द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन के तहत जब हमने पिछले कुछ घंटों में देश भर में 'राशन' को लेकर अचानक उपजे डिजिटल रुझानों की थाह ली, तो परत-दर-परत एक बेहद जटिल सामाजिक और प्रशासनिक सच्चाई सामने आई। एक तरफ जहां सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी की जिंदगी में यह तकनीक कई बार एक नए किस्म के इम्तिहान की तरह सामने आ रही है।
डिजिटल बदलाव और ई-केवाईसी की अनिवार्यता
पिछले कुछ हफ्तों से देश के विभिन्न राज्यों में राशन कार्ड धारकों के लिए ई-केवाईसी (e-KYC) कराना अनिवार्य कर दिया गया है। इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए इंटरनेट और स्थानीय राशन दुकानों पर लोगों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। हमारे फील्ड संवाद के दौरान यह बात सामने आई कि फिंगरप्रिंट मिसमैच होने और सर्वर डाउन रहने की वजह से कई बुजुर्गों और दैनिक वेतन भोगियों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। तकनीक के इस दौर में सुविधा देने के वादे के बावजूद, धरातल पर क्रियान्वयन की धीमी गति लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गई है।
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वन नेशन, वन राशन कार्ड का प्रभाव
'वन नेशन वन राशन कार्ड' (ONORC) योजना ने प्रवासियों और कामगारों के लिए बड़ी राहत जरूर पैदा की है, लेकिन इसके तकनीकी पहलू अभी भी पूरी तरह से चाक-चौबंद नहीं हैं। दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे बड़े औद्योगिक महानगरों में काम करने वाले श्रमिकों का कहना है कि जब वे अपने मूल निवास स्थान से बाहर किसी अन्य राज्य में राशन लेने जाते हैं, तो कई बार स्थानीय पॉइन्ट ऑफ सेल (PoS) मशीनें नेटवर्क की समस्या के कारण कार्ड रीड नहीं कर पाती हैं। नीति और नीयत के बीच की यह तकनीकी खाई आज भी गरीबों के हक के बीच एक बड़ी दीवार बनी हुई है।
फर्जीवाड़ा रोकने की कोशिश बनाम वास्तविक जरूरतमंद
सरकार का तर्क है कि बायोमीट्रिक प्रमाणीकरण और डेटा डिजिटलीकरण से उन फर्जी राशन कार्डों पर लगाम लगी है जो सालों से सरकारी खजाने को चपत लगा रहे थे। आंकड़ों के मुताबिक, लाखों अपात्र लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत यह भी है कि कई वास्तविक जरूरतमंद लोग, जिनके पास तकनीकी साधन या जागरूकता की कमी है, वे सिस्टम की इस नई कसौटी पर खरे न उतर पाने के कारण अपने कोटे के अनाज से वंचित हो रहे हैं।
खाद्य सुरक्षा और भविष्य की चुनौतियाँ
एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सिस्टम को फुल-प्रूफ बनाने की प्रक्रिया में कुछ शुरुआती परेशानियां स्वाभाविक हैं, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से दूर किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब तक यह संक्रमण काल चल रहा है, तब तक उस मजदूर का चूल्हा कैसे जलेगा जिसका बायोमीट्रिक ऑथेंटिकेशन फेल हो चुका है? 'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल का निष्कर्ष साफ है कि खाद्य सुरक्षा जैसी संवेदनशील योजना में तकनीक केवल एक माध्यम होनी चाहिए, अंतिम बाधा नहीं।
निष्कर्ष
राशन प्रणाली में हो रहे ये बदलाव देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाल रहे हैं। जब तक जमीनी स्तर पर इंटरनेट कनेक्टिविटी, सर्वर की गति और मानवीय संवेदनाओं का सही संतुलन नहीं बनाया जाता, तब तक डिजिटल इंडिया का यह सपना धरातल पर पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकता।










