उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव की रणभेरी, राजनीतिक सरगर्मी चरम पर
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर पूरी तरह से गरमा गई है। वजह है विधान परिषद और राज्यसभा की रिक्त हो रही सीटों पर होने वाला घमासान। राज्य में राज्यसभा की दस सीटों के लिए निर्वाचन आयोग ने पूरा कार्यक्रम जारी कर दिया है जिसके तहत नामांकन पत्र मिलने और दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस बार का चुनाव महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सभी राजनीतिक दलों के लिए अपनी ताकत दिखाने और संख्याबल को परखने का एक बड़ा मंच बन गया है।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी समाजवादी पार्टी दोनों ही खेमों में बैठकों का दौर तेज हो चुका है। भाजपा की कोर कमेटी ने अपने प्रत्याशियों को लेकर मंथन शुरू कर दिया है, तो वहीं अखिलेश यादव की पार्टी ने भी अपने सभी विधायकों को लखनऊ में ही डेरा डालने के निर्देश दे दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि यह चुनाव एक बार फिर से जोड़-तोड़ और रणनीतिक दांव-पेंच का गवाह बन सकता है, क्योंकि दोनों ही दल अपनी ताकत से अधिक सीटें जीतने की जुगत में लगे हैं।
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विधानसभा का मौजूदा गणित और पार्टियों की स्थिति
मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल 403 सीटों में से कुछ सीटें खाली हैं, जिसके चलते सदन का प्रभावी संख्याबल 397 विधायकों का है। नियमानुसार, राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए पहली वरीयता के कम से कम 37 से 38 वोटों की आवश्यकता होती है। यदि एनडीए गठबंधन के कुल विधायकों की संख्या पर गौर करें तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास लगभग 292 से अधिक विधायक मौजूद हैं। इस लिहाज से एनडीए अपनी सात सीटों पर बहुत ही आराम से जीत दर्ज कर सकता है, लेकिन आठवीं सीट को लेकर थोड़ा पेंच फंस सकता है जिसके लिए अतिरिक्त वोटों की दरकार होगी।
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के पास कुल मिलाकर करीब 103 विधायक हैं। इस संख्याबल के आधार पर सपा की दो सीटों पर जीत बेहद पक्की मानी जा रही है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने दो सीटों पर संतोष करने के बजाय तीसरा उम्मीदवार भी मैदान में उतारने का मन बना लिया है, जिसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। तीसरे उम्मीदवार की नैया पार लगाने के लिए सपा को अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी, जो बिना क्रॉस वोटिंग या अन्य दलों के भीतरखाने समर्थन के संभव नहीं दिखता।
सपा का मास्टरस्ट्रोक और तीसरे उम्मीदवार को लेकर सस्पेंस
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी की बैठक के बाद यह संकेत साफ कर दिए हैं कि पार्टी इस बार राज्यसभा चुनाव में सरप्राइज देने के पूरी मूड में है। पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता और रणनीतिकार प्रोफेसर रामगोपाल यादव को एक बार फिर उच्च सदन भेजने का फैसला किया है और उनके नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। इसके अलावा पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और अन्य चर्चित चेहरों के नामों पर भी अंदरखाने चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि, तीसरा उम्मीदवार कौन होगा और उसे जिताने के लिए पार्टी कौन सा सियासी फॉर्मूला अपनाएगी, इसे लेकर अभी पूरी तरह से पत्ते नहीं खोले गए हैं।
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और आगामी रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए ही तीसरे नाम की घोषणा की जाएगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सपा के पास अपने दो उम्मीदवारों को जिताने के बाद जो बचे हुए विधायक हैं, वे तीसरे प्रत्याशी की जीत का आंकड़ा कैसे पूरा करेंगे। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव को बेहद रोमांचक मान रहे हैं और इसमें पिछले चुनावों की तरह ही नाटकीय मोड़ आने की पूरी आशंका जताई जा रही है।
"राजनीति संभावनाओं का खेल है और संख्याबल के इस गणित में आखिरी वक्त तक बहुत कुछ बदल सकता है। हमारी पार्टी अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरी है और नतीजे चौंकाने वाले होंगे।" — समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता
भाजपा की रणनीति और संजय सेठ जैसे दांव की चर्चा
भले ही सपा अपने तीसरे उम्मीदवार को उतारने की तैयारी कर रही हो, लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी भी पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। पिछले राज्यसभा चुनावों के दौरान जिस तरह से भाजपा ने आखिरी वक्त पर अपने आठवें उम्मीदवार के रूप में उद्योगपति संजय सेठ को उतारकर सियासी उलटफेर किया था और सपा खेमे में सेंधमारी कर दी थी, उसकी यादें अभी भी ताजा हैं। उस दौरान सपा के कई विधायकों ने बगावत करते हुए क्रॉस वोटिंग की थी, जिससे विपक्षी दलों के अरमानों पर पानी फेर दिया गया था।
इस बार भी भाजपा की कोर कमेटी की बैठकों में इसी बात पर मंथन किया जा रहा है कि क्या पार्टी पिछले फॉर्मूले को दोहराते हुए अपने आठवें उम्मीदवार के जरिए मुकाबले को दिलचस्प बनाएगी। एनडीए के पास पर्याप्त संख्याबल होने के कारण वह अपने तय उम्मीदवारों को जिताने के बाद भी अतिरिक्त वोटों की स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है। जैसे-जैसे नामांकन और नाम वापसी की तारीखें नजदीक आएंगी, तस्वीर और अधिक साफ होती जाएगी कि कौन सा दल किस रणनीति के तहत अपने मोहरे चल रहा है।
चुनावी calendario और आगे की सियासी दिशा
भारत निर्वाचन आयोग के तय कार्यक्रम के अनुसार, इस पूरी चुनावी प्रक्रिया को बहुत ही कम समय में पूरा किया जाना है। नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद 7 अक्टूबर तक उम्मीदवार अपने पर्चे भर सकेंगे, जिसके बाद 9 अक्टूबर तक नाम वापस लेने का विकल्प खुला रहेगा। इस चुनाव का सबसे बड़ा दिन 16 अक्टूबर होगा, जब सुबह से मतदान शुरू होगा और मतदान प्रक्रिया समाप्त होने के तुरंत बाद वोटों की गिनती करके परिणामों की घोषणा कर दी जाएगी।
राज्यसभा के इन चुनावों के नतीजे केवल उच्च सदन के समीकरणों को ही प्रभावित नहीं करेंगे, बल्कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की मुख्य सियासी दिशा और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक दलों के मनोबल को भी तय करेंगे। यही कारण है कि हर एक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने और पाला बदलने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। आने वाले कुछ दिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े उठापटक के गवाह बन सकते हैं।






