मानसून के मौसम के बाद देश के कई हिस्सों में जलजमाव एक आम समस्या बन जाती है, जो मच्छरों के पनपने के लिए सबसे अनुकूल माहौल तैयार करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों लगातार लोगों को डेंगू और मलेरिया जैसी गंभीर संक्रामक बीमारियों को लेकर आगाह कर रहे हैं। हालांकि इन दोनों ही बीमारियों का शुरुआती दौर में सामान्य इलाज के जरिए पूरी तरह ठीक किया जा सकता है, लेकिन इनकी वजह से शरीर पर पड़ने वाला बुरा प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है। ज्यादातर लोग यह मान लेते हैं कि बुखार उतरने और रिपोर्ट नॉर्मल आने का मतलब पूरी तरह स्वस्थ होना है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यहीं पर लोग सबसे बड़ी भूल कर बैठते हैं।
बीमारी से उबरने के बाद भी क्यों बनी रहती है शरीर में सुस्ती और थकान?
जब किसी व्यक्ति को डेंगू या मलेरिया का संक्रमण होता है, तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम को इस खतरनाक वायरस या पैरासाइट से लड़ने के लिए बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। इस पूरी प्रक्रिया में शरीर अंदर से काफी कमजोर हो जाता है। संक्रमण से ठीक होने के बाद भी मरीजों को कई हफ्तों तक लगातार थकान, सुस्ती और ऊर्जा की कमी का अनुभव हो सकता है। मलेरिया के मामले में तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है क्योंकि इसके परजीवी सीधे तौर पर लाल रक्त कोशिकाओं को अपना शिकार बनाते हैं, जिससे शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रिकवरी के इस नाजुक दौर में मरीजों को अपने शरीर को पर्याप्त आराम देने की जरूरत होती है। यदि कोई व्यक्ति ठीक होते ही तुरंत अपनी पुरानी भागदौड़ भरी जीवनशैली में लौट जाता है, तो उसकी रिकवरी की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और शरीर लंबे समय तक कमजोरी से जूझता रहता है। इसलिए इस दौरान खानपान पर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ शरीर को पूरा समय देना बेहद आवश्यक है।
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मलेरिया के बाद एनीमिया का खतरा और ऑक्सीजन संचार पर असर
मलेरिया के परजीवी हमारे खून में मौजूद लाल रक्त कोशिकाओं को तेजी से नष्ट करने का काम करते हैं। यही मुख्य वजह है कि मलेरिया से पीड़ित कई मरीजों को बाद में एनीमिया यानी खून की कमी की गंभीर समस्या से दो-चार होना पड़ता है। जब शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन की मात्रा तय सीमा से काफी कम हो जाती है, तो फेफड़ों से शरीर के बाकी अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होने लगती है।
ऑक्सीजन का संचार ठीक से न होने पर मरीज को हमेशा चक्कर आना, सांस फूलना, और जरा सी मेहनत पर अत्यधिक कमजोरी महसूस होना जैसी शिकायतें बनी रहती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टर आयरन और पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेने की सलाह देते हैं, ताकि हीमोग्लोबिन के स्तर को दोबारा सामान्य स्थिति में लाया जा सके। समय रहते इस पर ध्यान न देने पर यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है।
बुखार उतरने के बाद भी नहीं टलता खतरा, इन लक्षणों पर रखें कड़ी नजर
डेंगू के मामलों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह ध्यान रखने योग्य होती है कि शरीर का तापमान कम होने या बुखार उतरने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि मरीज खतरे से पूरी तरह बाहर आ चुका है। असल में, बीमारी के लगभग तीसरे से सातवें दिन के बीच, जब मरीज का बुखार उतरने लगता है, तब कुछ मामलों में बेहद गंभीर और खतरनाक लक्षण सामने आने शुरू हो जाते हैं। इस क्रिटिकल फेज के दौरान मरीजों और उनके परिजनों को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है।
यदि किसी मरीज को बुखार उतरने के बाद अचानक पेट में तेज और असहनीय दर्द होने लगे, लगातार उल्टियां आएं, सांस बहुत तेजी से चलने लगे या फिर मसूड़ों व नाक से खून आने जैसी कोई भी बात दिखाई दे, तो इसे सामान्य कमजोरी बिल्कुल न समझें। ऐसे लक्षण दिखते ही बिना एक पल गंवाए तुरंत किसी अच्छे अस्पताल या डॉक्टर के पास जाकर चिकित्सीय सहायता लेनी चाहिए, क्योंकि यह डेंगू के गंभीर रूप का संकेत हो सकता है।
"डेंगू और मलेरिया जैसी मौसमी बीमारियों में केवल इलाज करवाना ही काफी नहीं है, बल्कि रिकवरी पीरियड के दौरान बरती गई सावधानी ही मरीज को पूरी तरह स्वस्थ बनाती है। बुखार उतरने के बाद भी यदि शरीर में कमजोरी या अन्य असामान्य लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।" — डॉ. जयपाल चौधरी, वरिष्ठ चिकित्सा विशेषज्ञ
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और जागरूकता अभियान
मौसमी बीमारियों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग द्वारा विभिन्न ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में विशेष स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। नेशनल मोबाइल मेडिकल यूनिट वैन के जरिए गांवों में जाकर लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है और संदिग्ध मरीजों के डेंगू-मलेरिया के टेस्ट मौके पर ही किए जा रहे हैं। इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समय पर सही जांच और मुफ्त दवाइयां मिलने से मरीजों की स्थिति गंभीर न हो पाए और उन्हें बेवजह बड़े अस्पतालों के चक्कर न काटने पड़ें।
विशेषज्ञों की सलाह है कि मानसून के मौसम के बाद अपने आसपास पानी बिल्कुल न जमा होने दें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी का उपयोग करें। यदि आप या आपका कोई परिचित हाल ही में इन बीमारियों से उबरा है, तो उसके खानपान और शारीरिक संकेतों पर विशेष नजर रखें, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।










