भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों अपनी तेज रफ्तार और मजबूत जीडीपी आंकड़ों को लेकर लगातार सुर्खियों में बनी हुई है। सरकार की ओर से जारी हालिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि देश की वास्तविक जीडीपी में शानदार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है और घरेलू मांग के साथ-साथ विनिर्माण क्षेत्र भी बेहतरीन प्रदर्शन कर रहा है। हालांकि, आर्थिक तरक्की की इस चमकती हुई तस्वीर के ठीक पीछे एक ऐसा सच भी छुपा है, जो देश के उज्ज्वल भविष्य और युवा आबादी की ताकत पर सवालिया निशान खड़े करता है। ताजा श्रम बाजार के आंकड़ों ने एक ऐसी चिंताजनक सच्चाई को उजागर किया है, जिस पर नीति निर्माताओं को गहराई से विचार करने की जरूरत है।
देशभर में पहली बार जिला-स्तरीय श्रम बल सर्वेक्षण के आंकड़े सामने आए हैं, जिन्होंने यह बता दिया है कि विकास के दावों के बीच जमीनी हकीकत कितनी चुनौतीपूर्ण है। इन आंकड़ों के अनुसार, देश के करीब 250 जिलों में 15 से 29 वर्ष की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से मुख्यधारा से कटा हुआ है। इन युवाओं के पास न तो कोई नियमित नौकरी या रोजगार है, न ही वे किसी शैक्षणिक संस्थान में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और न ही उन्हें किसी प्रकार का कौशल प्रशिक्षण मिल रहा है। इस विशेष श्रेणी को श्रम अर्थशास्त्र की भाषा में 'नीट' यानी नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन एंड ट्रेनिंग कहा जाता है।
हिन्दी बेल्ट और बड़े राज्यों के जिलों में सबसे गंभीर स्थिति
यदि राष्ट्रीय स्तर पर बात की जाए तो 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं की नीट दर लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन जब जिलावार विश्लेषण किया जाता है तो तस्वीर और भी डरावनी नजर आती है। देश के कई राज्यों के दो-तिहाई जिलों में यह अनुपात राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है। विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे घनी आबादी वाले राज्यों के अधिकांश जिलों में कम से कम एक चौथाई युवा इस संकट की चपेट में हैं। इसके अलावा दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे असम, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के भी लगभग आधे जिलों में यही स्थिति बनी हुई है।
हालांकि, देश भर में इस संकट का प्रभाव एक समान नहीं है। कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां हालात काफी बेहतर हैं और वहां इस श्रेणी के युवाओं की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम दर्ज की गई है। उदाहरण के लिए, ओडिशा के नबरंगपुर जिले में नीट दर बेहद कम यानी करीब 4.1 प्रतिशत पाई गई है, और केरल के एर्नाकुलम जैसे जिलों में भी स्थिति राष्ट्रीय औसत से काफी संतोषजनक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या केवल संसाधनों की कमी से जुड़ी नहीं है, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, स्थानीय स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल विकास के अवसरों और सामाजिक परिस्थितियों की बड़ी भूमिका है।
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जीडीपी की ऊंची छलांग और रोजगार के घटते अवसरों का विरोधाभास
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक तरफ जहां यह कहा जा रहा है कि देश की वास्तविक जीडीपी और सकल मूल्य वर्धित आंकड़ों में मजबूत वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह आर्थिक विकास उस अनुपात में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है जिसकी देश को जरूरत है। जाने-माने अर्थशास्त्री और जेएनयू के प्रोफेसर रहे अरुण कुमार का मानना है कि मौजूदा जीडीपी के आंकड़े मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र की गतिविधियों को दर्शाते हैं, जबकि देश की रीढ़ कहे जाने वाले असंगठित क्षेत्र की वास्तविक बदहाली इन आंकड़ों में छुप जाती है।
"वृद्धि दर मापने का तरीका भी गलत इस्तेमाल हो रहा है। संगठित क्षेत्र का बढ़ना और असंगठित क्षेत्र का घटना असल में बेरोजगारी पैदा करता है। असंगठित क्षेत्र पर लगातार बढ़ते दबाव के कारण लोग बाहर हो रहे हैं, लेकिन सही डेटा न मिलने के कारण नीतिगत मोर्चे पर दिक्कतें बनी हुई हैं।" — प्रोफेसर अरुण कुमार, वरिष्ठ अर्थशास्त्री
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आंकड़ों में कई बार आंशिक रूप से बेरोजगार या कम आय वाले कामगारों को भी पूर्ण रोजगार मान लिया जाता है, जिससे जमीनी हकीकत धुंधली हो जाती है। हाल के वर्षों में ई-कॉमर्स और आधुनिक बाजारों के विस्तार के कारण पारंपरिक खुदरा व्यापार और छोटे व्यवसायों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, जिससे असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। संगठित क्षेत्र में नौकरियां सीमित होने के कारण नौकरी गंवाने वाले लोग जब असंगठित क्षेत्र की तरफ रुख करते हैं, तो वहां पहले से ही भीड़ और संसाधनों का संकट होता है।
नीति आयोग की रिपोर्ट और देश के डेमोग्रेफिक डिविडेंड का भविष्य
नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी की गई ‘रीइमेजिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत @2047' नाम की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है कि देश के श्रम बल में स्वरोजगार में लगे लोगों का प्रतिशत बहुत अधिक है, जिनमें से अधिकांश के पास किसी भी प्रकार का सामाजिक सुरक्षा कवच या भविष्य की गारंटी नहीं होती है। भारत की कुल आबादी में युवाओं की भारी संख्या को हमेशा से देश का सबसे बड़ा 'डेमोग्रेफिक डिविडेंड' यानी जनसांख्यकीय लाभांश कहा जाता रहा है। राजनेताओं से लेकर अर्थशास्त्रियों तक सभी का यह मानना रहा है कि यह युवा आबादी देश को दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बना सकती है।
लेकिन यह लाभांश तभी देश के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है जब इन युवाओं के हाथों में डिग्री के साथ-साथ ऐसा कौशल हो जो आधुनिक बाजारों की मांग के अनुकूल हो। जब देश के 250 जिलों में एक चौथाई युवा बिना किसी काम और शिक्षा के जीवन बिता रहे हों, तो यह सिर्फ एक श्रम बाजार का आंकड़ा नहीं बल्कि देश के नीतिगतारों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। भारत ने वर्ष 2047 तक एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनने का एक भव्य और महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल बड़ी फैक्ट्रियों, ऊंची इमारतों या जीडीपी के ऊंचे अंकों से संभव नहीं होगी।
निष्कर्ष और आगे की राह
किसी भी देश की असली ताकत उसके नागरिकों की कार्यक्षमता, उनकी शिक्षा और उनके जीवन स्तर में छिपी होती है। यदि देश के करोड़ों युवा शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा से बाहर रहेंगे, तो विकसित भारत का सपना अधूरा ही रह जाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि केवल संगठित उद्योगों के भरोसे बैठने के बजाय ग्रामीण और छोटे शहरों के असंगठित क्षेत्रों को मजबूत किया जाए। स्थानीय स्तर पर युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना हो, छोटे उद्योगों को वित्तीय सहायता मिले और रोजगारपरक शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए, तभी इन 250 जिलों के युवाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकेगा।





