटरनेट बैन पर सुप्रीम कोर्ट में घिरे गृह सचिव, मांगी बिना शर्त माफी

दिल्ली प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट बंद किए जाने के मामले में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांग ली है। अदालत में पेश हलफनामे और ब्योरे में कहा गया है कि आदेश के उल्लंघन जैसी कोई भी कार्रवाई जानबूझकर नहीं की गई थी। इस मामले में पुलिस प्रशासन ने भी अपना अनुपालन ब्योरा सौंप दिया है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•15 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•36
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दिल्ली प्रदर्शन में इंटरनेट बैन पर सुप्रीम कोर्ट में घिरे गृह सचिव, मांगी बिना शर्त माफी
📷 दिल्ली प्रदर्शन में इंटरनेट बैन पर सुप्रीम कोर्ट में घिरे गृह सचिव, मांगी बिना शर्त माफी — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • दिल्ली प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट बंद किए जाने के मामले में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांग ली है। अदालत में पेश हलफनामे और ब्योरे में कहा गया है कि आदेश के उल्लंघन जैसी कोई भी कार्रवाई जानबूझकर नहीं की गई थी। इस मामले में पुलिस प्रशासन ने भी अपना अनुपालन ब्योरा सौंप दिया है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाओं पर लगाई गई पाबंदियों का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नजर में आ गया है। इस पूरे मामले में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने शीर्ष अदालत में पेश होकर बिना शर्त माफी मांग ली है। अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया गया है कि इंटरनेट बंद करने के प्रशासनिक आदेश के उल्लंघन या किसी भी प्रक्रियागत चूक का कोई भी कदम जानबूझकर नहीं उठाया गया था। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए इन कदमों पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया था, जिसके बाद सरकार की ओर से यह सफाई सामने आई है।

दिल्ली प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के लिहाज से शहर के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर अचानक रोक लगा दी गई थी। इससे आम नागरिकों और कारोबारियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस पाबंदी के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से जवाब तलब किया था। जवाब में गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। पुलिस विभाग ने भी सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन का विस्तृत ब्योरा दाखिल किया है, जिसमें यह बताया गया है कि किन परिस्थितियों में और किस कानून के तहत ये कड़े कदम उठाने पड़े थे।

शीर्ष अदालत में गृह सचिव का हलफनामा और सफाई

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद गृह सचिव गोविंद मोहन ने व्यक्तिगत रूप से स्थिति को संभालते हुए अदालत में बिना शर्त माफी का प्रस्ताव रखा। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि अदालत के निर्देशों का हमेशा सम्मान किया जाता है और भविष्य में इस तरह की किसी भी प्रशासनिक चूक से बचने के लिए पूरी सावधानी बरती जाएगी। सरकार की तरफ से पेश वकीलों ने जजों को बताया कि इंटरनेट बंद करने का फैसला पूरी तरह से उस वक्त के हालात और जमीनी सुरक्षा के आकलन पर आधारित था। हालांकि, प्रक्रिया के पालन में जो भी कमियां रहीं, उनके लिए सरकार ने बिना किसी शर्त के खेद जताया है।

विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरे प्रकरण पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि इंटरनेट रोकना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है और आपातकालीन स्थितियों के नाम पर आम जनता को सूचना के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, प्रशासनिक सूत्रों का दावा है कि अफवाहों को फैलने से रोकने और हिंसा पर लगाम लगाने के लिए यह कदम उठाना तत्कालीन समय की सबसे बड़ी मजबूरी थी। पुलिस प्रशासन ने अपने अनुपालन ब्योरे में यह भी उल्लेख किया है कि हालात सामान्य होते ही इंटरनेट सेवाओं को चरणबद्ध तरीके से बहाल कर दिया गया था।

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कानूनी जानकारों की नजर में इस मामले के मायने

कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में गृह सचिव का बिना शर्त माफी मांगना इस बात का संकेत है कि अदालत इंटरनेट शटडाउन के मामलों में अब बहुत सख्त हो चुकी है। बिना सोचे-समझे या बिना ठोस वजहों के संचार माध्यमों को रोकना अब आसान नहीं रहेगा। अदालतें लगातार यह सुनिश्चित कर रही हैं कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का बेवजह हनन न हो। इस सुनवाई से देश भर के प्रशासनिक अधिकारियों को भी एक कड़ा संदेश गया है कि उन्हें किसी भी पाबंदी को लगाने से पहले कानूनी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना होगा।

आम जनता और स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि इंटरनेट बंद होने से उनका रोजमर्रा का काम और डिजिटल भुगतान बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के बीच अब यह देखना अहम होगा कि भविष्य में विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए सरकार और पुलिस कौन सा नया और संतुलित रास्ता अपनाती है। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले से जुड़ी हर एक कोर्ट की कार्यवाही और प्रशासनिक अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए है।

भвиष्य की प्रशासनिक नीतियां और अदिष्टिगत पाबंदियां

इस पूरे घटनाक्रम के बाद केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के भीतर भी आंतरिक बैठकों का दौर शुरू हो गया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि भविष्य में किसी भी संवेदनशील स्थिति में इंटरनेट बैन जैसे चरम फैसले लेने से पहले उच्च स्तर पर कानूनी सलाह जरूर ली जाए। अदालत की फटकार के बाद अब प्रशासनिक अमला अधिक सतर्कता बरत रहा है ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी कानूनी खिंचाई से बचा जा सके।

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