नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय बाजारों में पिछले कुछ दशकों में चीनी सामानों की घुसपैठ इतनी गहरी हो चुकी है कि आज छोटी सुई से लेकर बड़ी صنعتی मशीनें तक चीन से आ रही हैं। यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा आर्थिक देश होने के बावजूद भारत धीरे-धीरे इस आयात के जाल में कैसे फंसता चला गया। हमारी ज़मीनी पड़ताल बताती है कि स्थानीय स्तर पर उत्पादन लागत अधिक होने और तकनीक की कमी के कारण व्यापारियों और उद्योगों के पास सस्ते विकल्पों का चुनाव करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। स्थिति यह है कि त्योहारी सीज़न से लेकर रोज़मर्रा के उपयोग की चीज़ों तक पर आज चीन की गहरी छाप साफ दिखाई देती है।
व्यापारिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से लेकर देश के तमाम बड़े बंदरगाहों तक, चीन से आने वाले सामानों का दायरा लगातार फैलता गया है। हाल ही में सीमावर्ती व्यापारिक दलों के चीन जाने और वहां से सामान लाने की खबरें इस बात की गवाही देती हैं कि पारंपरिक और आधुनिक दोनों रास्तों से यह व्यापार लगातार जारी है। दूसरी ओर, भारी उद्योगों की बात करें तो बेल्जियम या अन्य देशों से 200 टन के वेसल जैसी भारी मशीनें करोड़ों रुपये खर्च करके मंगानी पड़ती हैं, क्योंकि देश के भीतर वैसी उन्नत तकनीकों का ढांचा पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है। जब देश की बड़ी फैक्टरियों को विदेशी मशीनों पर निर्भर रहना पड़े, तो छोटे स्तर पर चीन के सस्ते कलपुर्जे और उत्पाद कितने हावी होंगे, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।
सस्ते सामान का आकर्षण और स्थानीय उद्योगों की लाचारी
बाजार में हर उपभोक्ता की पहली प्राथमिकता कम कीमत में अच्छी दिखने वाली चीज़ें खरीदना होती है। चीन के उत्पाद इस मोर्चे पर हमेशा से भारतीय निर्माताओं से आगे रहे हैं, क्योंकि वहां की सरकार उद्योगों को भारी सब्सिडी देती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके मुकाबले भारत में बिजली के दाम, कर्ज पर मिलने वाला ब्याज और ढुलाई का खर्च बहुत ज्यादा है। इन सब वजहों से हमारे छोटे और मंझोले उद्योग उन कीमतों का मुकाबला नहीं कर पाते जो चीन अपने सामानों पर देता है। नतीजा यह हुआ कि खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स, लाइटिंग और प्लास्टिक के सामान बनाने वाले देश के हज़ारों छोटे कारखाने धीरे-धीरे बंद हो गए और उनके मालिकों ने केवल आयातित सामान बेचने का काम शुरू कर दिया।
नीति निर्माताओं के स्तर पर भी इस निर्भरता को कम करने के लिए कई बार वादे किए गए और 'मेक इन इंडिया' जैसी बड़ी योजनाओं की शुरुआत की गई। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि केवल नीतियां बनाने से रातों-रात बदलाव नहीं आता। जब तक देश में कच्चा माल, उन्नत तकनीक और कुशल कारीगरों का सही ecosystem तैयार नहीं होगा, तब तक चीन से आयात रोकना लगभग असंभव सा लगता है। इलेक्ट्रॉनिक चिप्स से लेकर सोलर पैनल तक, आज देश के भविष्य से जुड़े हर बड़े सेक्टर में चीन का कच्चा माल या सीधा उत्पाद इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में यह जाल केवल आर्थिक नहीं बल्कि तकनीकी और सामरिक रूप से भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
बुनियादी ढांचे की कमी और आयात पर मजबूरी
भारत में भारी इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लेकर हमेशा से यह बहस होती रही है कि देश में वे क्यों नहीं बन सके जो विदेशों से मंगाए जाते हैं। जानकारों का मानना है कि अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) पर भारत में जीडीपी का बहुत कम हिस्सा खर्च होता है। इसके अलावा, बड़े प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि एजेंसियां स्वदेशी तकनीक विकसित करने का जोखिम उठाने के बजाय सीधे विदेश से मशीनें आयात करना सुरक्षित मानती हैं। यही कारण है कि चाहे पावर प्लांट हो या रक्षा उत्पादन, कई मोर्चों पर हम आज भी आयात पर पूरी तरह निर्भर हैं और चीन इस कमी का फायदा उठाने में हमेशा आगे रहा है।
आम जनता भी इस दोहरी स्थिति की शिकार है क्योंकि महंगाई के इस दौर में हर कोई अपनी जेब के हिसाब से खरीदारी करना चाहता है। जब बाज़ार में एक चीनी एलईडी बल्ब पचास रुपये में और स्वदेशी बल्ब डेढ़ सौ रुपये में मिले, तो आम ग्राहक स्वाभाविक रूप से सस्ते विकल्प की तरफ ही झुकेगा। जब तक सरकार घरेलू उद्योगों को टैक्स में बड़ी छूट और आधुनिक तकनीक की सीधी मदद नहीं देती, तब तक यह चक्र यूं ही चलता रहेगा। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि इस आयात के जाल से बाहर निकलने के लिए केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि ज़मीन पर ठोस और कड़े आर्थिक सुधारों की सख्त ज़रूरत है।





