भारत के लिए लगातार महंगा हो रहा है कच्चे तेल का आयात
भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशों से मंगाए जाने वाले कच्चे तेल का खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की ओर से जारी किए गए ताजा आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है कि देश के लिए क्रूड ऑयल का आयात बिल भारी भरकम बढ़ोतरी दर्ज कर रहा है। वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान भारत का कच्चा तेल आयात बिल 48 प्रतिशत बढ़कर 74.8 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है।
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि आयात की गई कुल मात्रा में कोई बहुत बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है, बल्कि यह उछाल पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आई तेजी की वजह से आया है। पिछले साल इसी समान अवधि में भारत को कच्चे तेल के आयात के लिए लगभग 50.4 अरब डॉलर चुकाने पड़े थे, जो अब बढ़कर सीधे 74.8 अरब डॉलर पर पहुंच गए हैं। इससे साफ है कि देश की जेब पर ऊर्जा का बोझ तेजी से भारी होता जा रहा है।
वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार अस्थिर बनी हुई हैं। हालांकि बीच-बीच में इनमें मामूली गिरावट भी देखने को मिलती है, लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी एशिया में बिगड़ते भू-राजनीतिक हालातों के चलते पिछले कई हफ्तों से कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर ही बनी हुई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक सप्लाई चेन सामान्य नहीं होती, तब तक कीमतों में राहत मिलने की कोई खास उम्मीद नहीं है।
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आयात की मात्रा वही, लेकिन चुकानी पड़ रही है भारी कीमत
आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच भारत ने कुल 100.7 मिलियन टन तेल का आयात किया है। वहीं, पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 101.1 मिलियन टन था। इससे साफ साबित होता है कि देश ने तेल की खपत या मंगाए जाने वाले वॉल्यूम में कोई अतिरिक्त बढ़ोतरी नहीं की है, बल्कि वॉल्यूम में थोड़ा बहुत उतार-चढ़ाव ही देखने को मिला है।
इसके बावजूद सिर्फ एक महीने यानी अगस्त के आंकड़ों को देखें तो आयात बिल 18 प्रतिशत की छलांग लगाकर 11.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि आयात का वॉल्यूम 3 प्रतिशत घटकर 19 मिलियन टन रह गया था। इसका सीधा मतलब यह है कि कम तेल खरीदने के बावजूद भारत को पहले से कहीं ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और वित्तीय शोध संस्थानों जैसे क्रिसिल इंटेलिजेंस ने इस पूरे वित्त वर्ष के लिए ब्रेंट क्रूड के अपने अनुमान को ऊपर की तरफ संशोधित कर दिया है।
क्रिसिल के मुताबिक, वैश्विक बाजार में इन्वेंट्री की कमी और पश्चिम एशिया के संघर्षों के कारण कच्चे तेल के दामों में साल-दर-साल 25 से 32 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का अनुमान है। यह स्थिति न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है, क्योंकि ऊर्जा की हर एक बूंद अब देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर डाल रही है।
घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ने का मंडरा रहा है बड़ा खतरा
ऊर्जा और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें कभी भी अकेले नहीं आतीं, बल्कि अपने साथ देश के भीतर महंगाई का पूरा चक्र लेकर आती हैं। क्रिसिल इंटेलिजेंस का स्पष्ट रूप से कहना है कि ऊर्जा की बढ़ती लागत अर्थव्यवस्था में हर स्तर पर महंगाई को बढ़ावा देती है। जब बाजार में मांग मजबूत होती है, तो बड़ी कंपनियां और निर्माता अपनी बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट या लागत का पूरा बोझ सीधे तौर पर आम ग्राहकों के सिर पर डाल देती हैं, जिससे रोजमर्रा की वस्तुएं और सेवाएं महंगी हो जाती हैं।
इस बात की तस्दीक हालिया आंकड़े भी करते हैं। अगस्त के महीने में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति का आंकड़ा बढ़कर काफी ऊंचे स्तर तक पहुंच गया था। यह ट्रेंड इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि किस तरह महंगे कच्चे तेल का असर औद्योगिक उत्पादन और परिवहन लागत पर पड़ रहा है। यदि लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग का खर्च इसी तरह बढ़ता रहा, तो इसका सीधा असर खुदरा बाजार में उपभोक्ता सामानों की कीमतों पर पड़ना तय है।
"ऊर्जा और कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव पड़ता है। जब आयात महंगा होता है, तो मैन्युफैक्चरिंग से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक सब कुछ प्रभावित होता है, जिसका अंततः असर आम आदमी की जेब पर महंगाई के रूप में पड़ता है।"— वित्तीय विश्लेषक
अंतरराष्ट्रीय तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं का असर
मौजूदा संकट के पीछे वैश्विक स्तर पर चल रहे कई बड़े भू-राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के अलावा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। इसके साथ ही, रुसी तेल के आयात पर अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगातार बढ़ाई जा रही सख्ती ने भी भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब तक भारत को रूस से रियायती दरों यानी डिस्काउंट पर कच्चा तेल मिल जाता था, जिससे आयात बिल को संतुलित रखने में काफी मदद मिलती थी।
लेकिन अब पश्चिमी प्रतिबंधों और सख्ती के कारण रूस से मिलने वाले सस्ते तेल की मात्रा में भी गिरावट दर्ज की जा रही है। ऐसे में भारत के पास मजबूरन अन्य महंगे सप्लायर्स का रुख करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। पारंपरिक और महंगे बाजारों से तेल खरीदने के कारण देश का आयात बिल और अधिक बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे पर पड़ रहा है।
व्यापार घाटा, कमजोर होता रुपया और क्या सस्ते रहेंगे पेट्रोल-डiesel?
जब देश का आयात महंगा होगा, तो स्वाभाविक है कि भारत का व्यापार घाटा और करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) दोनों में ही भारी बढ़ोतरी होगी। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के आयात का भुगतान हमेशा डॉलर में किया जाता है, इसलिए यदि पहले के मुकाबले अब अधिक डॉलर खर्च करने पड़ेंगे, तो भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। इसके परिणामस्वरूप, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी लगातार कमजोर होता जाएगा। रुपया कमजोर होने से आगे चलकर अन्य जरूरी वस्तुओं जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य तेल और फर्टिलाइज़र का आयात भी महंगा हो जाएगा।
भले ही अभी घरेलू स्तर पर सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा हुआ है, लेकिन आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर के ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लंबे समय तक रोक पाना सरकार और तेल कंपनियों के लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में आम जनता को आने वाले दिनों में ईंधन के मोर्चे पर बड़ा झटका लग सकता है।








