नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक के गलियारों से लेकर वायुसेना मुख्यालय तक, इन दिनों रक्षा गलियारों में एक ही नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है—सुखोई-57 (Su-57)। गूगल ट्रेंड्स पर अचानक छाए इस विषय ने रक्षा विशेषज्ञों, रणनीतिकारों और आम जनता के बीच भी हलचल बढ़ा दी है। द फ्रीलान्स की ऑन-द-ग्राउंड खोजबीन बताती है कि रूस ने भारत के सामने पांचवीं पीढ़ी के अपने सबसे उन्नत स्टेल्थ फाइटर जेट Su-57 को लेकर एक बहुत बड़ा और लुभावना प्रस्ताव रखा है। लेकिन इस डील के रणनीतिक, आर्थिक और सामरिक निहितार्थ बेहद गहरे हैं।
रूसी ऑफर और 1 लाख करोड़ की संभावित डील
प्राप्त जानकारी और अंदरूनी सूत्रों के संकेतों के मुताबिक, रूस भारत को लगभग 75 सुखोई-57 लड़ाकू विमानों की सप्लाई करने की पेशकश कर रहा है। इस पूरी डील की अनुमानित कीमत करीब 1 लाख करोड़ रुपये तक आंकी जा रही है। ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से ठीक पहले रक्षा बाजार में आई इस खबर ने सामरिक हलकों में भूचाल ला दिया है। रूस का दावा है कि यूक्रेन युद्ध के वास्तविक युद्धक्षेत्र से मिले अनुभवों ने Su-57 के एवियोनिक्स, रडार और स्टेल्थ क्षमताओं को और अधिक धारदार बना दिया है, जिसे भारत जैसे रणनीतिक साझीदार के साथ साझा किया जा सकता है।
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IAF चीफ के बयान और 5वीं पीढ़ी के जेट्स की तलाश
भारतीय वायुसेना (IAF) प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के हालिया बयानों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है। वायुसेना लंबे समय से अपनी पांचवीं पीढ़ी की क्षमताओं को मजबूत करने पर विचार कर रही है। वैश्विक स्तर पर लॉकहीड मार्टिन का F-35 और रूस का Su-57 ही ऐसे विकल्प हैं जिन पर गंभीर चर्चा हो सकती है। जहां एक ओर पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी नियंत्रण और भू-राजनीतिक समीकरण F-35 के रास्ते में अड़चन बनते हैं, वहीं रूस का पुराना और आजमाया हुआ रक्षा सहयोग Su-57 को भारत के लिए तकनीकी रूप से अधिक सुलभ बनाता है।
चीनी स्टील्थ खतरा और रणनीतिक दबाव
भारत के उत्तरी मोर्चे पर चीन लगातार अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट 'J-20' और अन्य स्टेल्थ विमानों के बेड़े को मजबूत कर रहा है। ऐसे में, भारतीय वायुसेना के पास समय की कमी है। पारंपरिक चौथी और साढ़े चौथी पीढ़ी के विमान जैसे राफेल और तेजस अपनी जगह बेहतरीन हैं, लेकिन चीनी स्टेल्थ खतरे का मुकाबला करने के लिए भारत को फौरन एक मजबूत 'गेम चेंजर' की आवश्यकता है। रूस का यह नया पैंतरा इसी सामरिक विवशता को भुनाने की एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होता है।
क्या अटकेगा राफेल, तेजस और AMCA का प्लान?
यह इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील और अहम सवाल है। रक्षा विश्लेषकों के मन में यह सवाल सुलग रहा है कि क्या इतनी भारी भरकम रकम (1 लाख करोड़ रुपये) Su-57 पर खर्च करने से भारत के घरेलू रक्षा कार्यक्रमों पर असर पड़ेगा?
- तेजस (Tejas Mk1A/Mk2): हल्के लड़ाकू विमानों का यह बेड़ा अपनी गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन में देरी एक समस्या बनी हुई है।
- AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft): भारत का महत्वाकांक्षी स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर प्रोजेक्ट। यदि भारी बजट रूस से Su-57 खरीदने में झोंक दिया गया, तो क्या AMCA के अनुसंधान और विकास (R&D) फंड पर असर पड़ेगा?
- राफेल (Rafale): भारतीय नौसेना और वायुसेना के लिए राफेल के अतिरिक्त स्क्वाड्रन की योजनाएं पहले से चल रही हैं, ऐसे में Su-57 की एंट्री इस समीकरण को उलझा सकती है।
निष्कर्ष: भारत का फूंक-फूंक कर कदम
द फ्रीलान्स की पड़ताल निष्कर्ष देती है कि रूस का Su-57 ऑफर भारत के लिए जहां एक ओर रातों-रात पांचवीं पीढ़ी की मारक क्षमता हासिल करने का शॉर्टकट हो सकता है, वहीं दूसरी ओर यह 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' के तहत स्वदेशी AMCA कार्यक्रम के लिए एक बड़ी परीक्षा भी है। आने वाले महीनों में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) और राजनीतिक नेतृत्व को यह तय करना होगा कि तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता दी जाए या दीर्घकालिक स्वदेशी आत्मनिर्भरता को।








