देश में तेजी से बढ़ रहे हैं क्रॉनिक किडनी डिजीज के गंभीर मामले
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी एक बेहद अहम और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। देश की बदलती जीवनशैली, खानपान की गलत आदतें और डायबिटीज जैसी बीमारियां आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही हैं। इसी5 पृष्ठभूमि में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी एक महत्वपूर्ण सिफारिश पेश की है, जो सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी हुई है। समिति ने देश में लगातार बढ़ रहे किडनी के मरीजों की संख्या को देखते हुए एक बड़ा कदम उठाने का सुझाव दिया है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं की चपेट में आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही इस बीमारी का पता चल जाए, तो इसे नियंत्रित करना काफी आसान हो जाता है। लेकिन जागरूकता की कमी और नियमित स्वास्थ्य जांच न कराने के कारण लोग अक्सर अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है।
सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य कार्यक्रमों और योजनाओं के दायरे को और अधिक व्यापक बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए संसदीय समिति ने नेशनल प्रोग्राम फॉर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (NP-NCD) के तहत एक नई और दूरदर्शी व्यवस्था लागू करने की वकालत की है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक तक समय पर जांच की सुविधा पहुंचाना है।
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संसदीय समिति की सिफारिश: साल में दो बार कराना होगा KFT
संसदीय स्थायी समिति द्वारा दी गई सिफारिशों में सबसे मुख्य बिंदु किडनी फंक्शन टेस्ट यानी KFT से जुड़ा हुआ है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि देश के सभी नागरिकों, जिनकी उम्र 20 वर्ष या उससे अधिक है, उन्हें वर्ष में कम से कम दो बार अपना KFT टेस्ट जरूर करवाना चाहिए। यह रूटीन जांच लोगों को किसी भी गंभीर खतरे से पहले ही सतर्क कर देगी।
मेडिकल साइंस के जानकारों का मानना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपनी सेहत को सबसे आखिर में रखते हैं। जब तक शरीर में बड़े और असहनीय लक्षण दिखाई नहीं देते, तब तक डॉक्टर के पास जाने की बात कोई नहीं सोचता। यही कारण है कि संसदीय समिति ने प्रिवेंटिव हेल्थकेयर यानी बचाव आधारित स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे ज्यादा जोर दिया है।
यह सिफारिश ऐसे समय में आई है जब देश के सरकारी और निजी दोनों ही अस्पतालों में किडनी फेलियर और क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के मामलों में लगातार भारी उछाल देखा जा रहा है। यदि यह सिफारिशें धरातल पर पूरी तरह लागू होती हैं, तो आने वाले समय में लाखों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।
'द लैंसेट' की ग्लोबल स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में हाल ही में एक ग्लोबल स्टडी पब्लिश हुई थी, जिसने भारत के स्वास्थ्य ढांचे को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इस स्टडी के मुताबिक, भारत में दिल की बीमारियों के बाद क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) देश की दूसरी सबसे बड़ी और घातक बीमारी बन चुकी है। यह आंकड़ा देश के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह है।
अध्ययन में यह भी बात सामने आई है कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी, जो करीब 14 करोड़ के आसपास आंकी जाती है, किसी न किसी रूप में किडनी की खराबी या कमजोरी से जूझ रही है। इनमें से अधिकांश लोगों को इस बात की कोई जानकारी नहीं होती कि उनकी किडनियां अंदर ही अंदर धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि खराब खानपान, अत्यधिक मात्रा में प्रोसेस्ड फूड का सेवन, पेनकिलर दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल और पानी की कमी जैसे कारण किडनी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज भी किडनी खराब होने के सबसे बड़े कारणों में गिने जाते हैं।
शुरुआती दौर में लक्षण न दिखना सबसे बड़ा खतरा
किडनी की बीमारी को चिकित्सा जगत में 'साइलेंट किलर' यानी खामोश कातिल माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शुरुआती चरणों में किडनी की कार्यप्रणाली प्रभावित होने पर भी शरीर में कोई विशेष या स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आते हैं। जब तक मरीज को थकान, सूजन या अन्य गंभीर परेशानियां महसूस होती हैं, तब तक किडनी का एक बड़ा हिस्सा खराब हो चुका होता है।
नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि जब किडनी करीब 50 प्रतिशत या उससे अधिक खराब हो जाती है, तब जाकर शरीर में इसके लक्षण दिखाई देना शुरू होते हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं, और कई बार मरीजों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट जैसे महंगे और कष्टदायक दौर से गुजरना पड़ता है।
"किडनी की बीमारी के शुरुआती संकेत बेहद सामान्य होते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। इसलिए नियमित अंतराल पर KFT करवाना ही इस बीमारी से बचने का सबसे अचूक और सुरक्षित रास्ता है।" — डॉ. निरंजन कुलकर्णी, कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजी, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई
बचाव और नियमित जांच ही है एकमात्र उपाय
बढ़ते मामलों को देखते हुए अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का एक ही स्वर में कहना है कि इलाज से बेहतर हमेशा बचाव होता है। अगर देश का हर नागरिक अपनी उम्र के एक निश्चित पड़ाव पर पहुंचने के बाद नियमित रूप से अपने ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना ले, तो इस गंभीर संकट से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
सरकार की ओर से भी गैर-संचारी रोगों (NCDs) के नियंत्रण के लिए देश के विभिन्न जिलों और स्वास्थ्य केंद्रों पर स्क्रीनिंग कैंप चलाए जा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि आम लोग इन सुविधाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाएं और अपनी सेहत के प्रति किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरतें।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि संसदीय समिति की यह सिफारिश आने वाले दिनों में देश की स्वास्थ्य नीतियों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। नागरिकों की सतर्कता और समय पर की गई जांच ही देश को इस साइलेंट किलर बीमारी के प्रकोप से सुरक्षित रख सकती है।






