भारतीय सिनेमा ने खोया अपना एक महान सपूत
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। साउथ सिनेमा के इतिहास में अपनी अनूठी और लीक से हटकर कहानियों के लिए पहचाने जाने वाले महान फिल्ममेकर सिंगीथम श्रीनिवास राव अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने चेन्नई के कावेरी अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली। पिछले कुछ समय से बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका इलाज चल रहा था, और शनिवार की रात उनकी हालत ज्यादा बिगड़ने के बाद उनका निधन हो गया। उनके इस तरह चले जाने से कला जगत में एक ऐसा खालीपन आ गया है जिसे भरना मुमकिन नहीं है।
सिंगीथम श्रीनिवास राव का जन्म 21 सितंबर 1931 को आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के उदयगिरि में हुआ था। उन्होंने अपने छह दशक से अधिक लंबे शानदार करियर में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी और अंग्रेजी जैसी विभिन्न भाषाओं में करीब 60 फिल्मों का निर्देशन किया। उन्हें एक ऐसा निर्देशक माना जाता था जो पारंपरिक लीक पर चलने के बजाय हमेशा प्रयोगधर्मिता में विश्वास रखते थे। उनके द्वारा बनाई गई फिल्में अपने समय से इतनी आगे होती थीं कि आज भी वे दर्शकों को उतनी ही नई और तरोताजा लगती हैं जितनी रिलीज के वक्त थीं।
उनके निधन की खबर मिलते ही साउथ से लेकर बॉलीवुड तक शोक की लहर दौड़ गई। तमाम दिग्गज कलाकारों और फिल्म निर्माताओं ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। फिल्म जगत के लोगों का मानना है कि सिंगीथम साहब ने भारतीय सिनेमा को एक ऐसी दृष्टि दी, जिसने कहानी कहने के तौर-तरीकों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
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जब बिना किसी संवाद के बना डाली मास्टरपीस फिल्म
सिंगीथम श्रीनिवास राव की रचनात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण साल 1987 में रिलीज हुई क्लासिक फिल्म 'पुष्पक विमानम' (हिंदी में 'पुष्पक') है। इस डार्क कॉमेडी फिल्म में साउथ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता कमल हासन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें एक भी संवाद यानी डायलॉग नहीं था। बिना किसी बोल के केवल हाव-भाव, परिस्थितियों और बेहतरीन अभिनय के जरिए उन्होंने पर्दे पर जो जादू बिखेरा, उसने इतिहास रच दिया।
यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो सफल रही ही, साथ ही इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी जबरदस्त सराहना मिली। साल 1988 में इस अनूठी कृति को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कुल सात बड़े अवॉर्ड्स से नवाजा गया। आज भी सिनेमा के छात्र और निर्देशक इस फिल्म को एक मास्टरक्लास के रूप में देखते हैं कि कैसे बिना संवादों के भी एक गहरी और प्रभावशाली कहानी कही जा सकती है।
इस मूक फिल्म के जरिए सिंगीथम साहब ने साबित कर दिया था कि सिनेमा की अपनी एक सार्वभौमिक भाषा होती है जिसे शब्दों की मोहताज होने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। कमल हासन के साथ उनका यह सहयोग भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन निर्देशक-अभिनेता गठजोड़ में से एक माना जाता है।
समय से दशकों आगे की सोच: 'आदित्य 369' का ऐतिहासिक सफर
जब भारतीय सिनेमा में साइंस फिक्शन और भविष्य की कल्पना करने वाली फिल्मों के बारे में सोचना भी मुश्किल था, तब सिंगीथम श्रीनिवास राव ने साल 1991 में 'आदित्य 369' जैसी क्रांतिकारी फिल्म बना दी। यह भारत की पहली मुख्यधारा की टाइम ट्रैवल फिल्म थी, जिसमें इतिहास और भविष्य दोनों की यात्रा को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा गया था। इस फिल्म में नंदमुरी बालकृष्ण, मोहिनी और लीजेंड्री अभिनेता अमरीश पुरी जैसे कलाकारों ने अपनी अदाकारी से जान फूंकी थी।
