दिल्ली की झुग्गी बस्ती में वोटर लिस्ट का विवाद
राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में यमुना के किनारे बसी बेला एस्टेट झुग्गी बस्ती का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने दावा किया कि वहां रहने वाले सैकड़ों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से चुपचाप काट दिए गए हैं, जिससे आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए आरोप लगाया कि इस बस्ती में कुल 728 लोग निवास करते हैं, जो पिछले कई चुनावों में लगातार मतदान करते आए हैं। लेकिन एसआईआर प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट में केवल एक ही नाम शेष बचा है, बाकी सभी नाम सूची से गायब कर दिए गए हैं। उन्होंने इसे जनता के अधिकारों पर सीधा प्रहार बताया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे दशकों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और उनके पास पिछले चुनावों में मतदान करने के पुख्ता प्रमाण भी मौजूद हैं। इसके बावजूद उनके नामों का इस तरह से सूची से बाहर होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
संबंधित खबरें
राहुल गांधी ने अधिकारियों से की फोन पर बात
बेला एस्टेट के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने मौके से ही संबंधित उपजिलाधिकारी (एसडीएम) को फोन मिलाया। उन्होंने अधिकारी से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि मकान होना या न होना मतदान के मौलिक अधिकार से कैसे जुड़ा हो सकता है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के उस बयान का भी हवाला दिया जिसमें बेघर लोगों के लिए 'हाउस नंबर 0' का प्रावधान होने की बात कही गई थी।
फोन पर बातचीत के दौरान स्थिति उस समय काफी तनावपूर्ण हो गई जब स्थानीय अधिकारी राहुल गांधी के तीखे सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने कड़े शब्दों में आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रशासनिक अमले की इस तरह की मनमानी और लापरवाही को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश है, जिसके तहत गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है ताकि चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सके।
कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में बड़ी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम के बीच नई दिल्ली में आयोजित कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की उच्चस्तरीय बैठक में वोट चोरी के मुद्दे पर एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई। पार्टी ने तय किया है कि इस गंभीर विषय को केवल संसद तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि अब इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में गलियों और चौपालों तक ले जाया जाएगा।
"देशभर में करोड़ों मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे इस लोकतंत्र विरोधी खेल को रोकें।" — केसी वेणुगोपाल, कांग्रेस महासचिव
बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल चुनिंदा राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, जिससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ रही है।
कांग्रेस नेताओं का यह भी कहना है कि उत्तर प्रदेश समेत आगामी सभी राज्यों के चुनावों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा और जनता के बीच जाकर प्रशासनिक गड़बड़ियों का पर्दाफाश किया जाएगा।
चुनाव आयोग का पक्ष और कानूनी प्रावधान
विपक्ष के इन तमाम गंभीर आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग की ओर से भी स्थिति स्पष्ट की गई है। आयोग का कहना है कि बेला एस्टेट से जुड़े मामलों में पुराने दस्तावेजों और मतदाता सूचियों की पूरी जांच की गई है। ज्यादातर मामलों में मतदाताओं के पते स्पष्ट नहीं थे या कृषि भूमि के रूप में दर्ज पाए गए, जिसके कारण नियमों के तहत सत्यापन प्रक्रिया अपनाई गई।
चुनाव आयोग ने यह भी जानकारी दी है कि जिन नागरिकों के नाम किसी कारणवश वर्तमान सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं, वे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 के अंतर्गत निर्धारित योग्यताएं पूरी करके अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए एक निश्चित समयावधि भी तय की गई है ताकि कोई भी पात्र मतदाता अपने अधिकार से न छूटे।
हालांकि, राजनीतिक दलों के बीच चल रही इस रस्साकशी के कारण यह मुद्दा अब आम जनता के बीच भी बहस का बड़ा विषय बन चुका है, जहां एक तरफ पारदर्शिता की मांग हो रही है तो दूसरी तरफ संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज
इस पूरे विवाद पर सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने राहुल गांधी के बयानों पर पलटवार करते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन देश में अनावश्यक अराजकता का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद आरोप लगाना विपक्षी दलों की हताशा को दर्शाता है।
बीजेपी नेताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो पूरी तरह से स्थापित नियमों और कानूनों के तहत काम करता है। चुनाव प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी के आरोप पूरी तरह से निराधार और राजनीति से प्रेरित हैं।
आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दल इसे जनहित और लोकतंत्र की रक्षा से जोड़कर एक बड़े आंदोलन का रूप देने की तैयारी में जुटे हैं। देखना यह होगा कि चुनाव आयोग और प्रशासन इन शिकायतों के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।







