नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय राजनीति की पिच पर इस समय बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ जहां प्रशासनिक पदों से आए लोग राजनीति में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थापित राजनीतिक दलों के बीच लगातार उठापटक जारी है। ताजा मामलों में पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया है। उनकी इस पार्टी का नाम 'जननीति भारत' रखा गया है। पार्टी के ऐलान के साथ ही उन्होंने कई तरह के वादे किए हैं और फंड को लेकर भी अपनी बात रखी है। दिव्या मित्तल पहली ऐसी पूर्व अधिकारी नहीं हैं जिन्होंने राजनीति का रुख किया है, बल्कि इससे पहले भी कई पूर्व आईएएस अधिकारी चुनावी मैदान में उतर चुके हैं और उनमें से कुछ तो बड़े पदों तक भी पहुंचे हैं।
राजनीतिक गलियारों में केवल नए दलों का गठन ही चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि नेताओं का तेजी से पाला बदलना भी बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल ही में कई बड़े नेता एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थाम रहे हैं। उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं। हालिया खबरों के अनुसार, बीजेपी के कई जाने-माने नेता समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने खुद इन नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई है। चुनाव से पहले नेताओं के इस तरह दल-बदल करने से स्थानीय स्तर पर चुनावी समीकरण पूरी तरह से हिल जाते हैं और विरोधी दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो जाती है।
चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती तनातनी
देश की राजधानी दिल्ली में केवल दलबदल और नई पार्टियों तक ही राजनीति सीमित नहीं है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत कई अन्य राजनीतिक दल देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। इन दलों का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया और संस्थाओं के काम करने के तरीके में पारदर्शिता की कमी है। इस मांग को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं और सरकार पर तीखे हमले बोले जा रहे हैं। विपक्षी दलों का यह विरोध प्रदर्शन आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है, क्योंकि राजनीतिक दल लगातार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।
दूसरी ओर, चुनावी राजनीति के आंकड़े बताते हैं कि नेताओं के दल-बदल की रफ्तार पिछले कुछ सालों में काफी तेज हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में देश भर के कई सांसद और विधायक अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में जा चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि इस फेरबहिस्त में सिर्फ एक पार्टी का नाम नहीं है, बल्कि कई अलग-अलग दल ऐसे नेताओं को अपने पाले में लाने में सबसे आगे रहे हैं। सत्ता और टिकट की उम्मीद में सांसद और विधायकों का पाला बदलना भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक ऐसी सच्चाई बन गया है, जिस पर हर चुनाव के दौरान गंभीर बहस होती है।
प्रशासनिक अनुभव बनाम चुनावी राजनीति की चुनौतियां
पूर्व अधिकारियों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार जब कोई बड़ा अफसर अपनी पार्टी बनाता है, तो राजनीतिक पंडितों की निगाहें उस पर टिक जाती हैं। दिव्या मित्तल द्वारा बनाई गई 'जननीति भारत' पार्टी के सामने जनता के बीच अपनी पैठ बनाने की बड़ी चुनौती होगी। भारत जैसे विशाल देश में नई राजनीतिक पार्टी को जमीन पर खड़ा करना आसान काम नहीं होता है। इसके लिए मजबूत संगठन, कार्यकर्ताओं की फौज और जनता के बीच सीधा संवाद होना बहुत जरूरी है। आम जनता अब नेताओं से वादे नहीं बल्कि उनके काम का हिसाब मांगती है, इसलिए नए दलों को अपनी रणनीति बहुत सोच-समझकर तय करनी पड़ रही है।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे हमारे संवाददाताओं का कहना है कि आम मतदाता अब बहुत जागरूक हो चुका है। नेता भले ही चुनाव से पहले पाला बदल लें या नई पार्टियां बना लें, लेकिन वोट देने से पहले मतदाता हर पहलू पर विचार करता है। दल-बदल की इस राजनीति से कई बार आम जनता के मन में निराशा भी पैदा होती है, क्योंकि वे जिसे चुनकर भेजते हैं, वह बीच में ही दूसरी पार्टी में चला जाता है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि ये नए दल और पाला बदलने वाले नेता जनता का कितना भरोसा जीत पाते हैं और चुनावी मैदान में इनका प्रदर्शन कैसा रहता है।
निष्कर्ष और भविष्य की राजनीतिक दिशा
कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति एक बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरे दौर से गुजर रही है। प्रशासनिक पृष्ठभूमि के लोगों का राजनीति में आना, विपक्षी दलों का चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलना और नेताओं का लगातार दल-बदल करना इस बात का संकेत है कि आने वाले चुनाव काफी कड़े मुकाबले वाले होंगे। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और हर एक अपडेट आप तक सबसे पहले पहुंचाती रहेगी।











