नई दिल्ली में कूटनीति और व्यापार का महासंगम
भारत और स्विट्जरलैंड के बीच कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों को एक नई और विराट दिशा मिल गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन की अगुवाई में हुई द्विपक्षीय बातचीत ने दोनों देशों के बीच सहयोग के दायरे को बेहद व्यापक बना दिया है। अब तक यह साझेदारी मुख्य रूप से पारंपरिक व्यापार तक सीमित थी, लेकिन अब इसमें रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अत्याधुनिक तकनीक, और बुनियादी ढांचे जैसे सामरिक क्षेत्र भी शामिल कर लिए गए हैं। इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने इस बात पर सहमति जताई है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत और स्विट्जरलैंड मिलकर एक मजबूत और भरोसेमंद आर्थिक मॉडल पेश करेंगे।
स्विस राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन अपनी तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे हैं। इस साल यह उनका दूसरा भारत दौरा है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक नजदीकियों को साफ तौर पर दर्शाता है। इससे पहले वह इसी साल फरवरी के महीने में 'एआई इंपैक्ट शिखर सम्मेलन' में हिस्सा लेने के लिए भारत आए थे। प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई इस विस्तृत बैठक में दोनों नेताओं ने व्यापारिक बाधाओं को दूर करने और भारतीय उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजारों तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने पर विस्तार से चर्चा की।
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टीईपीए समझौता: आर्थिक तरक्की का महत्वाकांक्षी खाका
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के सदस्य देशों—आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड—के बीच हुआ 'व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता' (टीईपीए) इस पूरी साझेदारी का मुख्य आधार है। इस समझौते के पूरी तरह प्रभावी होने से दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों को अभूतपूर्व गति मिली है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे भविष्य की समृद्धि का एक बेहद महत्वाकांक्षी खाका करार दिया है।
इस समझौते के तहत निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार, आगामी 15 वर्षों के भीतर भारत में 100 अरब अमेरिकी डॉलर के भारी-भरकम स्विस निवेश को आकर्षित करने की योजना है। इस भारी निवेश का सबसे बड़ा फायदा देश के युवाओं को मिलेगा, क्योंकि इससे प्रत्यक्ष तौर पर 10 लाख नए रोजगार सृजित होने का अनुमान लगाया गया है। वर्तमान समय में भी भारत में इंजीनियरिंग, रसायन, सेवा और दवा क्षेत्रों से जुड़ी 340 से अधिक स्विस कंपनियां सक्रिय रूप से काम कर रही हैं, जबकि कई प्रमुख भारतीय कंपनियां भी स्विट्जरलैंड में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।
"भारत और स्विट्जरलैंड के बीच का यह समझौता केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह हमारे युवाओं के लिए सुनहरे भविष्य और दोनों देशों की साझा समृद्धि का एक मजबूत आधार है। नवाचार और उन्नत तकनीक हमारी इस साझीदार यात्रा को नई ऊंचाई देंगे।" — नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत
बुनियादी ढांचे और रक्षा क्षेत्र में बढ़ेगा आपसी सहयोग
व्यापार और निवेश के अलावा, आधारभूत संरचना और रक्षा विनिर्माण के मोर्चे पर भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत की कई प्रमुख विकास परियोजनाओं का जिक्र करते हुए स्विस कंपनियों को इनमें बढ़-चढ़कर भाग लेने का आमंत्रण दिया। वाराणसी में चल रहे रोपवे प्रोजेक्ट, नोएडा के जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण और पहाड़ी क्षेत्रों में सुरंगों तथा रेलवे लाइनों के विकास कार्यों को भारत-स्विट्जरलैंड तकनीकी सहयोग के बेहतरीन उदाहरणों के रूप में रेखांकित किया गया।
इसके साथ ही, रक्षा और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग को गहरा करने पर सहमति बनी है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सैन्य आदान-प्रदान बढ़ाने तथा रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में नई संभावनाओं को तलाशने के लिए संयुक्त कार्यबल गठित किए जाएंगे। जानकारों का मानना है कि स्विस तकनीकी विशेषज्ञता और भारत के विशाल बाजार का यह मेल रक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।
युवाओं और पेशेवरों के लिए खुलेंगे अवसरों के नए द्वार
इस उच्चस्तरीय मुलाकात के दौरान एक और बेहद महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया, जो सीधे तौर पर छात्रों, शोधकर्ताओं और कामकाजी पेशेवरों को प्रभावित करेगा। भारत और स्विट्जरलैंड के बीच प्रवासन और आवाजाही साझेदारी समझौते के साथ-साथ युवा पेशेवर समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए। इस नई व्यवस्था के लागू होने से भारतीय छात्रों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए स्विट्जरलैंड में उच्च शिक्षा, शोध और करियर के नए रास्ते सहजता से खुल जाएंगे।
प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के नागरिकों के बीच आपसी संपर्क ही इस साझेदारी की असली ताकत है। इसके अलावा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में कई नई संयुक्त परियोजनाएं भी बहुत जल्द शुरू की जाएंगी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में यह कूटनीतिक कदम बेहद अहम माना जा रहा है।






