दिल्ली में विपक्ष की महाबैठक से पहले आपसी तल्खी आई सामने
देश की राजधानी दिल्ली में बुधवार को विपक्षी दलों के गठबंधन 'INDIA' की एक बेहद अहम बैठक बुलाई गई है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना है। हालांकि, बैठक की शुरुआत होने से पहले ही विपक्षी खेमे में एकजुटता के दावों की हवा निकलती दिख रही है। गठबंधन में शामिल विभिन्न दलों के बीच आपसी मतभेद और बयानों की तल्खी ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
कांग्रेस पार्टी इस मंच के जरिए चुनाव आयोग के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में जुटी है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सभी क्षेत्रीय दलों को एक साथ लाकर केंद्र सरकार और चुनाव पैनल के खिलाफ साझा दबाव बनाना चाहता है। लेकिन दूसरी तरफ, सीट-शेयरिंग के फार्मूले और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चुनावी समीकरणों को लेकर दलों के सुर अलग-अलग सुनाई दे रहे हैं, जिससे समन्वय बिठाना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
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आप सांसद संजय सिंह के बयानों पर कांग्रेस का तीखा हमला
विपक्षी बैठक से ठीक पहले आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह के एक बयान ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। संजय सिंह ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी इस औपचारिक बैठक में शामिल नहीं होगी, हालांकि वह संसद के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाए जाने वाले महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन जरूर करेगी। आप नेता ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी कह दिया कि कभी पार्टी 150 सीटें मांगती है तो कभी सभी सीटों पर लड़ने की बात कहती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस का मुकाबला बीजेपी से कम और समाजवादी पार्टी से ज्यादा है।
संजय सिंह के इन तीखे तेवरों पर कांग्रेस ने भी जोरदार पलटवार किया है। कांग्रेस नेता राजेंद्र पाल गौतम ने प्रेस के सामने आकर आम आदमी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के दावों की धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने कहा कि आप नेतृत्व को पहले यह हिसाब देना चाहिए कि उन्होंने अब तक जितने भी राज्यसभा सांसद संसद में भेजे हैं, उनमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग से कितने लोग शामिल हैं।
"सबसे पहले संजय सिंह इसका जवाब दें। आम आदमी पार्टी ने अब तक 14 राज्यसभा सांसद भेजे हैं। उन्होंने कितने SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक सांसद भेजे हैं? जो पार्टी सामाजिक न्याय में विश्वास नहीं करती, वह आज हमें बताएगी कि हमें क्या करना चाहिए?"— राजेंद्र पाल गौतम, कांग्रेस नेता
अखिलेश यादव और एमके स्टालिन की दूरी से कमजोर हुई विपक्षी एकता
सिर्फ आम आदमी पार्टी ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य प्रमुख क्षेत्रीय दल भी इस अहम बैठक से किनारा करते नजर आ रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के प्रतिनिधियों के इस बैठक में शामिल न होने की खबर है। इसके अलावा, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी व्यक्तिगत रूप से इस बैठक में मौजूद नहीं रहेंगे, हालांकि उनकी पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता इसमें प्रतिनिधित्व करेंगे। जानकारों का मानना है कि राज्यों स्तर पर सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही खींचतान इसका मुख्य कारण है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली पहुंच चुके हैं। पश्चिम बंगाल में आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए ममता बनर्जी की मौजूदगी को काफी अहम माना जा रहा है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल का कहना है कि पार्टी अध्यक्ष को सभी नेताओं की व्यस्तताओं और कारणों की जानकारी मिल चुकी है, और लोकतंत्र की रक्षा के लिए समान विचारधारा वाले दलों को एकजुट करने का प्रयास निरंतर जारी रहेगा।
संसदीय रणनीति और महाभियोग के मुद्दे पर क्या है आम सहमति
भले ही औपचारिक बैठकों में क्षेत्रीय दल अपनी दूरियां बना रहे हों, लेकिन केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के मामले में कई दल संसद के भीतर एकजुट नजर आ रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया में कई विपक्षी सांसदों ने हिस्सा लिया है। आप सांसद संजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि भले ही उनकी पार्टी गठबंधन की बैठकों से दूरी बनाए रखे, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए वे अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर संसद के पटल पर कड़ा संघर्ष करेंगे।
बहरहाल, देश के राजनीतिक पटल पर एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आगामी चुनावों से पहले यह बिखरता हुआ विपक्ष एक मजबूत और साझा विकल्प पेश कर पाएगा। जिस तरह से क्षेत्रीय दल अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं को राष्ट्रीय रणनीति से ऊपर रख रहे हैं, उससे कांग्रेस की राह आसान नजर नहीं आती है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की इस बैठक से कौन सा नया राजनीतिक फॉर्मूला निकलकर सामने आता है जो इन दूरियों को पाट सके।







