तेहरान/वाशिंगटन/नई दिल्ली — अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मध्य पूर्व के रणक्षेत्र से एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच पिछले कई महीनों से सुलग रही जंग की आग में अचानक दो बड़े मोड़ आ गए हैं। पहला बड़ा मोड़ ईरान की तरफ से आया है, जहां देश ने अपने विवादित परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक नया और कड़ा रुख अपनाया है। दूसरा बड़ा मोड़ वाशिंगटन से आया है, जहां पूर्व राष्ट्रपति और इस जंग की धुरी माने जा रहे डोनाल्ड ट्रंप ने तीन नवंबर तक किसी भी तरह के बड़े सैन्य हमले या बारूद के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। द फ्रीलान्स की टीम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों और खुफिया रिपोर्टों के आधार पर इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से पड़ताल की है ताकि पाठकों तक बिल्कुल सटीक और जमीनी सच पहुंचाया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम एशिया में अमेरिकी जहाजों और ठिकानों पर लगातार हमलों की खबरें आने लगीं। अमेरिका की तरफ से भी लगातार जवाबी कार्रवाई की धमकियां दी जा रही थीं जिससे दुनिया भर में तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा था। आम लोगों के मन में यह डर बैठ गया था कि यह तनाव किसी भी वक्त एक भीषण परमाणु युद्ध में बदल सकता है। तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं और वैश्विक शेयर बाजार में भी भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही थी। ऐसे नाजुक वक्त में दोनों देशों की तरफ से आए इन नए बयानों और फैसलों ने फिलहाल दुनिया भर की सांसों को राहत जरूर दी है, लेकिन इसके पीछे छिपी रणनीतिक चालों को समझना बेहद जरूरी हो गया है।
परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का बड़ा और चौंकाने वाला ऐलान
ईरान की संसद और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की तरफ से एक उच्च स्तरीय बयान जारी किया गया है। इस बयान में साफ कहा गया है कि ईरान अपनी सुरक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा। ईरानी हुक्मरानों ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ सहयोग के दायरे को लेकर कुछ नई शर्तें रख दी हैं। उनका कहना है कि यदि पश्चिमी देश आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने में ढिलाई नहीं बरतते हैं, तो वे अपनी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर देंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान के अगले कदम पर टिकी हुई थीं। ईरान का यह तेवर साफ दिखाता है कि वह अमेरिकी दबाव के आगे आसानी से झुकने वाला नहीं है।
ईरान के इस ऐलान के बाद क्षेत्रीय कूटनीति में खलबली मच गई है। खाड़ी देशों के कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि ईरान ने यह दांव अमेरिका और उसके सहयोगियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए चला है। जानकारों का मानना है कि तेहरान आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह घिर चुका है और वह अमेरिका को बातचीत की मेज पर खींचने के लिए परमाणु कार्ड का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, ईरान के सैन्य कमांडरों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि उनकी सीमाओं पर कोई दुस्साहस किया गया, तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। तेहरान की सड़कों पर आम नागरिकों का मूड भी इस वक्त देश की सेना और सरकार के साथ खड़ा नजर आ रहा है, जो किसी भी बाहरी हमले का सामना करने के लिए तैयार बैठे हैं।
तीन नवंबर तक ट्रंप का बारूद रोकना, क्या है इसके कूटनीतिक मायने?
दूसरी तरफ, अमेरिका के राजनीतिक गलियारों से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयानों और रणनीतिक बैठकों के बाद यह संकेत दिए हैं कि आगामी तीन नवंबर तक अमेरिका की तरफ से किसी भी बड़े सैन्य हमले को रोक दिया गया है। ट्रंप के इस फैसले को अमेरिका के घरेलू राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका में आगामी चुनावों और राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए फिलहाल युद्ध के मैदान में सीधी और बड़ी जंग टाल दी गई है। व्हाइट हाउस के सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन अभी कूटनीतिक रास्तों और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, बजाय इसके कि सीधे तौर पर सैनिकों की जान जोखिम में डाली जाए।
हालांकि, रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह फैसला कोई स्थायी शांति समझौता नहीं है, बल्कि यह सिर्फ एक रणनीतिक विराम है। तीन नवंबर की तारीख बहुत अहम है क्योंकि तब तक राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। अमेरिकी सेना खाड़ी देशों में अपने अड्डों पर पूरी तरह मुस्तैद है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसका मतलब साफ है कि भले ही अभी बारूद का इस्तेमाल रोक दिया गया हो, लेकिन तलवारें अभी भी म्यान से बाहर हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे गुप्त बातचीत के दौर भी चल रहे हैं, जिसके नतीजे आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएंगे।








