भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता क्यों पहुंची निर्णायक मोड़ पर
नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच लंबे समय से जारी व्यापार समझौते (Trade Deal) की बातचीत एक बार फिर पेचीदा स्थिति में उलझती नजर आ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पूरी प्रक्रिया पर खुलकर बात करते हुए साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच अब ऐसी स्थिति बन गई है जहां आगे की ओर नई रियायतें देना या लेना दोनों पक्षों के लिए लगभग असंभव सा होता जा रहा है। हालांकि कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन मौजूदा हालात इस बात की गवाही दे रहे हैं कि सहमति का दायरा सिमटता जा रहा है।
हाल ही में राजधानी में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान वित्त मंत्री ने वैश्विक मीडिया और अर्थशास्त्रियों के सामने यह बात रखी। उन्होंने बताया कि अब तक दोनों देशों के बीच अनगिनत दौर की गहन चर्चाएं हो चुकी हैं, जिनमें विभिन्न सेक्टरों की जरूरतों को समझने का प्रयास किया गया। लेकिन अब वार्ता एक ऐसे मुकाम पर आ गई है जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'प्लैट्यू' कहा जाता है। इस स्तर पर आकर दोनों ही राष्ट्रों की अपनी घरेलू मजबूरियां और आर्थिक प्राथमिकताएं आड़े आ रही हैं, जिसके चलते अतिरिक्त समझौते करना बेहद दुरूह साबित हो रहा है।
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व्यापार असंतुलन और टैरिफ नीति पर भारत का कड़ा रुख
इस पूरी बातचीत के दौरान ट्रेड इम्बैलेंस यानी व्यापार घाटा और आयात शुल्क सबसे बड़े अवरोधक के रूप में उभरे हैं। अमेरिकी पक्ष लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि भारत के साथ उसका व्यापार घाटा कम होना चाहिए। जानकारों का मानना है कि पारंपरिक कूटनीति में बाजार तक पहुंच बढ़ाकर और आपसी संवाद के जरिए इन दूरियों को पाटा जाता था। परंतु हालिया दौर में टैरिफ को केवल आर्थिक उपकरण के बजाय एक दबाव बनाने वाले हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का चलन तेजी से बढ़ा है, जो वैश्विक मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है।
सरकार का स्पष्ट मानना है कि किसी भी देश के साथ आर्थिक संतुलन बिठाने के नाम पर घरेलू उद्योगों और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की बलि नहीं दी जा सकती। भारत ने वैश्विक मंचों पर बार-बार यह रेखांकित किया है कि एकतरफा टैरिफ थोपने से न केवल सप्लाई चेन प्रभावित होती है, बल्कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आत्मनिर्भरता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि अमेरिकी पक्ष की तरफ से आ रहे दबाव के बावजूद भारतीय वार्ताकार बेहद नपते-तुले कदम उठा रहे हैं।
"बातचीत का यह दौर काफी गहन और चुनौतीपूर्ण रहा है। हम ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं जहां दोनों पक्षों के लिए आगे और रियायतें देना बेहद कठिन हो गया है, हालांकि संवाद के रास्ते अभी भी खुले हुए हैं।" — निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के दौरे और वैश्विक कूटनीति के मायने
इस बीच, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी अमेरिका का दौरा कर द्विपक्षीय व्यापार फ्रेमवर्क को गति देने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें कीं। फरवरी में दोनों देशों ने अंतरिम ट्रेड एग्रीमेंट के लिए एक रूपरेखा तैयार की थी, जिसके तहत सप्लाई चेन को मजबूत करने और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने पर सहमति बनी थी। हालांकि, जमीनी स्तर पर नीतियों को अमलीजामा पहनाने के दौरान दोनों देशों के आर्थिक हितों के बीच टकराव साफ तौर पर देखा जा सकता है।
इसके अलावा, जीट्वीटी (G20) मंचों पर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों, जबरन श्रम और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के भविष्य को लेकर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। मिल्वौकी में आयोजित उद्योग मंत्रियों की बैठक में कुछ प्रमुख मुद्दों पर आम सहमति न बन पाना इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक व्यापारिक समुदाय में गहरे वैचारिक और आर्थिक अंतर पैदा हो चुके हैं।
यूरोपीय यूनियन डील का उदाहरण और भारत की संतुलित नीति
अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए वित्त मंत्री ने यूरोपीय संघ (EU) के साथ हुई फ्री ट्रेड डील का भी उदाहरण दिया। भारत ने हाल ही में यूरोपीय देशों के साथ बेहद सधे हुए तरीके से समझौते को अंतिम रूप दिया है, जिसमें देश के किसानों, लघु उद्योगों और घरेलू उत्पादकों के हितों को पूरी सुरक्षा दी गई है। भारत की यह नीति साफ करती है कि देश विदेशी बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उत्सुक तो है, लेकिन अपनी संप्रभुता और घरेलू बाजार के हितों से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
आगामी हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ इन अड़चनों को दूर करने के लिए किस प्रकार का रुख अपनाता है। क्या दोनों देश आपसी सहमति का कोई नया रास्ता तलाशने में कामयाब होते हैं या फिर यह व्यापार वार्ता लंबी अनिश्चितता के दौर में चली जाती है, इसका असर आने वाले समय में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर गहरा प्रभाव डालेगा।








