अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के विदेश मंत्री का कड़ा रुख
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक शैली इन दिनों वैश्विक मंच पर एक मिसाल बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के हालिया सत्र में हिस्सा लेने पहुंचे देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंखें झुकाकर बात करने वाले देशों में नहीं, बल्कि आंख में आंख डालकर जवाब देने वाले राष्ट्रों में शुमार है। वैश्विक कूटनीति के पटल पर भारत का यह तेवर न केवल देशवासियों का सिर गर्व से ऊंचा करता है, बल्कि विरोधी ताकतों को यह संदेश भी देता है कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के मामलों में किसी भी प्रकार की बयानबाजी को बर्दाश्त नहीं करेगा।
संयुक्त राष्ट्र के गलियारों में अक्सर विभिन्न देशों के प्रतिनिधि वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करते हैं और प्रेस के सामने अपने विचार रखते हैं। इसी सिलसिले में एक महत्वपूर्ण सत्र के दौरान ऐसा वाकया सामने आया जिसने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। विदेश मंत्री एस जयशंकर लाइबेरिया के प्रतिनिधि के साथ समुद्र में नाविकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर मंडराते खतरों जैसे गंभीर विषयों पर मीडिया के सवालों का जवाब दे रहे थे। यह सत्र पूरी तरह से समुद्री सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और नौकायन से जुड़े तकनीकी और कूटनीतिक पहलुओं पर केंद्रित था, जिसमें किसी भी अन्य राजनीतिक या क्षेत्रीय विवाद का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।
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पाकिस्तानी पत्रकार का नाटकीय अंदाज और उलटा सवाल
जब प्रेस कॉन्फ्रेंस का अंतिम चरण चल रहा था और विदेश मंत्री अपनी बात समाप्त करने की ओर बढ़ रहे थे, तभी वहां मौजूद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने नाटकीय अंदाज में अपनी बात रखनी शुरू की। उस पत्रकार ने दक्षिण एशिया में अशांति और आतंकवाद का जिक्र करते हुए एक ऐसा सवाल दागा जिसका मुख्य उद्देश्य केवल भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने धूमिल करना था। उस शख्स ने अपनी रिपोर्टर शैली का इस्तेमाल करते हुए भारत सरकार की नीतियों पर बेतुका और निराधार आरोप लगाने का प्रयास किया, जिससे वहां मौजूद अन्य देशों के पत्रकार भी हतप्रभ रह गए।
उस पत्रकार के लहजे में दुर्भावना साफ झलक रही थी, जो वैश्विक मंचों पर अक्सर पड़ोसी देश के पत्रकारों द्वारा प्रायोजित एजेंडे के तहत किया जाता है। ऐसे मंचों का इस्तेमाल गंभीर वैश्विक और मानवीय समस्याओं पर चर्चा करने के लिए किया जाता है, न कि किसी देश विशेष के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने के लिए। लेकिन पाकिस्तानी मीडिया का एक धड़ा हमेशा से ही प्रोपेगेंडा फैलाने और अपनी घरेलू विफलताओं से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल करता आया है। उस दिन भी ठीक ऐसा ही प्रयास किया गया, जिसका मकसद भारत को असहज करना था।
एस जयशंकर का वह तीखा प्रहार जिसने खींची लकीर
इस तरह के बेतुके और पूर्वाग्रह से ग्रसित सवालों का सामना करने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर की शैली हमेशा से अनूठी रही है। उन्होंने बिना किसी झिझक के, बेहद शांत लेकिन बेहद पैनी मुस्कान के साथ उस पाकिस्तानी पत्रकार को ऐसा जवाब दिया जिसकी गूंज लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय गलियारों में सुनाई देती रहेगी। उन्होंने अपनी ಮಾತ को बहुत कम शब्दों में लेकिन पूरी ताकत के साथ रखा, जिससे सवाल पूछने वाले की बोलती बंद हो गई।
"एक आतंकी देश मुझसे यह सवाल पूछ रहा है?" — एस जयशंकर, विदेश मंत्री, भारत सरकार
विदेश मंत्री के मुख से निकला यह एक वाक्य अपने आप में संपूर्ण इतिहास और वर्तमान की सच्चाई को बयां करने के लिए काफी था। इस तीखे और सटीक जवाब के बाद वहां मौजूद हर कोई समझ गया कि भारत अब आतंकवाद के पनाहगारों के किसी भी दुष्प्रचार को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। इसके तुरंत बाद एस जयशंकर अपने सत्र को औपचारिक रूप से पूरा कर वहां से आगे निकल गए, जिससे पाकिस्तानी पत्रकार और उसके साथियों को मुंह की खानी पड़ी।
आतंकवाद के साये में जीने वाले देश का दोहरा चरित्र
अगर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो पड़ोसी देश की यह पुरानी फितरत रही है कि वह खुद अपने यहां आतंकवाद की फैक्ट्रियां चलाता है और फिर दुनिया के सामने खुद को सबसे बड़ा पीड़ित साबित करने का नाटक करता है। दशकों से इस मुल्क की सेना और खुफिया एजेंसियां इस्लामिक कट्टरपंथियों को पावती देती रही हैं, उन्हें प्रशिक्षण देती हैं और सीमा पार अशांति फैलाने के लिए उनका इस्तेमाल करती रही हैं। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, इस नीति ने न केवल दक्षिण एशिया की शांति को खतरे में डाला है, बल्कि खुद उस देश के भीतर भी भयंकर तबाही मचाई है।
अफगानिस्तान में रणनीतिक गहराई के नाम पर जिन तत्वों को पाला गया था, वे आज उसी देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। रावलपिंडी और इस्लामाबाद के हुक्मरान जब भी अपने देश के भीतर किसी बड़े आतंकी हमले का सामना करते हैं, तो वे तुरंत सारा ठीकरा भारत की साजिश पर फोड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन दुनिया अब इस दोहरे खेल को अच्छी तरह समझ चुकी है। वैश्विक समुदाय इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि जिस जहर को खुद बोया गया हो, उसकी फसल तो उसी जमीन पर कटेगी।
निष्कर्ष और वैश्विक कूटनीति में भारत का बढ़ता कद
आज का भारत न केवल अपनी रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है, बल्कि वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को मुखरता से उठाता भी है। एस जयशंकर की यह टिप्पणी केवल एक बयान नहीं थी, बल्कि यह भारत के उस कड़े रुख का प्रतीक थी जो आतंकवाद के हर रूप को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए प्रतिबद्ध है। जब तक पड़ोसी देश अपनी पुरानी हरकतों से बाज नहीं आता और आतंकवाद के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट नहीं करता, तब तक उसे हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसे ही करारे जवाब मिलते रहेंगे। भारत ने दुनिया को यह स्पष्ट कर दिया है कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी तरह के दोहरे मानदंडों को स्वीकार नहीं करेगा।






