ICMR की नई रिसर्च ने बढ़ाई चिंता, दिल की सेहत से जुड़ा है विटामिन D का कनेक्शन
आमतौर पर आम जनता यही मानती है कि विटामिन D की जरूरत केवल शरीर की हड्डियों को मजबूत रखने और कैल्शियम को अब्जॉर्ब करने के लिए होती है। लेकिन, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अंतर्गत आने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) के ताज़ा अध्ययन ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में यह साबित कर दिखाया है कि विटामिन D का सीधा असर हमारे दिल की कार्यप्रणाली और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ पर पड़ता है। यदि शरीर में इस खास पोषक तत्व की भारी कमी हो जाती है, तो यह सीधे तौर पर दिल की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
यह महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला शोध हाल ही में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'Steroids' में प्रकाशित किया गया है। इस स्टडी के सामने आने के बाद से चिकित्सा जगत और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि आधुनिक जीवनशैली में विटामिन D की कमी को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। आमतौर पर लोग सर्दियों या धूप न मिलने पर इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह लापरवाही दिल पर भारी पड़ सकती है।
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चूहों पर किए गए वैज्ञानिक ट्रायल में सामने आए चौंकाने वाले परिणाम
इस शोध को पुख्ता करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक व्यापक और नियंत्रित वैज्ञानिक ट्रायल किया। इस प्रयोग के दौरान चूहों को अलग-अलग मात्रा में विटामिन D युक्त और विटामिन D से वंचित डाइट दी गई। जिन जीवों को लंबे समय तक विटामिन D की कमी वाली डाइट पर रखा गया, उनके हृदय के कामकाज यानी हार्ट फंक्शन में साफ तौर पर नकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए। वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसे विषयों के हृदय में गंभीर रूप से स्ट्रेस यानी आंतरिक दबाव बढ़ा हुआ था।
प्रयोग के दौरान यह भी देखा गया कि कम विटामिन D वाले समूहों के शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का स्तर अत्यधिक बढ़ा हुआ था। इस बढ़े हुए ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस ने न केवल दिल की मांसपेशियों की कार्यक्षमता को प्रभावित किया, बल्कि उनके पूरे इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी गहरा आघात किया। यह ट्रायल इस बात का स्पष्ट प्रमाण देता है कि शरीर में इस पोषक तत्व की कमी किसी एक अंग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देती है।
कोशिकाओं की सुरक्षा करने वाला अहम तंत्र (NRF2) हुआ प्रभावित
हमारे शरीर की कोशिकाएं प्राकृतिक रूप से खुद को बचाने के लिए एक रक्षा प्रणाली का इस्तेमाल करती हैं। इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने गहराई से यह समझने का प्रयास किया कि विटामिन D की कमी इस सेल्यूलर डिफेंस सिस्टम को कैसे तोड़ती है। रिसर्च में यह बात सामने आई कि विटामिन D की अनुपस्थिति के कारण 'एनआरएफ 2' (NRF2) के सामान्य कामकाज में बड़ी बाधा उत्पन्न होती है। यह विशेष तंत्र कोशिकाओं के भीतर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से लड़ने और उन्हें सुरक्षित रखने का मुख्य काम करता है।
लेकिन जब शरीर में लंबे समय तक विटामिन D का स्तर गिरता रहता है, तो यह सुरक्षा कवच कमजोर पड़ने लगता है। परिणामस्वरूप, ऑक्सीडेटिव तनाव तेजी से बढ़ने लगता है और दिल की कोशिकाओं को अंदरूनी नुकसान पहुंचना शुरू हो जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बायोलॉजिकल प्रक्रिया इंसानों के शरीर में भी इसी तरह काम करती है, जिससे हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
वैज्ञानिक डॉ. आयशा इस्माइल की चेतावनी और एंटी-ऑक्सीडेंट स्ट्रेस का समाधान
इस पूरी शोध टीम का नेतृत्व करने वाली प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. आयशा इस्माइल ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के शरीर में लंबे समय तक विटामिन D की कमी बनी रहती है, तो यह स्थिति सीधे तौर पर दिल की कोशिकाओं पर सीधा हमला करती है और उन्हें कमजोर बनाती है। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस समस्या को सुधारा जा सकता है।
"लंबे समय तक विटामिन D की कमी से होने वाला ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस हार्ट की सेल्स पर सीधे तौर पर असर डालता है। लेकिन जब इन जीवों को दोबारा संतुलित विटामिन D वाली डाइट दी गई, तो उनके शरीर में एंटीऑक्सीडेंट स्ट्रेस का लेवल काफी हद तक कम हुआ।" — डॉ. आयशा इस्माइल, प्रमुख वैज्ञानिक, ICMR-NIN
शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि यदि सही समय पर खानपान में सुधार किया जाए और पर्याप्त मात्रा में विटामिन D लिया जाए, तो दिल की कोशिकाओं पर पड़ने वाले इस अतिरिक्त दबाव को कम किया जा सकता है।
कैसे करें पहचान और क्या है शरीर में विटामिन D का सही पैमाना?
चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में विटामिन D की सटीक स्थिति का पता लगाने के लिए '25-hydroxy vitamin D' यानी नाम का ब्लड टेस्ट कराया जाता है। मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति के शरीर में इस विटामिन का लेवल 20 ng/mL (नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर) से कम आता है, तो उसे क्लीनिकल डेफिशियेंसी यानी गंभीर कमी की श्रेणी में रखा जाता है।
इस कमी को दूर करने के लिए केवल धूप सेकना ही काफी नहीं होता, बल्कि कई बार मेडिकल सप्लीमेंट्स और संतुलित आहार की जरूरत पड़ती है। दूध, पनीर, मशरूम, अंडे की जर्दी और फैटी फिश जैसे खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट में शामिल करके इसके स्तर को सुधारा जा सकता है। हालांकि, किसी भी तरह के सप्लीमेंट को लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है ताकि दिल और हड्डियों दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।