फिल्म में एक ऐसी टाइम मशीन की कहानी दिखाई गई थी जो लोगों को कृष्ण के काल से लेकर भविष्य के एक वीरान युग तक ले जाती है। तकनीकी संसाधनों की उस समय भारी कमी होने के बावजूद, सिंगीथम साहब ने अपनी गजब की कल्पना शक्ति और निर्देशन कौशल के दम पर एक ऐसा विजुअल ट्रीट तैयार किया जो आज भी दर्शकों को हैरान कर देता है। आईएमडीबी पर 8.4 जैसी उच्च रेटिंग इस बात का सबूत है कि यह फिल्म कितनी दूरदर्शी थी।
साउथ सुपरस्टार जूनियर एनटीआर ने उनके निधन पर शोक जताते हुए बिल्कुल सही लिखा था कि वे ऐसे दूरदर्शी थे जो अपने समय से मीलों आगे की सोचते थे। 'आदित्य 369' इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अगर इरादे मजबूत हों और सोच में नयापन हो, तो सीमित बजट में भी हॉलीवुड स्तर का कॉन्सेप्ट गढ़ा जा सकता है।
नृत्य और संघर्ष की दास्तान: फिल्म 'मयूरी' से जुड़ी यादें
केवल कल्पना और विज्ञान ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन के संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को पर्दे पर उतारने में भी सिंगीथम श्रीनिवास राव का कोई मुकाबला नहीं था। साल 1984 में आई उनकी फिल्म 'मयूरी' इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। यह एक बायोग्राफिकल ड्रामा फिल्म थी जो प्रसिद्ध क्लासिकल डांसर सुधा चंद्रन के जीवन पर आधारित थी। इस फिल्म की सबसे बड़ी बात यह थी कि इसमें खुद सुधा चंद्रन ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जिन्होंने एक सड़क हादसे में अपना पैर गंवाने के बाद कृत्रिम अंग के सहारे दोबारा नृत्य की दुनिया में वापसी की थी।
सिंगीथम साहब ने इस संवेदनशील कहानी को जिस गरिमा और प्रेरणादायक अंदाज में पर्दे पर पेश किया, उसने देखने वालों की आंखें नम कर दीं। फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, बल्कि देश भर के उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गई जो जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे थे।
"सिंगीथम श्रीनिवास राव गरु का जाना भारतीय सिनेमा के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 'आदित्य 369', 'पुष्पक विमानम' और 'मयूरी' जैसी कालजयी फिल्में देने वाले वे एक ऐसे दूरदर्शी थे, जिनकी सोच हमेशा आने वाली पीढ़ियों से आगे रही।" — जूनियर एनटीआर, तेलुगु सुपरस्टार
एक ऐसा जीवन जो पूरी तरह सिनेमा को समर्पित था
सिंगीथम श्रीनिवास राव का सफर सिर्फ एक निर्देशक तक सीमित नहीं था। उन्होंने एक पटकथा लेखक, संगीतकार और गीतकार के रूप में भी अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने अपने लंबे करियर की शुरुआत साल 1972 में तेलुगु कॉमेडी फिल्म 'नीति नियति' से की थी, जिसे उन्होंने खुद लिखा और निर्देशित भी किया था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक ऐसी फिल्में दीं जिन्होंने भारतीय मनोरंजन जगत की दिशा तय की।
उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका सिनेमा के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ था। अपनी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य की बाधाओं को दरकिनार करते हुए वे लगातार काम करते रहे। उनकी रचनात्मक ऊर्जा युवा निर्देशकों के लिए भी एक मिसाल थी।
आज भले ही सिंगीथम श्रीनिवास राव शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे हैं, लेकिन उनकी बनाई गई फिल्में, उनके अनूठे प्रयोग और उनकी अद्भुत कहानियां हमेशा सिने प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगी। उनका जाना भले ही एक युग का अंत है, पर उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।








