उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ ऐसी सीटें हैं जिन पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी रहती हैं। इनमें शामली जिले की कैराना विधानसभा सीट का नाम सबसे ऊपर आता है। यह सीट सिर्फ एक सामान्य निर्वाचन क्षेत्र नहीं है, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा केंद्र है जहां पिछले तीन दशकों से दो बड़े सियासी परिवारों के बीच वर्चस्व की जंग देखने को मिलती आ रही है। जैसे-जैसे साल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस हॉट सीट पर राजनीतिक पारा अभी से चढ़ने लगा है। हर दल अपनी रणनीति को धार देने में जुटा है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस बार भी मुकाबला उन्हीं पुराने परिवारों के इर्द-गिर्द घूमेगा या कोई नया समीकरण इतिहास रचेगा?
कैराना की सियासत में तीन दशकों का इतिहास और दो परिवारों का दबदबा
कैराना विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र (नंबर 8) की अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान है। पिछले 30 सालों के चुनावी इतिहास को पलटकर देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि यहां का मतदाता मुख्य रूप से दो परिवारों की कार्यशैली और उनके प्रभाव के इर्द-गिर्द ही अपना मन बनाता रहा है। एक तरफ दिवंगत नेता हुकुम सिंह का परिवार है, जिन्होंने भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के बैनर तले इस क्षेत्र में अपनी गहरी जड़ें जमाईं। वहीं दूसरी तरफ मुनव्वर हसन का परिवार है, जिसका समाजवादी राजनीति में मजबूत आधार माना जाता है।
नब्बे के दशक से लेकर अब तक के चुनावों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी हुकुम सिंह का जादू सिर चढ़कर बोलता था, तो कभी मुनव्वर हसन और उनके बेटे नाहिद हसन ने चुनावी मैदान में विरोधियों को पटखनी दी। इन दोनों परिवारों के बीच की राजनीतिक रस्साकशी ने ही कैराना को उत्तर प्रदेश के सबसे दिलचस्प चुनावी अखाड़ों में से एक बना दिया है। स्थानीय लोगों के लिए यह चुनाव केवल पार्टियों की वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि दो दिग्गजों की विरासत की लड़ाई बन चुका है।
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मुनव्वर हसन से लेकर हुकुम सिंह तक: शुरुआती दौर का चुनावी संघर्ष
यदि हम साल 1991 और 1993 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो उस समय मुनव्वर हसन ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया था। उन्होंने उस दौर के कद्दावर नेता हुकुम सिंह को चुनावी मैदान में मात दी थी। हालांकि, राजनीति कब करवट लेगी, यह कोई नहीं जानता। साल 1996 में कैराना की सियासी तस्वीर बदली और भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे हुकुम सिंह ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार बाबू सिंह को करीब 13 हजार से अधिक वोटों के अंतर से शिकस्त दी।
हुकुम सिंह की पकड़ इस क्षेत्र में लगातार मजबूत होती गई। इसके बाद हुए साल 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा। साल 2012 के चुनाव में तो हुकुम सिंह ने बीजेपी के टिकट पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी अनवर हसन को लगभग 19 हजार वोटों से मात देकर लगातार चौथी बार इस सीट पर कब्जा जमाया। यह वह दौर था जब हुकुम सिंह को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का एक मजबूत स्तंभ माना जाता था।
साल 2014 का उपचुनाव: कैराना की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट
कैराना के राजनीतिक इतिहास में साल 2014 का साल सबसे बड़ा बदलाव लेकर आया। दरअसल, साल 2014 के आम चुनावों में हुकुम सिंह कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुन लिए गए। उनके सांसद बनने के बाद कैराना विधानसभा सीट खाली हो गई, जिसके चलते अक्टूबर 2014 में यहां उपचुनाव कराना पड़ा। इस उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुनव्वर हसन के बेटे युवा नेता नाहिद हसन को चुनावी मैदान में उतारा, जबकि बीजेपी ने अनिल चौहान पर दांव लगाया।
यह मुकाबला बेहद रोमांचक और कांटे की टक्कर वाला साबित हुआ। नाहिद हसन ने इस कड़े मुकाबले में मामूली अंतर से जीत हासिल की। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, नाहिद हसन को 83,984 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के अनिल चौहान को 82,885 वोट हासिल हुए थे। महज 1,099 वोटों की इस जीत ने कैराना की राजनीति की दिशा ही बदल दी और नाहिद हसन ने क्षेत्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पैठ बना ली।
"राजनीति में कोई भी जीत स्थाई नहीं होती और जनता का मूड समय के साथ बदलता रहता है, लेकिन कैराना में पारिवारिक विरासत का असर हमेशा से गहरा रहा है। आगामी चुनाव में जनता के मुद्दे ही तय करेंगे कि ऊंट किस करवट बैठेगा।" — राजनीतिक विश्लेषक
साल 2017 और 2022 के चुनाव: नाहिद हसन का बढ़ता प्रभाव और मृगांका सिंह से मुकाबला
वर्ष 2014 के उपचुनाव के बाद हुए साल 2017 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी थी। इस बार सपा के टिकट पर नाहिद हसन ने कुल 98,830 वोट हासिल किए, जबकि उनके सामने मैदान में थीं दिवंगत हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह, जिन्हें 77,668 वोट मिले। इस चुनाव में हार-जीत का अंतर बढ़कर 21,162 वोटों तक पहुंच गया। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, नाहिद हसन का वोट शेयर करीब 47.50 फीसदी रहा था।
इसके बाद आया साल 2022 का विधानसभा चुनाव, जो पिछले सभी चुनावों के मुकाबले और अधिक आक्रामक और सीधी टक्कर वाला रहा। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नाहिद हसन ने अपनी लोकप्रियता को और मजबूत करते हुए 1 लाख 31 हजार 35 वोट (यानी 54.16 प्रतिशत) प्राप्त किए। वहीं, भाजपा की ओर से एक बार फिर मैदान में उतरीं मृगांका सिंह को 1 लाख 5 हजार 148 वोट (43.46 प्रतिशत) मिले। नाहिद हसन ने इस बार 25,887 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की, जो यह साबित करने के लिए काफी था कि उनका जनाधार लगातार बढ़ रहा है।
साल 2027 के चुनाव पर टिकी निगाहें: क्या होंगे मुख्य समीकरण?
अब जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। कैराना के सामाजिक समीकरणों की बात करें तो यहां का मतदाता किसी एक खास वर्ग तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र की सियासत में मुस्लिम, गुर्जर, जाट, दलित, कश्यप, ब्राह्मण, सैनी और ठाकुर जैसी जातियों की संख्या और उनका रुख हमेशा से चुनाव परिणामों को प्रभावित करता आया है। राजनीतिक पार्टियां अभी से जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बिठाने की जोड़-तोड़ में लग गई हैं।
आगामी चुनाव में टिकट वितरण, दोनों प्रमुख परिवारों का प्रभाव, और स्थानीय स्तर पर जनता के बुनियादी मुद्दे सबसे अहम भूमिका निभाएंगे। हालांकि, इतिहास यह भी सिखाता है कि कैराना की जनता केवल अतीत के नाम पर वोट नहीं करती, बल्कि वर्तमान की जरूरतों को भी उतनी ही तवज्जो देती है। ऐसे में साल 2027 का रण किसके पक्ष में जाएगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प होने वाला है।




