मुंबई की सड़कों पर उद्धव और राज ठाकरे का संयुक्त शक्ति प्रदर्शन
महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने हाल ہی में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक बड़े विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। इस संयुक्त मोर्चे को 'गर्जना मोर्चा' का नाम दिया गया था। इस प्रदर्शन में विभिन्न विपक्षी दलों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आम नागरिक और किसान संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे।
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम मुंबई के महत्वपूर्ण इलाकों से गुजरा। प्रदर्शनकारियों ने मेट्रो सिनेमा के पास से अपनी शुरुआत करते हुए बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) मुख्यालय तक मार्च किया। इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, लेकिन प्रशासन की अनुमति न मिलने के कारण अब इस आयोजन से जुड़ी कानूनी मुश्किलें खड़ी हो गईं हैं। पुलिस ने आयोजकों के खिलाफ नियमों की अनदेखी करने का मामला दर्ज कर लिया है, जिससे राज्य की सियासत में गर्माहट और बढ़ गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों ठाकरे बंधुओं का एक मंच पर आना और किसी बड़े मुद्दे पर इस तरह सड़क पर उतरना राज्य के आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी अहम है। हालांकि, प्रशासन के नियमों का हवाला देते हुए पुलिस ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है और आयोजकों से जवाब तलब किया जा रहा है।
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बिना अनुमति का मार्च और पुलिस की कानूनी कार्रवाई
मुंबई पुलिस के आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रविवार को निकाला गया यह 'गर्जना मोर्चा' प्रशासनिक अनुमति के बिना आयोजित किया गया था। सार्वजनिक स्थानों पर बिना पूर्व अनुमति के इस तरह के बड़े जलसा और प्रदर्शन करने पर पाबंदी होती है, जिसके चलते पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए या नियमों के उल्लंघन के आधार पर कार्यक्रम के प्रमुख आयोजकों के खिलाफ कानूनी धाराओं में मामला दर्ज किया है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की पहली प्राथमिकता है। चूंकि इस मार्च में भारी भीड़ जुटी थी और ट्रैफिक व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ा था, इसलिए बिना वैध अनुमति के ऐसा आयोजन करना नियमों के खिलाफ है। हालांकि, इस एफआईआर और कानूनी कार्रवाई के बाद ठाकरे गुات या मनसे के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई बड़ी जवाबी प्रतिक्रिया तुरंत सामने नहीं आई है, लेकिन स्थानीय नेताओं में इसको लेकर नाराजगी देखी जा रही है।
विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रशासनिक बैठकों में इस बात पर लगातार चर्चा होती रही है कि रैलियों या मोर्चों के लिए समय रहते अनुमति ली जानी चाहिए। अब देखना यह होगा कि पुलिस इस मामले में आगे क्या जांच करती है और आयोजकों की तरफ से इस कानूनी शिकंजे पर क्या सफाई दी जाती है।
मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य एजेंडा देश में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना था। प्रदर्शनकारियों और नेताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां की जा रही हैं, जिससे आम नागरिकों के मताधिकार पर असर पड़ रहा है। मार्च में शामिल लोगों ने हाथों में तख्तियां लेकर चुनाव आयोग से निष्पक्षता बनाए रखने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।
इस दौरान एक खास बात यह देखने को मिली कि प्रदर्शनकारियों ने अपनी-अपनी पार्टियों के पारंपरिक झंडों को छोड़ सिर्फ तिरंगा झंडा थाम रखा था। इसे राजनीतिक जानकारों ने एक नई रणनीति के रूप में देखा, ताकि इसे आम जनता का आंदोलन साबित किया जा सके। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों से नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है।
"मैं लंबे समय से कह रहा हूं कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और वोट चोरी के मामलों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे।" — राज ठाकरे, अध्यक्ष, मनसे
विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं का निष्पक्ष रहना सबसे ज्यादा जरूरी है। यदि चुनाव प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो लोकतांत्रिक ढांचे की नींव हिल जाती है। इसी संदेश को जनता तक पहुंचाने के लिए यह संयुक्त मोर्चा निकाला गया था।
सत्ता पक्ष का कड़ा पलटवार: बीजेपी और शिवसेना ने बताया पब्लिसिटी स्टंट
ठाकरे बंधुओं के इस संयुक्त प्रदर्शन पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने तीखा हमला बोला है। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस 'गर्जना मोर्चा' को आड़े हाथों लेते हुए इसे 'कोल्हे-कुई मार्च' यानी सियारों की आवाज करार दिया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि चुनाव जीतने के बाद विपक्ष की यह प्रतिक्रिया 'अंगूर खट्टे हैं' वाली मानसिकता को दर्शाती है।
सत्ता पक्ष के नेताओं ने याद दिलाया कि यही वही नेता हैं जिन्होंने पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और इन्हीं चुनाव प्रणालियों के तहत चुनावों में जीत हासिल की थी। जब नतीजे उनके पक्ष में होते हैं, तब सब कुछ ठीक रहता है, लेकिन हार मिलते ही वे संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने लगते हैं। बीजेपी का यह भी कहना है कि इस तरह के प्रदर्शन केवल राजनीतिक जमीन तलाशने और अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए किए जा रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि महाविकास अघाड़ी के अन्य घटक दल भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इस मुद्दे पर ठाकरे ब्रदर्स के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति में और अधिक तीखा टकराव देखने को मिल सकता है।








