भारतीय संगीत की निर्विवाद मलिका
संगीत की दुनिया में जब भी अमर और रूहानी आवाजों का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम स्वर कोकिला लता मंगेशकर का आता है। उन्हें 'सुरों की रानी' और 'स्वर साम्राज्ञी' के रूप में जाना जाता है। उनकी आवाज में एक ऐसा जादू और सम्मोहन था, जो सुनने वाले के दिल और दिमाग पर गहरा असर छोड़ जाता था। दिग्गजों का मानना था कि जब लता दीदी गाती थीं, तो ऐसा लगता था मानो कोई पवित्र आत्मा या संत भक्ति भाव से भरा कोई भजन प्रस्तुत कर रहा हो। उन्होंने बेहद कम उम्र में गाना शुरू कर दिया था और देखते ही देखते पूरे देश के संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने लगीं।
साल 1942 में मराठी फिल्म 'किति हसाल' से अपने प्लेबैक सिंगिंग सफर का आगाज करने वाली लता जी ने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक कई सुपरहिट गानों ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचा दिया। देश का शायद ही कोई ऐसा संगीतकार रहा होगा जो उनके साथ काम करने की ख्वाहिश न रखता हो। उनकी आवाज की रेंज, शब्दों के उच्चारण की स्पष्टता और भावनाओं को पिरोने का उनका अंदाज बेजोड़ था। हर नए दिन के साथ उनकी लोकप्रियता और मांग आसमान छू रही थी, लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा दौर भी आया जब उनके चाहने वाले मायूस हो गए थे।
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वह दौर जब थम गए थे स्वर कोकिला के सुर
साठ का दशक हिंदी सिनेमा के लिए सुनहरा दौर माना जाता है, लेकिन यह कालखंड लता मंगेशकर के व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में एक बड़ी चुनौती लेकर आया था। उस समय अचानक उनकी वोकल कॉर्ड्स यानी गले की नसों में गंभीर समस्या पैदा हो गई। इस शारीरिक तकलीफ के कारण वह अपनी आवाज का जादुई इस्तेमाल करने में असमर्थ हो रही थीं। उनके लिए गाना तो दूर, सामान्य रूप से बोलना भी मुश्किल होता जा रहा था। इस स्थिति ने देश भर के संगीत प्रेमियों और खुद लता दीदी को गहरी चिंता में डाल दिया था।
ऐसी स्थिति में उस दौर के महान शास्त्रीय गायक उस्ताद आमिर खान ने लता मंगेशकर को एक बेहद अहम सलाह दी। उन्होंने लता जी से कहा कि यदि वह अपने गले को हमेशा के लिए बचाना चाहती हैं और अपनी पुरानी आवाज वापस पाना चाहती हैं, तो उन्हें कुछ समय के लिए गायिकी से पूरी तरह नाता तोड़ लेना चाहिए और पूर्ण विश्राम करना चाहिए। उस्ताद की इस बात को मानकर लता दीदी ने महीनों तक रिकॉर्डिंग स्टूडियो की तरफ कदम नहीं बढ़ाया और पूरी तरह मौन व्रत धारण कर लिया।
मौन व्रत और इंडस्ट्री में फैली अनहोनी की अफवाहें
जब लता मंगेशकर जैसी महान गायिका अचानक महीनों तक खामोश हो गईं और किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम या रिकॉर्डिंग में नजर नहीं आईं, तो फिल्म इंडस्ट्री में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। गलियारों में यह बात तेजी से फैलने लगी कि स्वर कोकिला ने अब हमेशा के लिए गायिकी से किनारा कर लिया है और वह कभी वापस स्टूडियो नहीं लौटेंगी। उनके फैंस के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था। उस दौर के संगीतकार और निर्माता भी इस बात से सहमे हुए थे कि अगर लता जी वापस नहीं लौटीं, तो भारतीय सिनेमा का संगीत जगत सूना हो जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा सालों बाद इंदौर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ था, जिसका संचालन संजय पटेल ने किया था। उन्होंने लता दीदी के छोटे भाई और जाने-माने संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर के हवाले से बताया था कि अपने करियर के सबसे चरम पर होने के बावजूद लता जी ने अनुशासन का परिचय दिया। उन्होंने किसी भी बात की परवाह किए बिना उस्ताद आमिर खान की सलाह का अक्षरशः पालन किया और अपनी सेहत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
"जब लता जी ने महीनों तक खामोश रहकर अपने गले को वक्त दिया, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि वह वापसी करेंगी तो एक ऐसा धमाका करेंगी जो इतिहास के पन्नों में अमर हो जाएगा।" — हृदयनाथ मंगेशकर, संगीतकार
हेमंत कुमार का प्रयास और ऐतिहासिक वापसी
लता दीदी के इस लंबे मौन व्रत को तोड़ने का श्रेय दिग्गज संगीतकार और गायक हेमंत कुमार को जाता है। फिल्म 'बीस साल बाद' के निर्माण के दौरान हेमंत दा को अपनी एक धुन के लिए सिर्फ और सिर्फ लता मंगेशकर की ही आवाज की जरूरत थी। वह अच्छी तरह जानते थे कि इस गाने के साथ कोई दूसरा न्याय नहीं कर सकता। वह लता जी के घर पहुंचे और उन्हें बहुत समझाया। हेमंत कुमार के स्नेह और संगीत के प्रति उनकी जिद के आगे लता दीदी पिघल गईं और उन्होंने अपना मौन व्रत तोड़ने का फैसला किया।
इसके बाद रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जो हुआ, उसने भारतीय सिनेमा के इतिहास की दिशा ही बदल दी। लता मंगेशकर ने फिल्म 'बीस साल बाद' के लिए 'कहीं दीप जले, कहीं दिल...' गाना रिकॉर्ड किया। शकील बदायूंनी के लिखे और हेमंत कुमार के संगीत से सजे इस गाने ने आते ही धूम मचा दी। लोगों ने इस गीत को सर आंखों पर बिठा लिया। यह गाना बॉक्स ऑफिस पर और लोकप्रियता के मामले में इतना बड़ा सुपरहिट साबित हुआ कि लता दीदी का स्वर्णिम काल एक बार फिर से लौट आया। इस बेजोड़ गीत के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। आज इतने दशक बीत जाने के बाद भी यह गाना संगीतप्रेमियों के जेहन में उतनी ही गहराई से बसा हुआ है।








