होर्मुज जलडमरूमध्य: क्यों है दुनिया की सबसे संवेदनशील जीवनरेखा?
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे अहम तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्र के रास्ते निर्यात होने वाले कच्चे तेल का लगभग 21 प्रतिशत और द्रवीभूत प्राकृतिक गैस (LNG) का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा सुरक्षा जांच और सैन्य निगरानी के नए नियमों की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार संगठन और ऊर्जा बाजारों में हलचल मच गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह जलमार्ग अपनी संकीर्ण भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा से रणनीतिक रूप से नाजुक रहा है। इसके सबसे संकरे बिंदु पर नौवहन लेन केवल दो मील चौड़ी है। ऐसे में जहाजों की आवाजाही में जरा सी भी रुकावट अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी उद्योग के लिए भारी लागत और अनिश्चितता का सबब बन सकती है।
"होर्मुज जलडमरूमध्य केवल एक भौगोलिक जलमार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धमनी है। यदि इस मार्ग पर तनाव बढ़ता है तो न केवल कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकते हैं, बल्कि समुद्री जहाजों का बीमा प्रीमियम कई गुना बढ़ जाएगा।" — डॉ. अरविंद सक्सेना, अंतरराष्ट्रीय सामरिक एवं ऊर्जा विश्लेषक
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भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रभाव
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें से 60 प्रतिशत से अधिक आपूर्ति खाड़ी देशों से इसी मार्ग के जरिए आती है। कतर से आने वाली भारत की एलएनजी आपूर्ति भी पूरी तरह होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपातकालीन समीक्षा बैठक की है।
आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि भारत के पास पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है जो आपात स्थिति में लगभग 74 दिनों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। हालांकि, यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों पर दबाव बढ़ सकता है।





