महाराष्ट्र की सियासत में हलचल: एफडीए अधिकारियों पर लगे गंभीर आरोप
महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में उस समय भूचाल आ गया जब शिवसेना (उबाठा) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए (FDA) के भीतर चल रहे कथित भ्रष्टाचार का एक बड़ा कच्चा चिट्ठा खोल दिया। राउत ने विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे निरीक्षण और छापेमारी की आड़ में होटल, रेस्तरां और क्विक कॉमर्स कंपनियों को खुलेआम ब्लैकमेल कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे में हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि यह विभाग अपने कड़े फैसलों और सख्त छवि के लिए पहचाने जाने वाले आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में काम कर रहा है।
संजय राउत द्वारा उठाए गए इन तीखे सवालों के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। विपक्ष के इस आक्रामक तेवर से एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या प्रशासनिक अमले में बैठे लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं। दूसरी ओर, शासन और प्रशासन के गलियारों में इस बात की चर्चा है कि इस तरह के बड़े आरोपों के बाद विभाग के भीतर क्या अंदरूनी सुगबुगाहट चल रही होगी।
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लाइसेंस रद्द करने का डर दिखाकर हो रही है भारी उगाही
संजय राउत ने एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे को एक विस्तृत पत्र सौंपा है, जिसमें दावा किया गया है कि विभाग के नामित अधिकारियों, सहायक आयुक्तों और खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर अवैध वसूली की जा रही है। राउत के मुताबिक, बांद्रा स्थित एफडीए मुख्यालय और ठाणे कार्यालय इन दिनों कथित रूप से उगाही के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कारोबारियों को वैध प्रक्रिया और नोटिस व्यवस्था से दरकिनार करके सीधे तौर पर प्रतिष्ठान सील करने की धमकियां दी जा रही हैं।
पत्र में नागपुर, पुणे, सोलापुर, वर्धा और छत्रपति संभाजीनगर जैसे प्रमुख शहरों के व्यापारियों का हवाला दिया गया है। राउत का कहना है कि क्विक कॉमर्स कंपनियों से उनका निलंबित लाइसेंस बहाल करवाने के एवज में भारी-भरकम रकमें वसूली गई हैं। एक मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल हुई किसी सामान्य शिकायत के आधार पर एक होटल का लाइसेंस तुरंत निलंबित कर दिया गया, जबकि मौके पर जांच के दौरान ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला था जिसके आधार पर इतनी बड़ी कार्रवाई की जाए।
"आप कहते हैं कि व्यवस्था में सुधार हो रहा है, लेकिन यदि आपके अपने अधिकारियों पर ही आपका नियंत्रण नहीं बचा है, तो यह सुधार अधूरा और बेमानी है। एफडीए के कुछ भ्रष्ट अधिकारी आज खुलेआम कारोबारियों को लूट रहे हैं और लाइसेंस निलंबित करने का भय दिखाकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।" — संजय राउत, राज्यसभा सांसद (शिवसेना उबाठा)
आईएएस तुकाराम मुंढे का कड़ा पलटवार और चुनौती
अपने कड़े तेवर और ईमानदार कार्यशैली के लिए देश भर में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले आईएएस अधिकारी और एफडीए प्रमुख तुकाराम मुंढे ने संजय राउत के इन तमाम आरोपों पर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद मुंढे ने बिना किसी लाग-लपेट के दो टूक शब्दों में कहा कि यदि सांसद महोदय के पास उनके विभाग के किसी भी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या अवैध वसूली के पुख्ता सबूत हैं, तो उन्हें तुरंत सामने लाना चाहिए।
तुकाराम मुंढे ने स्पष्ट किया कि उनकी अगुवाई में विभाग पूरी पारदर्शिता और कानून के दायरे में रहकर काम कर रहा है। जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी प्रतिष्ठान को बख्शा नहीं जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि उनके विभाग का कोई भी अधिकारी गलत गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक सबसे कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मुंढे के इस दो टूक जवाब ने इस पूरे विवाद को और अधिक गंभीर मोड़ दे दिया है।
व्यापारियों की मुश्किलें और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवाल
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी तंत्र में पारदर्शिता लाने के लिए बनाए गए नियम कई बार भ्रष्टाचार का नया हथियार बन जाते हैं। जानकारों का मानना है कि क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी सेक्टर के बूम के बाद से एफडीए की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में निरीक्षण के नाम पर होने वाली मनमानी से छोटे और मझोले व्यापारी लगातार परेशान हो रहे हैं।
व्यापारी संघों का एक बड़ा वर्ग दबी जुबान में यह स्वीकार करता है कि कई बार छोटी-मोटी कमियों को बहुत बड़ा बनाकर पेश किया जाता है और बाद में समझौते के नाम पर भारी रकम की मांग की जाती है। संजय राउत के इस खुलासे के बाद अब आम व्यापारियों को यह उम्मीद बंधती दिख रही है कि शायद उनकी यह आवाज शासन के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचेगी और उन्हें अनावश्यक उत्पीड़न से मुक्ति मिलेगी।
निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक दिशा
संजय राउत और आईएएस तुकाराम मुंढे के बीच छिड़ा यह वाकयुद्ध आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार का जीता-जागता सबूत बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ तुकाराम मुंढे की कड़क छवि के कारण इस मामले में कई दिलचस्प मोड़ आने की संभावना बनी हुई है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या इस पत्र के बाद सरकार की तरफ से कोई उच्चस्तरीय जांच कमेटी बैठाई जाती है या फिर यह मामला सिर्फ बयानबाजी तक ही सिमट कर रह जाता है।










