सिनेमा जगत का वह नायाब नगमा जिसे सुनने से बचना चाहते थे निर्देशक
भारतीय संगीत के इतिहास में कई ऐसे गीत दर्ज हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर अमर हो चुके हैं। सुरों की मल्लिका कही जाने वाली भारत की कोकिला लता मंगेशकर ने अपने लंबे करियर में अनगिनत ऐसे गीत गाए जो आज भी श्रोताओं के दिलों पर राज करते हैं। उनके गाए गीतों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, जिसमें हर मूड और हर एहसास के लिए कोई न कोई गाना मिल ही जाएगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गाने को आज हम मास्टरपीस मानते हैं, उसे कभी बनाने वाले ने ही कचरे के डिब्बे में डालने का मन बना लिया था? यह कहानी है साल 1964 में रिलीज हुई रहस्य और रोमांच से भरपूर फिल्म 'वो कौन थी' के उस ऐतिहासिक गीत की, जिसने आगे चलकर संगीत प्रेमियों की पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सस्पेंस और थ्रिलर से सजी इस फिल्म में साधना और मनोज कुमार जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म के गाने उस दौर में भी काफी सराहे गए थे, लेकिन इनमें से एक गाना ऐसा था जिसे लेकर पर्दे के पीछे जबरदस्त ड्रामा चला था। यह गाना था 'लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो न हो'। आज इस धुन को संगीत प्रेमियों के बीच भगवान का दर्जा प्राप्त है, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब फिल्म के निर्देशक को इस धुन में कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी।
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जब संगीतकार मदन मोहन को करना पड़ा था अभिनेता का दरवाजा खटखटाना
फिल्म के संगीत निर्देशन की कमान संभाली थी उस दौर के बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार मदन मोहन ने। उन्होंने इस गाने की धुन बहुत ही शिद्दत से तैयार की थी और उन्हें पूरा यकीन था कि यह गाना इतिहास रचेगा। हालांकि, फिल्म के निर्देशक राज खोसला इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते थे। जब उन्होंने मदन मोहन के मुंह से इस गाने की शुरुआती धुन और कंपोजिशन सुनी, तो उन्होंने तुरंत इसे फिल्म से बाहर करने का फैसला सुना दिया। राज खोसला का मानना था कि यह गाना फिल्म की कहानी और माहौल के साथ बिल्कुल फिट नहीं बैठता है।
इस फैसले से मदन मोहन बेहद आहत और निराश हुए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अपनी मेहनत के इस नायाब हीरे को कैसे बचाया जाए। हार थककर उन्होंने फिल्म के मुख्य अभिनेता मनोज कुमार से संपर्क किया। मदन मोहन ने मनोज कुमार को फोन कर अपनी व्यथा सुनाई और कहा कि निर्देशक महोदय बिना सोचे-समझे एक बेहतरीन गाने को रिजेक्ट करने पर तुले हुए हैं।
"एक दिन मदन मोहन का फोन आया। उन्होंने कहा कि राज खोसला का दिमाग खराब हो गया है। वह एक बहुत सुंदर गाना रिजेक्ट कर रहे हैं। कृपया आकर इसे संभालो।" — मनोज कुमार, अभिनेता (राज खोसला: द ऑथराइज्ड बायोग्राफी)
मनोज कुमार की सूझबूझ और निर्देशक का ऐतिहासिक यू-टर्न
शुरुआत में मनोज कुमार भी इस मामले में सीधे पड़ने से थोड़ा हिचकिचा रहे थे, क्योंकि वह निर्देशकों के काम में दखलअंदाजी नहीं करना चाहते थे। लेकिन संगीतकार की जिद और गाने के प्रति उनके अटूट विश्वास ने मनोज कुमार को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने निर्माता एन.एन. सिप्पी से इस बारे में चर्चा की। निर्माता भी मदन मोहन के सुर में सुर मिलाते नजर आए, क्योंकि वे जानते थे कि यह धुन कितनी जादुई है। इसके बाद सभी ने मिलकर राज खोसला को एक बार फिर से इस गाने को तसल्ली से सुनने के लिए मनाने की योजना बनाई।
मनोज कुमार के विशेष अनुरोध पर राज खोसला ने आखिरकार हार मान ली और उस गाने को दोबारा सुनने के लिए अपनी सहमति दे दी। जब वह स्टूडियो पहुंचे और उन्होंने पूरी तैयारी के साथ उस धुन को दोबारा सुना, तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल चुका था। उन्हें अपनी गलती का अहसास होने में देर नहीं लगी।
जब अपनी नादानी पर खुद को पीटने के लिए उठा लिया था जूता
राज खोसला जब स्टूडियो से बाहर आए, तो उनके मन में अपनी जल्दबाजी पर गहरा पछतावा हो रहा था। उन्होंने स्वीकार किया कि वह जिंदगी की सबसे बड़ी भूल करने जा रहे थे। इस वाकये का जिक्र 'राज खोसला: द ऑथराइज्ड बायोग्राफी' में विस्तार से मिलता है, जिसे फिल्म निर्माता की 100वीं जयंती के अवसर पर विशेष तौर पर प्रकाशित किया गया है। किताब में दर्ज विवरण के अनुसार, निर्देशक ने झुंझलाहट और गुस्से में खुद को कोसते हुए अपना जूता तक उठा लिया था और कहा था कि वह इतने खूबसूरत गाने को खारिज करने के लिए खुद को बेवकूफ कह सकते हैं।
इसके बाद लता मंगेशकर की रेशमी और जादुई आवाज में इस गाने को रिकॉर्ड किया गया। पर्दे पर साधना के चेहरे के भाव और इस अमर गीत का संयोजन ऐसा बैठा कि देखने वाले दंग रह गए। आज 6 दशक बीत जाने के बाद भी 'लग जा गले' की लोकप्रियता में जरा भी कमी नहीं आई है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि कई बार कला को समझने में दिग्गजों से भी भूल हो जाती है, लेकिन सही समय पर सही हस्तक्षेप से इतिहास बदल जाता है।








